पटाखों की रंगीन रोशनी और काला धुआं जिंदगी में ला सकता है अंधेरा

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धनबाद। दीपावली और आतिशबाजी को एक-दूसरे का पूरक कह सकते हैं। देवी लक्ष्मी की पूजा के बाद शगुन के तौर पर जलाए जाने वाले पटाखे अब हमारे लिए खतरनाक साबित होते जा रहे हैं। हवा में तो पटाखे जहर घोल ही रही हैं, साथ ही शारीरिक और मानसिक व्याधियों को भी जन्म दे रहे हैं।

अगर आप दीपावली पर बम की लडिय़ां और धुआं छोडऩे वाले दूसरे पटाखे देखकर खुश होते हैं तो सावधान हो जाएं। जब ये फूटते हैं तो हवा में जलने वाले उडऩशील कार्बनिक पदार्थ फैल जाते हैं और कई दिनों तक वातावरण में बने रहते हैं। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय पदाधिकारी आरएन चौधरी का कहना है कि पटाखे न सिर्फ दमे के मरीजों के लिए जानलेवा होते हैं, बल्कि किसी को भी सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं। सबसे खतरनाक तो इन पटाखों की रंगीन रोशनी है। यह आंखों पर बुरा असर डालती है। अधिक देर तक देखने पर आंखों की रोशनी भी जा सकती है।

– हरी रोशनी : पटाखे में हरी रोशनी निकालने के लिए बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल होता है। ये विस्फोटक पदार्थ का भी काम करता है। बारूद में मिश्रण होने पर ये रंग बदलता है। हरे रंग में बदलने से जब पटाखे को आग लगाई जाती है तो उसमें से हरे रंग की ही रोशनी निकलती है। इसका इस्तेमाल ज्यादातर आतिशबाजी में किया जाता है।

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– लाल रोशनी : लाल रंग की रोशनी निकालने के लिए सीजियम नाइट्रेट डाला जाता है। इस रसायन को बारूद के साथ मिलाने पर इसका रंग लाल पड़ जाता है। इसके बाद मिश्रण को ठोस बनाकर पटाखे में भरा जाता है। इसका प्रयोग अधिकतर अनार और रॉकेट में किया जाता है, जिसमें से ज्यादा रोशनी निकलती है।

– पीली रोशनी : सोडियम नाइट्रेट का रंग देखने पर रंग हल्का पीला नजर आता है। पटाखों के बारूद के साथ इसे मिलाकर एक ठोस पदार्थ तैयार किया जाता है। इसमें नाइट्रेट की मात्रा बढ़ाई जाती है। इससे इसका रंग और भी गाढ़ा पीला हो जाता है। यही कारण है कि आग लगाने के बाद ये पीले रंग की रोशनी छोड़ता है। इसका इस्तेमाल अमूमन हर पटाखे में होता है। जमीन पर घूमने वाली चकरी में इसका प्रयोग अधिक होता है।

पटाखों से होता है ये नुकसानः कार्बन मोनोऑक्साइड जहरीली, गंधहीन गैस भी पटाखों से निकलती है, जो हृदय की मांस पेशियों को नुकसान पहुंचाती है। सल्फर डाइआक्साइड ब्रोकाइटिस जैसी सांस की बीमारी पैदा करती है। इससे बलगम व गले की बीमारियां पैदा होती हैं। नाइट्रेट कैंसर जैसी बीमारियां, हाइड्रोजन सल्फाइड मस्तिष्क व दिल को नुकसान व बेरियम आक्साइड आंखों व त्वचा को नुकसान पहुंचाती है। क्रोमियम गैस सांस की नली में व त्वचा में परेशानी पैदा करती है तथा जीव जंतुओं को नुकसान करती है।

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कौन सा पटाखा कितना हानिकारक
– बाजार में बिकने वाले अधिकतर पटाखे की ध्वनि क्षमता 120 डेसिबल या उससे अधिक होती है।
– सुतली बम 110, बुलेट बम 119.4, कोरोनेशन ब्रांड बम 118.2, मोर ब्रांड इलेक्ट्रिक क्रैकर बम 118.4, मुर्गा छाप गोल्डन बम 119 डेसिबल के रहते हैं।
– सुबह 6 से रात 10 बजे तक 55 डेसिबल और रात 10 से सुबह 6 बजे तक 45 डेसिबल रहना चाहिए।
– इसे ज्यादा ध्वनि या शोर कुछ समय बाद मानव को बेचैन करते हैं।
– 95 डेसिबल की आवाज कान को प्रभावित करती है।
– 110 डेसिबल से अधिक आवाज हो तो कान का पर्दा फटने का डर रहता है।
– पटाखों के धुएं में लगभग 75 फीसद पोटेशियम नाइट्रेट, दस फीसद सल्फर तथा 15 फीसद तक कार्बन की मात्रा होती है।
– पटाखों में कॉपर, बैडमियम लेड, नाइट्रेट, जिंक नाइट्रेट, मैग्निशयम, सोडियम, चारकोल, सल्फर, एल्यूमीनियम परकलोरेट, बेरियम नाइट्रेट तथा काला पाउडर जैसे रसायनों का भी इस्तेमाल होता है।

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पटाखों से निकलने वाली रंगीन रोशनी आंखों पर सीधा असर डालती हैं। दीपावली में जलने पर सर्वाधिक प्रभावित हमारी त्वचा और आंखें ही होती हैं। पहली बात तो पटाखे जलाएं ही नहीं। अगर आप आतिशबाजी देख रहे हैं और आंखों में चिंगारी गई है तो फौरन आंखों को पानी से धोएं और जल्द से जल्द अस्पताल जाएं। अगर कान्टैक्ट लेंस लगाते हैं तो दिवाली वाले दिन बिल्कुल न लगाएं और आंखों को पटाखों की तेज रोशनी से भी बचाएं। आंखों में चिंगारी या बारूद चला जाए तो उसे बिल्कुल न मलें, फौरन धो लें और चिकित्सक से संपर्क करें। पटाखे छूने के बाद अपनी आंखें न छुएं।

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