वार्ताओं व नौकरियों में महिलाओं की अनदेखी क्यों

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हर क्षेत्र में पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर मानवजाति के उत्थान व विकास को गति देने के लिए हर मामले में अग्रणी दुनिया की आधी आबादी नारी शक्ति को आज भी पुरूषों के वर्चसव के सामने अनदेखी का सामना क्यांे करना पड़ ही रहा है यह सोचनीय विषय है कोरोना काल में जो नौकरियां निकल और मिल रही है उनमें भी महिलाओं को उनकी संख्या और काबलियत के अनुसार कहा जा रहा है की प्रतिनिधित्व नही मिल रहा है जिसे एक प्रकार से यह भी कह सकते है की सीधे सीधे या घुमा फिराकर कही ना कही महिलाओं के बढ़ते कदम रोकने के प्रयास हो रहे हैं। आज अलग समाचार पत्रों में छपीं इन दो खबरों को देखकर तो यही कहा जा सकता है।

शांति वार्ताओं में महिलाओं की अनदेखी
लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाली संयुक्त राष्ट्र एजेंसी की प्रमुख ने शांति वार्ताओं में महिलाओं की समान भागीदारी की मांग करने वाले प्रस्ताव के 20 साल पूरे होने पर कहा कि इस प्रस्ताव पर अमल ही नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को संघर्षों को समाप्त करने के लिए होने वाली वार्ताओं से अब भी ‘सोच समझकर बाहर’ रखा जाता हैं और इन वार्ताओं में पुरुष उनके जीवन को प्रभावित करने वाले फैसले लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र महिला की कार्यकारी निदेशक फुमजिले म्लाम्बो नगकुका ने सुरक्षा परिषद को बताया कि कुछ अच्छी पहलों के बावजूद 1992 से 2019 तक मात्र 13 फीसद महिलाएं शांति वार्ताओं में वार्ताकारों के तौर पर शामिल की गई मात्र छह फीसद महिलाओं ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और मात्र छह फीसद महिलाएं इन समझौतों पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल रहीं। उन्होंने कहा कि वार्ताकारों ने महिलाओं और शांति स्थापित करने वाले अन्य लोगों को सशक्त बनाने के बजाए ‘हिंसा को बढ़ावा देने वाले कारकों’ को सशक्त बनाया और महिलाओं को या तो ‘अनौपचारिक प्रक्रियाओं में शामिल रखा गया या फिर उन्हें केवल दर्शक की भूमिका में रखा गया’। जर्मनी की विदेश राज्य मंत्री मिशेल मुंटेफेरिंग ने 31 अक्टूबर 2000 में पारित संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव को ‘छोटी क्रांति’ बताया’ क्योंकि सुरक्षा परिषद ने पहली बार मिलकर यह स्पष्ट किया कि ‘विश्व में शांति एवं सुरक्षा कायम रखने के लिए’ महिलाओं की समान भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा और संघर्ष रोकथाम के लिए लैंगिक समानता बहुत आवश्यक है और लैंगिक हिंसा या यौन उत्पीड़न ऐसा अपराध है, जिसके लिए सजा दी जानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने परिषद में दोहराया कि नेतृत्व की भूमिका में पुरुषों का ही आधिपत्य है और केवल सात फीसद देशों का नेतृत्व महिलाएं करती हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को शांति वार्ताओं के प्रतिनिधिमंड़ल से आमतौर पर बाहर ही रखा जाता है।

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कोरोना काल में महिलाओं को कम मिल रही है नौकरियां
कोरोना महामारी का सबसे बुरा असर महिलाओं के रोजगार और उनके कारोबार के लिए मिलने वाले निवेश पर हुआ है। इसके कारण नई नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी अगस्त महीने में घटकर 20 फीसदी से नीचे आ गई है। सरकार की ओर जारी होने वाली रोजगार के आंकड़ों से यह जानकारी मिलती है।
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) से एकत्र पेरोल डेटा के अनुसार, अगस्त में 669,914 लोगों को नई नौकरी मिली उनमें से केवल 133,872, या सिर्फ 19.98ः महिला कर्मी थी। वहीं, नई नियुक्तियों में महिला कर्मियों की संख्या जुलाई में 20.49 प्रतिशत व जून में 21.11 प्रतिशत थी।
सरकार एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि कोरोना संकट का व्यापक असर सभी सेक्टर और रोजगार पर हुआ है। हालांकि, सबसे बुरा असर महिलाओं के रोजगार पर देखने को मिल रहा है। यह चिंता का विषय है। अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन ने भी अपनी रिपोर्ट में चेताया था कि कोरोना संकट के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी तेजी से बढ़ेगी।
तीन कारणों से संकट गहराया एक्सएलआरआई जमशेदपुर में अर्थशास्त्री केआर श्याम सुंदर के अनुसार महिलाओं के लिए मौके कम होने के तीन वजह हैं। 1. कोरोना के दौर में महिलाओं पर घर के कामकाज का दबाव बढ़ा है। 2. देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पुरुषों को प्रधानता दी जाती है। 3. महिलाकर्मियों को जाॅब देने पर कंपनी को सुरक्षा के लिए पुख्ता प्रबंधन करना पड़ता है।

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अगर यह खबरें जो छप रही है सही है तो हमारी सरकार ही नहीं दुनियाभर के देशों की सरकारों और खासकर संयुक्त राष्ट्रसंघ आदि को महिलाओं की उन्नति और प्रगति को गति देने हेतु विशेष रूप से ध्यान देना होगा क्योकि यह बात सही है कि बेटी पढ़ेगी तो आगे बढ़ेगी तभी समाज का विस्तार और उसमें खुशहाली आ पायेगी और परिवारों का संचालन पूर्ण संतुलन और आत्मनिर्भरता के साथ हर परिस्थिति में हो सकता है क्योकि मेरा हमेशा मानना रहा है कि महिलाओ से बढ़ा मैनेजमेंट गुरू कोई है वो पढ़ी लिखी हो या निरक्षर हर परिस्थिति और स्थिति में अपने परिवार का पालन पोषण और जिम्मेदारियों का निर्वाह बड़ी निपुणता से करने में सफल रही है।

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– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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