अजर अमर है हिन्दी और देश में बोली जाने वाली भाषाएं

18
loading...

अपनी भाषाओं को प्रभावी और लोकप्रिय बनाने का प्रयास हर व्यक्ति और देश का होता है। और यह कोई गलत भी नहीं है क्योंकि अपनी चीज चाहे भाषा हो या परिवार बच्चे हो या व्यापार सबको बढ़ते हुए अच्छे लगते हैं। लेकिन अपने देश में विद्वानों द्वारा भाषाओं को लेकर की जाने वाली चर्चा और हर वर्ष एक सप्ताह तक हिन्दी दिवस मनाए जाने के उपरांत आजादी के लगभग सात दशक बीत जाने के बाद भी हम जब भारतीय भाषाओं के संरक्षण की बात करते हैं तो बड़ा अजीब सा लगता है और वो भी उस परिस्थिति में जब पूरी दुनिया में हिन्दी और संस्कृत को मानने और जानने वालों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। तथा एक घंटे के हिसाब से इसका ज्ञान कराने वाले शिक्षक इच्छुक व्यक्तियों से कई कई हजार रूपये फीस वसूल रहे हैं जो अंग्रेजी सिखाने वालों से किसी भी रूप में कम नहीं कही जा सकती।

अमेरिका में हिन्दी में प्रचार
अभी पिछले दिनों पढ़ा कि अमेरिका में हो रहे चुनावों में भारतीय मतदाताओं को लुभाने के लिए उम्मीदवार हिन्दी में चुनाव प्रचार की सामग्री भी तैयार करा रहे हैं। तो कुछ दिन पहले कहीं सुना था कि भारतीय बाजार में उत्पादों की बड़ी खपत को ध्यान में रखते हुए तमाम विदेशी कंपनियां अपने सामान के प्रचार के लिए हिन्दी में विज्ञापन तैयार करा रही हैं। जो इसका प्रतीक है कि हिन्दी की मान्यता प्रचलन और प्रभाव खूब बढ़ रहे हैं।

पंडितों की मांग बढ़ी
बताते हैं कि तमाम देशों में भारतवंशियों के साथ साथ विदेशियों की हमारे धर्म और उनसे जुड़े महापुरूषों के प्रति बढ़ रही जिज्ञासा और धार्मिक अनुष्ठानों के चलते संस्कृत के विद्वानों व पंडितों की मांग सब देशों में बढ़ रही है और वहां उन्हें इसके लिए एक भारी भरकम प्रारिश्रमिक भी मिल रहा है। इसे हिन्दी और संस्कृत की बढ़ती लोकप्रियता कहा जा सकता है।

नही है खतरा  भाषाओं को
अब अगर हम चर्चा करें अपने देश में प्रचलित भाषाओं की तो इस बारे में यही कहा जा सकता है कि जिस प्रकार अपने माता पिता परिजनों रीति रिवाजों व संस्कारों को हम नहीं भूल पाते हैं वैसे ही इन भाषाओं को बोलने वाले अमेरिका में रहें या इंग्लैंड में चीन में रहे या जापान में भले ही वो अन्यों के सामने संवाद की परेशानी को ध्यान में रखते हुए अपनी भाषा में बात ना करे लेकिन जब एक ही क्षेत्र प्रदेश और गांव के रहने वाले मिलते हैं तो वो धारा प्रवाह अपनी भाषाओं में बात करते हैं चाहे वह ज्यादा बोली जाने वाली हो या कम। इसलिए यह बात विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमारी भारतीय भाषाओं को कहीं कोई खतरा नहीं है। क्योंकि जहां तक मैं देखता और सुनता हूं आज के युवा भी मातृभाषा में आपस में बात करना सम्मान की बात समझते हैं। और इससे भी बड़ी बात यह है कि जब वो कहीं ऐसे लोगों के बीच होते हैं जो उनकी भाषा नहीं जानते हो तो कुछ बातें ऐसी होती है जिनका मतलब और ना समझे उन्हें वो अपनी तरीके से बतियाते हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि विद्वानों के इस कथन में कोई बड़ा दम है कि भविष्य में 21 वी सदी के आते आते इसमें से सिर्फ 200 ही भाषा बचेंगी।

इसे भी पढ़िए :  लॉटरी और गैंबलिंग पर GST को सुप्रीम कोर्ट ने बताया लीगल

घर में बच्चों को हिन्दी बोलने हेतु
मेरा मानना है कि ऐसी हताशापूर्ण चर्चा करने की बजाय अगर भाषाओं कोे बढ़ावा देने के काम में लगे मठाधीश रचनात्मक रूप से इनके प्रति पाॅजिटिव प्रभाव उत्पन्न करें और अपने बच्चों को भी अंग्रेजी के साथ साथ मातृभाषाओं का ज्ञान कराएं तो जब तक मानव जाति रहेगी हमारी हर भाषा जिंदा रहेगी।
मगर हो यह रहा है कि एक तरफ तो हमारी भाषाओं को जिंदा रखने के नाम पर सरकार मोटी मोटी रकमें खर्च कर रही है जिससे इसका प्रचार प्रसार करने में लगे व्यक्तियों में से कुछ को छोड़ दिया जाए तो बाकी की रोजी रोटी शायद इसी से चल रही है। इसीलिए जो भाषा हम अपने परिवार में रोज बोलते हैं उसे बढ़ावा देने के लिए एक सप्ताह का अभियान चलाया जाता है। मजे की बात यह है कि जो इसके प्रेरणास्त्रोत होते है वो ज्यादातर अपने ज्यादातर काम एक मौखिक चर्चा के अनुसार इंग्लिश मंे ही करना पसंद और बच्चों को इंग्लिश बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसीलिए हिन्दी को बढ़ावा देने की बात की जाती है।
मैं कभी किसी स्कूल तो गया नहीं और ना ही मैंने हिन्दी या इंग्लिश पढ़ी है। मुझे तो आज भी हिन्दी संस्कृत और इंग्लिश के शब्दों का भी ज्ञान नहीं है लेकिन जितना देखताा चला आ रहा हूं उसे देखकर लगता है कि हमारी यहां बोले जाने वाली भाषाएं हमारे तन मन में रची बसी है।

इसे भी पढ़िए :  चेहरे के दाग-धब्बे छुपाने के लिए कंसीलर है बेस्ट, जानें कैसे करें इसका सही इस्तेमाल

अब कोई कहे कि सब एक भाषा क्यों नहीं बोलते तो इसमें यही कहा जा सकता है कि कुछ तथाकथित इंग्लिश प्रेमियों का यह कहना कि यूरोप में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा इंग्लिश है मगर ब्रिटेन में बताते हैं कि वहां के लोग अपने हिसाब से इंग्लिश बोलते हैं। अब तो दुनिया में हिंगलिश का भी प्रभाव बढ़ रहा है। और फिर सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी विदेशों में जमकर हिन्दी बोलते हैं और उनके समकक्ष लोग दुभाषिये के माध्यम से मतलब समझते हैं। शायद हर पढ़ने वाला बच्चा यह जानता है कि हमारे तो संन्यासी भी हिन्दी का वर्चस्व कायम करने में अग्रणीय रहे है। महान ऋषि स्वामी विवेकानंद जी ने 11 सिंतबर 1893 में शिकागों में आयोजित एक सम्मेलन में दस घंटे जीरों पर बोलकर जो भारत और हमारी भाषा का सम्मान बढ़ाया था उसमें हमारे नेता अब और बढ़ोतरी करने में लगे हुए हैं।
घड़ियाली आंसू बहाना बंद हो
कुछ मिलाकर कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि भारतीय भाषाओं और हिन्दी को बढ़ावा देने की बात करने वाले घड़ियाली आंसू बहाना बंद करें और साल में एक सप्ताह इसका अभियान चलाने की बजाय अपने परिवार में बच्चों को हिन्दी बोलने को बढ़ावा दें।
हमारी भाषा की लोकप्रियता व सम्मान का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस एडहोम घेब्येयियस ने हिन्दी में भारत और दक्षिण अफ्रीका को धन्यवाद देते हुए ट्वीट किया है। डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा, कोविड-19 के संदर्भ में बौद्धिक संपदा के मुद्दे यानी आईपीआर पर पुनर्विचार का सुझाव देने के लिए भारत और दक्षिण अफ्रीका को धन्यवाद, ताकि टीकों, दवाओं आदि को कम कीमतों पर उपलब्ध कराया जा सके। यह एक सराहनीय कदम है। अक्टूबर के प्रारंभ में भारत ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को विकासशील देशों के लिए कोविद 19 वैक्सीन के उत्पादन और आयात को सुविधाजनक बनाने के लिए बौद्धिक संपदा नियमों को शिथिल करने के लिए कहा।
21वी सदी में
ऐसे में भारतीय जन संचार संस्थान (आईएमसी) के महानिदेशक जय द्विवेदी ने हिंदी पखवाड़े के तहत आयोजित की गई प्रतियोगिताओं के पुरस्कार वितरण समारोह में बीतें दिनों कहा कि पूरे विश्व में 6000 भाषा बोली जाती है भाषा शास्त्रियों का कहना है कि 21वीं सदी के अंत इनमें से केवल 200 भाषाएं बचेंगी और बाकी खत्म हो जायेगी। हम इन भाषाओं के लिए कार्य करना चाहिए। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि अगर भाषा विज्ञान के नजरिए से देखें, ही एक पूर्ण भाषा है। हिंदी की देवनागरी लिपि पूर्णतः वैज्ञानिक है।
हिन्दी को विदेशी स्कूलों पर मत छोड़ों
ऐसे में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि विदेशी संस्थाओं द्वारा संचालित इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी और संस्कृत के उपर अपने बच्चों को छोड़ने की बजाय वो इनको बोलने और लिखने में गलती ना करें इसलिए हर घर में बच्चों को इनका ज्ञान कराया जाए और हिन्दी मीडियम बोर्ड के स्कूल अंतर विद्यालय हिन्दी प्रतियोगिताएं ज्यादा से ज्यादा कराए। मेरा मानना है कि हिंदी और अन्य भाषाएं अमर है। उन्हें किसी से कोई खतरा नहीं है सिर्फ हमें जागरूक रहने की जरूरत है।

इसे भी पढ़िए :  IND vs AUS 2nd ODI: भारतीय कप्तान विराट कोहली ने हासिल किया ये नया मुकाम

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

two + 15 =