विदेशी यूनिवर्सिटीयों से संबंधता की बात करने वाले दें पूरी जानकारी

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जनहित में सरकार उनकी छवि, ग्रेड और संचालकों की सामाजिक स्थिति की कराए जाए जांच

उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद की रहने वाली राजकुमारी त्यागी द्वारा पिछले दिनों 77 साल की उम्र में तीन साल में कानून की पढ़ाई करने की अनुमति देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। तो दूसरी ओर 98 वर्ष की उम्र में अर्थशास्त्र में एमए करने वाले नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के छात्र रहे राजकुमार वैश्य जिनका 101 वर्ष की उम्र में निधन हुआ। इन दोनों प्रकरणों से यह पता चलता है कि अब दुनियाभर में शिक्षा के प्रति बूढ़ें हो या बच्चे महिला हो या पुरूष सबमें शिक्षा के प्रति अभूतपूर्व रूचि बढ़ रही है। शायद यही कारण है कि विश्व के सभी देशों में पढ़ने की इच्छा रखने वालों की सोच को देखकर शिक्षा की दुकान गली मौहल्लों और गांव देहातों में इनके व्यापारियों द्वारा खोल ली गई हैं। मैं यह तो नहीं कहता कि सारे स्कूल काॅलेज एक से हैं लेकिन जैसा समय समय पर पढ़ने सुनने और देखने को मिलता है, उससे यह जरूर कहा जा सकता है कि कुछ दुकानें तो ऊंचा नाम फीका पकवान के समान है और सिर्फ सरकारी सुविधाएं लेने और माल कमाने के लिए जुगाड़ के नाम पर चल रही बतायी जाती हैं। एक जमाना था जब इस क्षेत्र में शिक्षा को पूजा और इसे देने के लिए स्कूल रूपी मंदिर खुला करते थे। तथा इनके संचालक सिद्धांत और आदर्शों पर चलते हुए समाज और राष्ट्र के हित को ध्यान में रखकर बच्चों को शिक्षित बनाने की व्यवस्था बनाते थे लेकिन आजकल तो जितना सुनने को मिल रहा है कि अगर जांच कराई जाए तो ऐसा लगता है कि कितने ही कुचरित्र अथवा जुगाड़ से डिग्री प्राप्त कर कुछ लोगों द्वारा सिर्फ धन कमाने के लिए स्कूल खोल लिए हैं और इनकें बड़े नाम रखकर सिद्धांतों की बात की जाती है लेकिन अंदर घुसकर देखा जाए तो वहां जो शिक्षा दी जा रही है उसको दिलाने से तो अच्छा है कि हमारे बच्चे समाज रूपी यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त करे बिना डिग्री की लालसा के।
आजकल आए दिन समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता है कि फला यूनिवर्सिटी का विदेशी विश्वविद्यालयों से अनुबंध हुआ। और अब दोनों जगह के छात्र एक दूसरे के यहां भ्रमण कर शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। तो कई विवि के संचालक तो दुनिया के विभिन्न देशों में स्थित कई कई विवि से संबद्धता होने का प्रचार करते हैं। बीते दिनों यूपी के एक विवि के संचालकों द्वारा दावा किया गया कि विश्व के सबसे ज्यादा देशों के विवि से संबंध है उनकी यूनिवर्सिटी। यह अच्छी बात है। और इसमें कुछ बुराई भी नजर नहीं आती है। लेकिन एक सवाल जो सुरसा के मुंह की भांति दिन प्रतिदिन विशाल होता जा रहा है वो यह है कि दुनियाभर के विभिन्न देशों की जिन विवि की संबद्धता किए जानी की बात कही जाती है विवि के संचालकों को उनकी ग्रेड और समाज में छवि तथा सरकार की निगाह में उनका क्या स्तर है इसके बारे में भी विस्तार से जानकारी दी जाए। और संबद्धता से संबंध जो खबरें छपवाई जाती है उनमें संबंधित विवि की वेबसाइट ईमेल आदि का भी विवरण दिया जाए जिससे यह पता किया जा सके हैं कि उनकी क्या स्थिति है। उनमें किस प्रकार की शिक्षा दी जाती है। कितने छात्र पढ़ते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि विवि के नाम पर गली मुहल्लों में मानक भी पूरा ना करने वाली जुगाड़ के दम पर खोले गए विवि से संबंधता दिखाकर ग्रामीण कहावत घर का जोगी जोगी या और बाहर गांव का सिद्ध के समान वाहवाही लूटने के समान ज्यादा से संबंधता दर्शाने वाली यूनिवर्सिटी कहीं अभिभावकों की खून पसीनें की कमाई हड़पने का काम और शिक्षा के नाम पर नौजवानों का समय बर्बाद करने की कोशिश तो नहीं की जा रही।

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– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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