कोई तो बताए मध्यम वर्ग के व्यक्ति का आखिर कसूर क्या है

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वैसे तो हमेशा ही मुददा कोई भी कारण कुछ भी हो नागरिकों के अनुसार या तो बिल्कुल बड़े अथवा छोटे लोगों की बात सब जगह सुनी जाती है यह दर्द मध्यम वर्ग के व्यक्तियों की भावनाओं में कई मौकों पर झलकता नजर आता है। मगर लगभग छह माह से जारी कोरोना की माहमारी के लाॅकडाउन में यह बात एक प्रकार से पूरी तौर पर स्पष्ट हो गई है कि सरकार हो या अधिकारी बड़े जनप्रतिनिधि अथवा नेता लाॅकडाउन में राहत देने की बात हुई तो गरीब आदमी के लिए सब पलक पावड़े बिछाकर सामने आए। और उनकी पूरी मदद हुई। यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है। लाॅकडाउन में छूट और अनलाॅक की प्रक्रिया चली तो उद्योगपतियों, बिल्डरों आदि हर बड़े व्यक्ति को छूट देने पर चर्चा हुई। मगर कैसा इत्तेफाक है कि छोटे कारोबारी और कारीगरों सहित मध्यम वर्ग के उस व्यक्ति जिसका काम धंधा इस दौरान चैपट हो गया। आर्थिक स्थिति बुरी तरह डगमगा गई मगर व्यक्तिगत तौर पर कुछ सामाजिक धार्मिक संगठनों और उनसे जुड़े लोगों ने मध्यम वर्ग के उस व्यक्ति की खबर तो ली जो ना तो किसी के आगे हाथ फैला सकता था और भीख मांग सकता था मगर सामूहिक तौर पर ऐसे लोगों की मदद के लिए अभी तक कहीं से कोई राहत पैकेज शायद घोषित किया गया और ना कहीं से ऐसा आभास मिल रहा है कि मध्यम वर्ग के व्यक्ति का ध्यान भी रखने की योजना बनाई जा रही है। ऐसे नागरिकों में आज यह जो सवाल उठ रहा है कि आखिर हमारा कसूर क्या है वो बिल्कुल सही है उसे किसी भी रूप में गलत नहीं कहा जा सकता। मेरा मानना है कि केंद्र प्रदेश की सरकारों सहित नौकरशाहों व बड़े जनप्रतिनिधियों को इस ओर ध्यान देकर कोई ऐसी योजना जरूर बनानी चाहिए जो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के साथ साथ मध्यम वर्ग के उत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके।

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-रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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