शोध: अधिक आयोडीन का सेवन बनता जा रहा है इन खतरनाक बिमारियों का वजह

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लखनऊ, 21 जुलाई। आयोडीन की कमी से ग्वाइटर (घेंघा), मानसिक विकृति, गर्भपात, शारीरिक कमजोरी, मांसपेशियों में शिथिलता जैसी अनेक कठिनाइयां घेर लेती हैं। ग्लोबल आयोडीन नेटवर्क की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में लगभग 200 करोड़ लोग आयोडीन की कमी से जूझ रहे हैं, लेकिन केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआइ), लखनऊ का शोध और भी ज्यादा आंखें खोलने वाला है। आयोडीन की कमी पूरी करने के लिए अपनाया जाने वाला मौजूदा तरीका और जाने-अनजाने शरीर में बढऩे वाली इसकी मात्रा पुरुषों की प्रजनन क्षमता घटा रही है। यही नहीं, उनकी सेक्स इच्छा भी प्रभावित हो रही है। सीडीआरआइ अब सरकार को आयोडीनयुक्त नमक के प्रयोग की वैश्विक नीति की समीक्षा का सुझाव भेजने जा रहा है।

आयोडीन शरीर में थायराइड हार्मोन का निर्माण करने के लिए जरूरी है, लेकिन सूक्ष्म मात्रा में। सामान्य तौर पर एक व्यक्ति के लिए 150 माइक्रोग्राम आयोडीन की मात्रा प्रतिदिन काफी है। इसकी पूॢत किसी खाद्य पदार्थ से नहीं होती। यह मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है, जो फलों और सब्जियों के जरिए शरीर में पहुंचता है।

सीडीआरआइ, लखनऊ के विज्ञानी डॉ. राजेंद्र सिंह बताते हैं कि मैदानी क्षेत्रों के मुकाबले पहाड़ी क्षेत्रों की मिट्टी में आयोडीन की ज्यादा कमी होती है। वजह, यहां बारिश के चलते मृदा क्षरण होता रहता है। पानी के साथ मिट्टी में मौजूद आयोडीन भी बह जाता है जबकि मैदानी क्षेत्रों में आयोडीन पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है। बीएचयू, वाराणसी के सहयोग से किए गए शोध में देखा गया कि बंगाल के गंगा के मैदानी क्षेत्र, पूर्वी उत्तर प्रदेश की तराई और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे मणिपुर में रहने वाले लोगों में आयोडीन की पर्याप्त मात्रा मौजूद है। वहींं केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और बंगाल के ग्रामीण इलाकों में लोगों में इसकी कमी पाई गई।

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आयोडीन की कमी पूरी करने के लिए भारत सहित पूरी दुनिया में अभियान चलते हैं। इसके लिए फोर्टीफाइड यानी आयोडीनयुक्त नमक का प्रयोग किया जा रहा है, जो कारगार भी साबित हुआ है। भारत में 80 फीसद से अधिक घरों में आयोडीनयुक्त नमक पहुंच चुका है लेकिन, यही भेड़चाल जाने-अनजाने में एक बड़े इलाके के पुरुषों की प्रजनन क्षमता को संकट में डाल रही है। ऐसे इलाके जहां प्राकृतिक रूप से पहले से आयोडीन की अधिकता है, नमक में उसके प्रयोग से शरीर में वह ज्यादा पैबस्त होता जा रहा है। शोध मेंं साफ हुआ है कि आयोडीन की अधिकता से ऑक्सीडेटिव डिस्ट्रेस होता है। यह टेस्टिकुलर टिश्यूज को कमजोर करने के साथ उसमें मौजूद ब्लड टेस्टीज बैरियर में भी गड़बड़ी करता है। नतीजतन लोगों में स्पर्मेटोजेनेसिस हो जाती है, जिसका प्रभाव शुक्राणुु बनने पर पड़ता है। शुक्राणु कम बनने से प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है। यही नहीं, उम्र के साथ पुरुषों की सेक्स इच्छा भी कमजोर होती जाती है।

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शोध में सामने आई जानकारी के बाद विज्ञानी डॉ. राजेंद्र सिंह ने सरकार को आयोडीनयुक्त नमक की यूनिवर्सल पॉलिसी में बदलाव की जरूरत का सुझाव दिया है। यह कहते हुए कि उन इलाकों में, जहां लोगों के शरीर में आयोडीन सामान्य मात्रा में मौजूद है, नमक के जरिए आयोडीन की अतिरिक्त मात्रा न दी जाए। सीडीआरआइ के वैज्ञानिक का यह शोध प्रसिद्ध जर्नल रिप्रोडक्टिव टॉक्सिकोलॉजी में इसी माह प्रकाशित हुआ है।

गर्दन में सूजन, अचानक वजन बढऩा, कमजोरी या थकान महसूस होना, बालों का झडऩा या कम होना, याददाश्त कमजोर होना, गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं, मासिक धर्म की अनियमितता या मासिक धर्म में अधिक खून आना आयोडीन की कमी के सामान्य लक्षण हैं।

वयस्कों को आमतौर पर प्रति दिन 150 माइक्रोग्राम (एमसीजी) आयोडीन की आवश्यकता होती है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को प्रति दिन 200 एमसीजी जरूरी है।
यूरिन या ब्लड टेस्ट से आयोडीन की कमी का पता लगाया जा सकता है। आयोडीन पैच टेस्ट भी होता है, जिसमें डॉक्टर त्वचा पर आयोडीन का एक पैच पेंट करते हैं और जांचते हैं कि 24 घंटे के बाद यह कैसा दिखता है। इस बीच रंग हल्का नहींं होता तो इसका मतलब शरीर में आयोडीन पर्याप्त मात्रा में है। अगर कमी होती है तो जल्द ही इसका रंग उड़ जाता है।वैद्य डॉ. शिव शंकर त्रिपाठी बताते हैं कि प्राचीन काल से भोजन में सेंधा नमक का उपयोग किया जाता रहा है। सिंध प्रांत में सेंधा नमक, जिसे पिंक साल्ट या हिमालयन साल्ट भी कहते हैं, प्राकृतिक रूप से चट्टानों के रूप में मिलता है। सेंधा नमक में सोडियम की मात्रा साधारण नमक के मुकाबले कम होती है। यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

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