अनोखा संप्रदायः इनके राम अयोध्या में ही नहीं, रोम-रोम में निवास करते हैं !

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नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ का रामनामी समाज HSS भगवान श्री राम की भक्ति की अनोखी, अद्भुत और अकल्पनीय मिसाल पेश करता है। कहने को यह समाज मंदिर जाने और मूर्ति पूजा का विरोध करता है, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से उत्साहित है। ये मन मंदिर में विराजमान गम की भक्ति करते हैं। समाज के लोग शरीर पर राम नाम गोदवाते हैं। मेले और अन्य अयोजनों में इस समाज के लोग रामचरितमानस के दोहों और चौपाइयों का पाठ करते हैं। रामनामी पंच के लोग मूलतः छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा, रायगढ़, बलौदाबाजार-भाटापार, महासमुंद और रखपुर जिले के लगभग 100 गांव में रहते है। हालांकि अब इनकी संख्या करीब 150 से 175 के बीच ही बची है। कभी इनकी आबादी 10 से 12 हजार थी नई पीढी गोदना से परहेज करती है। वर्ष 1890 के आसपास मालखरौदा क्षेत्र के चारपारा निवासी पसाराम भाद्धाज नामक युवक ने रामनामी पंथ की शुरुआत की थी। करीब 130 साल पुराने इस पंथ से जुड़े लोग शरीर पर राम-राम लिखवाकर यह संदेश देते हैं कि राम रग-रग और कप-कण में हैं। आपस में अभिवादन भी राम-राम से ही होता है। रामनामी समाज के अध्यक्ष जोरपाली निवासी रामप्यारे का कहना है कि हम रमचरित मानस का भजन करते है। सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन भजन मेला होता है। इसमें ये रामचरितमानस का गायन कसे हैं। गोदना के हिसाब से नाम: रामनामी समाज के अध्यक्ष रामप्यारे बताते हैं कि शरीर पर गमनाम लिखवाने वाले का नाम गोदना के हिसाब से तय होता है। अगर किसी के पूरे शरीर पर गम-रम लिखा है तो उसे नखशिख गमनामी कहते है। पूरे माथे पर राम नाम अंकित करने वाले को सर्वांग रमनामी और केवल माथे पर दो बार राम-राम लिखाने वाले को शिरोमणी रामनामी कहा जाता है।

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