कोरोना को लेकर लाॅकडाउन अनलाॅक, संक्रमितों की बढ़ती संख्या, नागरिकों में खत्म होता डर

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कोरोना को लेकर लागू लाॅकडाउन को अनलाॅक करने का सिलसिला अब देशभर में कम या ज्यादा शुरू हो गया है। कुछ राज्यों में एक या दो दिन का पूर्ण लाॅकडाउन और बाकी में रोजमर्रा की गतिविधियों के लिए छूट मिल रही है तो महाराष्ट्र के मुंबई में 31 जुलाई तक लाॅकडाउन की अवधि बढ़ा दी गई है। देश के अन्य प्रदेशों में भी समयानुकुल आम आदमी की जान माल की रक्षा और सामाजिक व्यवस्थाओं तथा आर्थिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए जा रहे हैं।
बताते चलें कि जनवरी माह में जब कोरोना की चर्चा शुरू हुई तो इससे प्रभावित मरीज सैंकड़ों मेें थे और जब इनकी संख्या हजारों में पहुंचनी शुरू हुई तो पूर्ण रूप से लाॅकडाउन देशभर में लागू कर दिया गया जो कई चरणों में लागू रहा। क्या दृष्टिकोण रहा जिम्मेदारों का क्या नहीं लेकिन जब संक्रमितों की संख्या लाखों में पहुंची तो अनलाॅक कर ढील देनी शुरू कर दी गई। आज की तारीख में करीब 7 लाख 20 लोग संक्रमित हैं जिनमें से 4 लाख 35 हजार ठीक हो गए और करीब 20 हजार लोेग काल के गाल में समा गए तो करीब 2 लाख 60 हजार लोग अभी इलाज करा रहे हैं। जैसे जैसे समय बीत रहा है और इसके इलाज के लिए वैक्सीन की संभावनाएं बढ़ रही हैं तो यह आशा बंधी है कि सही होने वालों की संख्या में इजाफा होगा मगर फिलहाल कोई सटीक दवाई ना होने के बाद भी चार लाख से ज्यादा का ठीक होना चमत्कार ही कहा जा सकता है और वो भी उस परिस्थिति में जब आए दिन मीडिया की सुर्खियों में मरीजों को सही खानपान उपलब्ध ना होना तथा सही तरीके से देखभाल में कमी के आरोप निरंतर सुनाई दे रहे हैं। कल क्या होगा यह तो भगवान ही जाने मगर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और अन्य जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों के कथन कि अब हमें कुछ समय एहतियात बरतते हुए कोरोना के साथ ही जीना सीखना होगा के बाद कोई कह कुछ भी ले लेकिन एक बात स्पष्ट हो रही है कि नागरिकों में कोरोना संक्रमितों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी के बाद शुरूआती दौर में जो डर इसे लेकर बैठा था अब नजर नहीं आता है क्योंकि भरपूर प्रचार कोरोना पाॅजिटीवों की संख्या और हर तरह की जानकारी जागरूक नागरिकों तक पहुंचने के बावजूद कितने ही लोग चालान और जुर्माने अथवा मुकदमा दर्ज होने के डर से भले ही पुलिस को देखकर मास्क लगा लें मगर ज्यादातर इसका उपयोग करते नजर नहीं आते हैं और सोशल डिस्टेसिंग की तो 100 में से 70 स्थानों पर अनदेखी की जा रही है। ऐसा करने वालों में गरीब से लेकर अमीर और अनपढ़ से लेकर पढ़े लिखों तक छोटे बड़े जनप्रतिनिधि और अधिकारी भी आए दिन इसका उल्लंघन करते नजर आते हैं। वो बात और है कि किसी भी रूप में ताकतवर व्यक्तियों के खिलाफ धोखे से भले ही कार्रवाई हो जाए वरना मध्यमवर्गीय और गरीबों पर ही सारे कानून लागू किए जा रहे बताये जा रहे है। अनलाॅक-2 शुरू होने के बाद संक्रमितों की संख्या में बढ़ोतरी लेकिन नागरिकों में डर समाप्त होता जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है कि यह तो इससे संबंध लोग ही जान सकते हैं। मगर मुझे लगता है कि जैसा हर मामलों में होता है कि जब किसी भी चीज की बहुतायत बढ़ जाती है चाहे वह आतंकवाद हो या मिठास उसका डर व महत्व समाप्त होने लगता है और ऐसा ही कोरोना को लेकर नजर आ रहा है क्योंकि जब लोग इसे लेकर चर्चा करते हैं तो डर के साथ साथ मुस्कुराते भी हैं। किसी के मरने की खबर सुनते हैं तो यह सोचकर परेशान होते हैं कि इसका अंतिम संस्कार कैसे होगा मगर इसकी चर्चा नहीं करते कि इससे कैसे बचा जाएगा।
अभी एक खबर पढ़ी थी कि अगस्त तक कोरोना की दवाई बन सकती है। मगर वैज्ञानिकों ने यह कहकर कि अभी ऐसा कुछ नहीं है। इस आशा को भी खत्म कर दिया। बाबा रामदेव ने कोरोनिल बनाई उस पर सवाल खड़े हो गए। परिणामस्वरूप दावे तो बहुत हो रहे हैं लेकिन मरीज भगवान के नाम पर ठीक हो रहे हैं। आज पड़ने को मिला कि हवा से भी हो सकता है कोरोना। पिछले तीन माह में कोरोना कैसे होगा इसकी सत्यापित स्थिति तो सरकार के द्वारा प्रसारित की जा रही है लेकिन घर घर में मौजूद डाॅक्टरों की जो राय उभरकर आ रही है अगर उसको ध्यान में रखकर सोचा जाए तो आदमी बिना कोरोना हुए ही भवान को प्यारा हो सकता है। मेरा मानना है कि सरकार बिना मांगे मुफ्त की सलाह देने वालों पर रोक लगाएं क्योंकि कोरोना संक्रमण के साथ साथ कितने ही लोग तनाव और डिपे्रशन पैदा होने से आत्महत्या भी कर रहे हैं जिन्हें रोका जाना बहुत जरूरी है। बीते दिवस 37 वर्षीय पत्रकार ने दिल्ली में ओर 55 वर्षीय एक व्यक्ति ने पुणे में तो 40 वर्षीय महिला ने कोयमबटूर में आत्महत्या कर ली। ऐसी मौतों को रोकने के लिए जबान चलाउ सलाहकारों पर रोक लगाना वक्त की सबसे बड़ी मांग है।

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