धार्मिक स्थल खुलवाने के मामले में राजनेता खामोश क्यों

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बाजार उद्योग पार्क शराब के ठेके आदि देशभर में अनलाॅक होने का सिलसिला शुरू हो गया है। धीरे धीरे एक जुलाई से कुछ जिलों और प्रदेशों में स्कूलों में स्टाफ भी पहुंचने लगेगा। सरकारी कार्यालयों में तो कुछ शर्तों के साथ पिछले लगभग एक माह से अधिकारियों व कर्मचारियों का आवागमन शुरू हो गया है। अपने देश में धार्मिक विचारों से आम आदमी ओत प्रोत है। और यह सब जानते है कोरोना महामारी से पूर्व सभी राजनीतिक दल धार्मिक मामलों से संबंध बिंदुओं से बचने का प्रयास करता नजर आते थे। लेकिन आज जिन जिन क्षेत्रों में छूट दी गई है उनमें से ज्यादातर में खुलेआम कोरोना से बचाव और लाॅकडाउन के नियमों के उल्लंघन से संबंध फोटो देखने को मिलते है।ं कुछ लोगों ने धारा 144 को भी मजाक बनाकर रख दिया है। लेकिन सत्ताधारी लोगों या उनके समर्थकों के खिलाफ तो आसानी से कोई कार्रवाई होती नजर नहीं आ रही है। हां विपक्षी दलों और आम जनता के विरूद्ध मुकदमे ओर जुर्माने की कार्रवाई खूब हो रही है। बीते दिनों यूपी के मेरठ के वेस्ट एंड रोड स्थित बालाजी मंदिर के महंत महामंडलेश्वर शनि पीठाधीश्वर सनातन धर्म परिषद उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष 108 श्री महेंद्र दास जी महाराज द्वारा मंदिर खुलवाने के लिए एक दिन का उपवास भी रखा गया था और कहा गया था कि तीन दिन के अंदर मंदिर नहीं खुले तो वह फिर हड़ताल करेंगे। लेकिन परिचितों के समझाने और माहौल को दृष्टिगत रख यह कार्य छह दिन के लिए आगे बढ़ा दिया गया लेकिन अब तमाम संगठन देशभर में धार्मिक स्थलों को खोलने की मांग कर रहे हैं। इनका कहना है कि एक तो इनके बंद होने से इनसे संबंध पुजारियों प्रसाद वालों फूल माला विक्रेताओं और धार्मिक जनों को मंदिरों तक ले जाने वाले वाहन चालकों के परिवार के समक्ष रोजी रोटी का सवाल खड़ा होने लगा है। दूसरे जब ठेकों पर भीड़ लग रही है तो इतनी भीड़ तो मेलों आदि को छोड़कर धार्मिक स्थानों में कम ही नजर आती है। ऊपर से कई के संचालक द्वारा लाॅकडाउन के नियमों का पालन करने के लिए लिखित रूप मंे दिया गया है। देश के कई जिलों में धार्मिक स्थान खुल गए हैं। जहां नहीं खुले वहां के धार्मिक जनों में कसमसाहट व्याप्त है।
सवाल यह उठता है कि छोटे छोटे मुददों पर राजनीति करने वाले विपक्षी दलों के नेता और कार्यकर्ता आम आदमी की भावनाओं से जुड़े इस मुददे पर खामोश क्यों हैं और सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता चुप्पी क्यों साधे हुए हैं जबकि सबको पता है कि धार्मिक स्थान खुलने से कहीं कोई बड़ा बवाल आने वाला नहीं है। मगर राजनीतिक दलों के नेताओं की चुप्पी के चलते सरकार भी इस ओर शायद ध्यान नहीं दे रही है। पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी अपनी तरफ से इस संदर्भ में कोई बड़ा फैसला शायद ले नहीं पा रहे हैं। आज महंत महेंद्रदास जी के कहे गए शब्द वजनदार लगते हैं कि इस मामले में सभी को एकजुट होकर कोरोना से बचाव के लिए एहतियात और लाॅकडाउन के नियमोें काा पालन कराने का आश्वासन देते हुए शांतिप्रिय तरीके से धार्मिक स्थान खुलवाने के प्रयास अपने अपने जिलों के एसपी व अन्य अधिकारियों से मिलकर करने चाहिए और इस संदर्भ में वो देश व प्रदेश की राजधानियों में बैठे अपने नेताओं से भी आग्रह कर सकते हैं कि वो प्रधानमंत्री गृहमंत्री प्रदेशों के सीएम आदि से मिलकर आम आदमी की आहत हो रही भावनाओं की ओर ध्यान दिलाते हुए धार्मिक स्थल खुलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। मुझे लगता है कि जो पहल करेगा उसे भविष्य में कम या ज्यादा लाभ भी जरूर प्राप्त होगा।

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चारधाम यात्रा उत्तराखंड वासियों को ही अनुमति क्यों
पूरी दुनिया में प्रसिद्ध उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा में इसके लिए बने देवस्थानम बोर्ड के सीईओ रविनाथ रमन के अनुसार उत्तराखंड से बाहर के श्रद्धालुओं को अभी चार धाम के दर्शन की अनुमति नहीं मिलेगी। 30 जून से स्थानीय श्रद्धालु ही दर्शन कर पाएंगे तथा एक जुलाई से भी राज्य के स्थायी निवासियाों के लिए सशर्त चार धाम यात्रा की अनुमति दी जाएगी। शायद आज इस संदर्भ में आदेश भी जारी होगा। इस क्रम में कैंटोनमेंट जोन में आने वाले श्रद्धालुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की बात तो समझ में आती है लेेकिन बाहरी श्रद्धालुओं के पास स्थानीय निवास का प्रमाण पत्र होने के बाद भी उत्तराखंड वासियों को को ही अनुमति मिलना ठीक नहीं कहा जा सकता। मुझे लगताा है कि उत्तराखंड सरकार को यह पक्षपात ना कर सभी श्रद्धालुओं को क्रमानुसार आॅनलाइन पंजीकरण कराकर लाॅकडाउन के नियमों का पालन करने की शर्त पर चार धाम की यात्रा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। क्योंकि भगवान के दर्शनों पर इस तरह की रोक ठीक नहीं है। सामूहिक प्रतिबंध तक तो यह ठीक था लेकिन अब इससे क्षेत्रवाद की भावना को भी बढ़ावा मिलने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

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