कोरोना से बचना है तो लें विटामिन डी

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नई दिल्ली। क्या आप में हैं ये लक्षण थकान‚ कमजोरी महसूस करना‚ कमर व हड्डियों में दर्द‚ मांसपेशियों में खिंचाव व पिंडलियों में दर्द‚ हल्का बुखार व छोटे बच्चों में बाल झड़ना, टेस्ट से जानी जाती है कमी इसके लिए विटामिन डी का टेस्ट कराया जाता है। चूकि विटामिन डी का काम शरीर में कैल्शियम का लेवल बनाए रखना है‚ इसलिए हड्डियों और खून में कैल्शियम का लेवल चेक करने के लिए विटामिन डी के साथ कैल्शियम का टेस्ट भी कराना जरूरी होता है। हड्डि़यों में कैल्शियम का स्तर जानने के लिए डेक्सा स्कैन टेस्ट कराया जाता है॥। किनके लिए जरूरी है टेस्ट ॥ विटामिन डी का टेस्ट ज्यादातर ऐसे लोगों के लिए एक स्क्रीनिंग उपकरण के रूप में किया जाता है जो उच्च जोखिम वाली श्रेणी के तहत होते हैं। इनमें डार्क स्किन‚ मोटापे से ग्रस्त लोग‚ कुछ दवाएं (फिनिटोइन‚ स्टेरॉयड) लेने वाले लोग और बुजुर्ग शामिल हैं। इसके अलावा‚ यदि आप ऑस्टियोपोरोसिस‚ डायबिटीज या किडनी की बीमारी से पीडि़त हैं तो आपका डॉक्टर आपको विटामिन डी की कमी का टेस्ट कराने को कह सकता है। इसकी रिपोर्ट को ऐसे पहचानें॥ टेस्ट के बाद भी किस व्यक्ति में विटामिन ड़ी की कमी है और किसमें नहीं‚ यह ड़ाक्टर ही बता सकते हैं। इसका लेवल अलग–अलग लैब अलग–अलग तरीके से तय करती हैं। अमूमन यह स्तर ८० से १०० नैनो ग्राम के बीच सामान्य माना जाता है। इसके बावजूद अपने आप ये तय न करें कि आप में विटामिन ड़ी की कमी है। अक्सर देखा गया कि रिपोर्ट के आधार पर कुछ लोग अपने विटामिन ड़ी की दवा लेना शुरू कर देते हैं जो कि नुकसानदेह हो सकता है॥। ज्यादा कमी हो तो इंजेक्शन से भी पूरी ॥ टेस्ट कराने के बाद जिन रोगियों में विटामिन डी का लेवल काफी कम होता है‚ उन्हें इंजेक्शन दिया जाता है। शरीर में विटामिन डी के डोज की कितनी जरूरत है‚ यह ड़ाक्टर ही तय कर सकते हैं। अमूमन तीन महीने तक इंजेक्शन के बाद यह कमी पूरी हो जाती है। यह इंजेक्शन महीनें में एक बार लगाया जाता है। विटामिन ड़ी का काम हड्डियों के अंदर कैल्शियम का सही लेवल बनाए रखने का होता है। इसलिए ड़ाक्टर हड्डि़यों में कैल्शियम का लेवल पता लगाने के लिए डे़क्सा स्कैन टेस्ट कराते हैं। इंजेक्शन के साइड इफेक्ट आमतौर पर इंजेक्शन देना सुरक्षित होता है। लेकिन कभी कभार छोटी मोटी दिक्कत हो सकती है। कई बार इंजेक्शन देने के बाद सुई वाली जगह पर मांसपेशियां फूलने जैसे साइड इफेक्ट देखने को मिलते हैं। जो इस बात पर निर्भर करता है कि आपको इंजेक्शन किस प्रकार से दिया गया है। अक्सर ऐसा तभी होता है जब तेजी से इंजेक्शन लगाया गया हो। हालांकि यह कोई गंभीर बात नहीं है। कुछ दिन बाद यह अपने आप ठीक हो जाता है। ओरल सस्पेंशन है सबसे आसान तरीका आजकल विटामिन डी की कमी को दूर करने के लिए पीने वाली दवा लेना सबसे अच्छा तरीका माना जाता है। यह दवा तीन महीने तक हफ्ते में एक बार ली जाती है। कोर्स पूरा होने के तीन महीने बाद शरीर में विटामिन ड़ी का लेवल ठीक हो जाता है तो दवा बंद करदी जाती है क्योंकि इसकी ज्यादा डोज लेना भी शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। शरीर में विटामिन डी की पूÌत के लिए रोगियों को दो तरह की दवा दी जाती है जिसमें एक पीने वाली और दूसरी मुंह में ही घुलने वाली होती है। जिन लोगों में इस विटामिन की ज्यादा कमी नहीं होती है‚ ड़ाक्टर उन्हें टैबलेट और प्राकृतिक तरीके से इसकी कमी पूरी करने की सलाह देते हैं। जिसमें आधा घंटे की धूप के साथ उन चीजों को खाने की सलाह दी जाती है जिनमें यह विटामिन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है॥। ज्यादा दवा लेने के नुकसान॥ विटामिन डी की दवा ज्यादा लेने से नुकसान भी हो सकता है। हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि डॉक्टर आपको किस प्रकार की दवा दे रहे हैं क्योंकि मुंह से लिए जाने वाले विटामिन डी का कोई नुकसान नहीं है। एक्स्ट्रा विटामिन डी शरीर से यूरीन के रास्ते बाहर निकल जाता है। लेकिन इंजेक्शन से लिया जाने वाला सारा विटामिन डी शरीर में ही रह जाता है। इससे शरीर में जगह कैल्शियम बनना शुरू हो जाता है। इस स्थिति में उल्टी आना‚ भूख न लगना‚ शरीर में दर्द रहना‚ चिड़चिड़ापन रहना‚ मांसपेशियों में दर्द होना शुरू हो जाता है।

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