पृथ्वीराज चव्हाण जैसा नेता अगर मंदिरों की संपदा पर नजर ना ही डालें तो ही अच्छा है

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महान विचारक व राजनीतिज्ञ तथा नीतिकार आचार्य चाणक्य का जानकारों के अनुसार मानना था कि किसी धर्म को समाप्त करना हो तो उसके धर्म स्थलों मठ मंदिरों को कमजोर कर दो। मेरा मानना है कि इससे एक लाइन और आगे इन्हें आर्थिक रूप से कमजोर कर दो और जोड़ दो जिससे ये आगे की सोच ही ना सके। अपनी परेशानियों में ही घिरे रहे। शायद यही अब कांग्रेस के महाराष्ट के प्रमुख नेताओं में से एक पूर्व सीएम पृथ्वीराज चव्हाण सोच रहे हैं। या जो भी उनके विचार हो फिलहाल उनका यह कहना कि मंदिरों में पड़े सोने को अधिकृत कर लिया जाए अपने आप में यह दर्शाता है कि कहीं ना कहीं कुछ कांग्रेसी आज भी हिंदुओं के धर्मस्थलों की आर्थिक स्थिति पर निगाह लगाए हुए हैं। क्योंकि जानकारों के अनुसार वल्र्ड गोल्ड काउंसिल का मानना है कि देश के मंदिरों में अनुमानित रूप से एक ट्रिलीयन डाॅलर (करीब 76 लाख करोड़ रूपये) का सोना है। सवाल यह उठता है कि पृथ्वीराज चव्हाण जैसे नेताओं को सिर्फ बहुसंख्यकों के धार्मिक स्थल ही क्यों दिखाई देते हैं। उन्हें और कुछ और खासकर जो नेताओं पर पैसा है वो क्यों नजर नहीं आता। मुगलकाल में इतिहासकारों के अनुसार मंदिरों के टूटने और उन्हें लूटने का चक्र चला। फिर अंग्रेजों ने शायद यही प्रयास किया। लेेकिन धर्म के लिए किसी भी हद तक जाकर संघर्ष करने की हिंदू समाज की भावना को देखते हुए बताते हैं कि अंग्रेजों ने सीधी टक्कर लेने की बजाय हिंदुओं को विभाजित किया और नए नए कानून बनाकर हिंदु टैंपल का पैसा लोगों का कहना है कि विभिन्न तरीकों से बर्बाद करने की कोशिश की।
इसी कारण अंग्रेज अपनी सोच में शायद सफल नहीं हो पाए। लेकिन आज हमारे ही समाज के कुछ नेता मंदिरांे की संपत्ति पर नजर लगाए हुए हैं। लेकिन उस पर बुरी नजर रखने वाले यह भूल रहे हैं कि सरकार किसी की भी हो राजा कोई भी हो जिसने भी धार्मिक स्थलों की संपत्ति पर नजर रखी वो सफल नहीं हो पाया। इसलिए पृथ्वीराज जी यह समझ लो कि शायद इसी कारण से पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरागांधी को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। इसलिए अब तो बहुसंख्यक जागरूक भी है और अपने अधिकारों को पहचानता भी है और अधिकार प्राप्त करने के लिए कानून का सहारा लेने के लिए उसे कोई नहीं रोक सकता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए नेताजी जो भावना मंदिरों की संपदा को लेकर आपके या आप जैसे लोगों के मन में उमड़ रही है उसे अगर वहीं दबा दिया जाए तो अच्छा है। क्योंकि वर्तमान में बहुसंख्यक और मंदिरों के संचालक अपनी मर्जी से देश और मानवहित में कितना भी सहयोग कर सकते हैं लेकिन जबरदस्ती इनसे कोई एक पैसा भी शायद नहीं ले पाएगा। यह तथ्य हमेशा पृथ्वीराज चव्हाण को ही नहीं सबको ध्यान रखना होगा।
बताते चलें कि वर्तमान में देश में लगभग नौ लाख मंदिर हैं जिनमें से चार लाख सरकार के पास हैं। मेरा तो मानना है कि सरकार को उन मंदिरों को भी जनप्रतिनिधियों को प्रशासक बनाकर या धर्माचार्यों के हाथों में उनकी बागडोर सौंप देनी चाहिए। जिससे इनका सही रखरखाव हो सके। और कभी आवश्यकता पड़े तो जनता के सहयोग से एक सामूहिक विचारधारा तय कर उसका उपयोग देश के विकास और राष्ट्रहित में किया जा सके। लेकिन फिलहाल जो यह भावना चव्हाण जी के मन में आई है उसे वह निकालकर बाहर खड़ा करे तो ही अच्छा है क्योंकि अभी तो देश में कुछ जगह ही मठ मंदिरों की सुरक्षा समितियां गठित हुई है । मगर अगर ऐसी चर्चा चली तो देश के हर मंदिर के लिए सुरक्षा समिति होगी जिससे हजारों की तादात में लोग जुड़े होंगे। ऐसे में धार्मिक संस्थाओं के पैसे पर निगाह रखने वालों की जो फजीहत हो सकती है उसका अंदाजा अभी चव्हाण साहब जैसे नेताओं को नहीं है।

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-रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

 

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