फाइनेंस कंपनियों में पैसा जमा और लाॅटरी डालने वाले हैं परेशान

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पिछला इतिहास रहा है कि जब भी कोई बीमारी या महामारी आकस्मिक आपदा आई है उसने मानव को काफी नुकसान पहुंचाया है लेकिन वो हमेशा थोड़ा डगमगाया लेकिन संभलकर खड़ा हो गया। आजकल हम कोरोना की माहमारी का दंश झेल रहे हैं। इसको भगाने के लिए लागू लाॅकडाउन जरूरी है लेकिन उसके कारण कई परेशानियां भी विभिन्न क्षेत्रों में खड़ी हो गई हैं जिनमें से कुछ सामने दिखाई दे रही हैं। कुछ के भविष्य में उभरकर आने की संभावना है।
देशभर में घरों में प्रतिबंध के बावजूद कुछ महिला और पुरूषों द्वारा छोटी छोटी रकम से लेकर बड़े बड़े रूपयों तक की लाॅटरियां डाली जाती है। जिनका हिसाब डालने वाले और डलवाने वाले के अलावा किसी के पास नहीं होता और वो भी मौखिक रूप से ही चलता है। इसी प्रकार देशभर में चलने वाली कुछ फाइनेंस कंपनियां के बारे में भी बहुत विस्तार से कहने की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार पांचों अंगुलियां एक समान नहीं होती उसी प्रकार सारे लाॅटरी डालने वाले और फाइनेंस कंपनी चलाने वाले एक से होते हैं यह भी नहीं कहा जा सकता लेकिन जिस प्रकार से पिछले दो दशक में लाॅटरियों और फाइनेंस कंपनियों में पैसा मारा गया उसका इतिहास भी बड़ा है। और इनके द्वारा या तो किसी को कुछ दिया ही नहीं गया और वादा भी किया गया तो बाद में हाथ खड़े कर दिए गए। ऐसे लोगों का एक बड़ा चिठठा पुराने लोगों की यादों में आज भी मिल जाएगा।
इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए सामूहिक रूप से तो कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा है लेकिन लाॅटरी डालने वालों ओैर फाइनेंस कपनियों में पैसा रखने वालों में यह खुसर पुसर खूब सुनाई दे रही है कि कहीं लाॅकडाउन की आड़ में जिन लोगेां ने लाॅटरी डाल रखी थी और जो लोग फाइनेंस कंपनी चला रहे थे वो कहीं स्थिति ठीक होते ही हाथ खड़े कर दें। इनसे संबंध पूर्व की घटनाओं को देखकर ध्यान से सोचा जाए तो यह पूरी तौर पर गलत भी नहीं है क्योंकि ऐसा पहले होता रहा है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसे में वो आदमी क्या करें जिसने थोड़े से लालच या लाभ में लाॅटरी डाली या फाइनेंस कंपनियों में पैसा जमा कराया। तो इसके बारे में तो मैं सिर्फ यही कह सकता हूं कि कोई लिखित शिकायत तथ्यों के साथ जिम्मेदार अधिकारियों या पुलिस में नहीं कर सकता क्योंकि यह सब जुबानी या कच्चे कागज की स्लिप पर ही चलता बताया जाता है। लेकिन समझदारी इसमें है कि प्यार के साथ या तो आवश्यकता दर्शाकर अपना पैसा निकाल लेना चाहिए और संभव ना हो तो कम से कम जो स्थिति है उसे वहीं छोड़ जो पैसा चला गया उसकी वापसी के लिए आगे किसी भी रूप में किसी लाॅटरी या फाइनेंस कंपनी संचालक को पैसा नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि जो चला गया सो चला गया। ग्रामीण कहावत सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहलाता को आत्मसात कर जो गया उसे भूलकर जो अपनी गांठ मे हैं उसे तो बचाकर रखा ही जा सकता है। हां इनके पास गए पैसे की वापसी के लिए क्या क्या रास्ते हो सकते हैं। इसकी संभावनाएं तलाशने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन गए पैसों को लेकर चिंता करना या तनाव पालना इस समय बहुत कठिन है क्योंकि कोरोना और लाॅकडाउन ही टेंशन देने के लिए बहुत है। इस समय किसी और को ना ही पाला जाए तो अच्छा है

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