कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक प्रधानमंत्री का जनता कफ्र्यू रहा सफल

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जातपात अमीर गरीब की भावना भूल सबने घंटे घड़ियाल थाली व ताली बजाकर किया उदघोष

दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस के खौफ से आम आदमी को बचाने तथा अपने देश में इसके प्रभाव को कम करने के दृष्टिकोण से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा एक दिन के जनता कफ्र्यू के किए गए आहवान का देश के गली मुहल्लों गांव देहातों व शहर व कस्बों तक में व्यापक असर रहा और पहली बार नजर आया कि हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई का जो एक नारा अपने देश में लगता है वो साकार हो रहा था। क्योंकि सबने अपने घर से निकलने में तो सावधानी बरती ही। सभी धर्मों के धार्मिक स्थल भी नहीं खुले और उन पर भीड़ नहीं लगी। बीती 22 मार्च को दिखाई दिया कि ना तो कोई हिंदू है ना मुसलमान। सब इंसान है और वक्त पड़ने पर संयम भाईचारा और एकता के साथ हर कठिनाई का मुकाबला करने के लिए एकजुट हैं। तो दूसरी ओर यह समय इस चर्चा का तो शायद नहीं है लेकिन जो दिखाई दे रहा था उससे यह लगा कि मोदी मैजिक आम आदमी के सिर चढ़कर बोल रहा था। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कोरोना नामक इस अदृश्य खामोश खतरे का मुकाबला करने के लिए सब एक तो रहे ही आगे भी आवश्यकता पड़ी तो देशभर और अपने हित में हम सभी एकजुट रहेंगे। इसका उदाहरण देश के 340 जिलों 18 राज्यों में लागू लाॅक डाउन से संबंध जो खबरें आज सुनने और पढ़ने को मिली उनसे यह संदेश स्पष्ट मिल रहा था कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री डाॅ हर्षवर्धन यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ व तमाम प्रदेशों के सीएम द्वारा जो संभावना व्यक्त की जा रही है कि लाॅकडाउन की सीमा आगे भी बढ़ सकती है जनता कफ्र्यू दोबारा लगाने की नौबत भी आ सकती है। और इस वायरस की समाप्ति के लिए इससे भी बड़े कदम उठाने पड़े तो फिलहाल यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि जनता स्वस्थ और सुखी भविष्य को ध्यान में रखते हुए पूरी तौर पर हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

मैनपुरी में पहला मामला
बताते हैं कि महामारी का पहला मामला देश के प्रदेश यूपी के जिला मैनपुरी में शायद दर्ज किया गया है। जो इस बात का प्रतीक है कि अभी निकट भविष्य में इससे पूरा छुटकारा भी मिल सकता है और कुछ सख्त कदम भी सरकार को उठाने पड़ सकते हैं।

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1974 में हुआ रेलवे का चक्का जाम
देश में 31 मार्च तक लगभग यातायात का पूर्ण रूप से चक्का जाम कहा जा सकता है क्योंकि रेल, हवाई और बस यात्राएं तथा निजी वाहनों से आना जाना कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़ प्रतिबंधित हैं। परिस्थितियां भले ही अलग रहीं हो लेकिन रेलवे का इतना बड़ा चक्का जाम बतात हैं कि 1974 में टैक्सी यूनियन महाराष्ट्र के नेता तथा देश के जाने माने यूनियन लीडर श्री जार्ज फर्नाडिज के आहवान पर हुआ था।

गणेश जी के दूध पीने के बाद अब घंटे घड़ियाल बजे
जिस प्रकार से गत दिवस प्रधानमंत्री के आहवान पर एक दिवसीय जनता कफ्र्यू के दौरान शाम को पांच बजे पूरे देश में जातपात गरीब अमीर का भेदभाव भूल राजा और रंक सबने अपने घरों की छत व बाहर मंदिरों व बाजारों में घंटे घड़ियाल ताली और थाली, शंख व बैंड बजाए इतने स्तर पर पूर्व में जैसा कि पता चलता है और आज पढ़ने को मिला चंद्रास्वामी ने एक समय घोषणा की थी कि गणेश जी दूध पियेंगे और उसके बाद पूरे हिंदुस्तान में गणेशजी के दूध पीने की चर्चा चली। धार्मिक प्रवृति के लोगों ने मन्नतें मांगी और लोग दूध पिलाने पहुंचे। जो उस समय नजारा नजर आता था जनता कफ्र्यू के दौरान हर घर में वैसा नजर आया।

हर खांसी बुखार जुकाम कोरोना नहीं
कोरोना वायरस के बारे में जैसे जैसे समय बीत रहा है नई नई बातें उभरकर सामने आ रही है। इसके जैसे लगभग एक दर्जन वायरस वर्तमान में प्रचलन में बताए जाते हैं और इन सबमें खासी बुखार और जुकाम की शिकायत होती हैं। इसलिए अब आवश्यकता हो गई है कि हर खांसी के मरीज को हम कोरोना प्रभावित ना समझें। डाॅक्टरों के लिखने पर निजी लैब में इसकी जांच का काम शुरू हो चुका है। आईआईटी के शोधकर्ताओं ने इसकी सस्ती जांच की पद्धति विकसित की है तो कुछ का कहना है कि नमक का पानी इसमें फायदेमंद हो सकता है। तो वैदिक जीवन पद्धति से भी इसके प्रभाव को रोकने में सफलता होना बताया जा रहा है जो अपने आप में एक आशा की किरण है।

पहले दवा क्यों नहीं बनाई
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ का कहना है कि आईसोलिस्ट पद्धति से युक्त दस हजार बेड की व्यवस्था कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए की जा रही है। बाकी भी सरकारी अस्पतालों में इसके लिए वार्ड बनने की सुविधा है। लेकिन सवाल जो सबसे अहम वो यह है कि जानकारों के अनुसार 19 साल पहले यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटर में कोरोना वायरस के संदर्भ में पढ़ाई की जा रही है तो आजतक हमारे वैज्ञानिकों ने पहले से ही इसक टीका क्यों तेैयार नहीं किया और सरकार ने इस संदर्भ में पूर्व में सक्रियता क्यों नहीं दिखाई।

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यह कोरोना की समाप्ति में बाधा
जिस प्रकार हाथ की पांचों अंगुलियां एक समान नहीं होती उसी प्रकार हर व्यक्ति की सोच भी एक सी कैसे हो सकती है इसका जीता जागता उदाहरण जनता कफ्र्यू के दौरान और उससे पहले दिन देखने को मिला कि कुछ परिवारों ने अपने यहां आयोजित शादी व अन्य समारोंहों की तारीखें बदल दी तो कई विवाह मंडप संचालकों ने कारण कुछ भी रहा हो सभी प्रतिबंधों के बावजूद अपने यहां समारोह आयेाजित कराए। उनके विरूद्ध क्या कार्रवाई होगी यह तो अलग बात है कि लेकिन यह कहने में हर्ज नहीं है कि ऐसे लोग कोरोना को दूर करने में एक बड़ी बाधा जरूर है।

धरना रहा जारी
नागरिकता कानून का जो विरोध कोरोना वायरस के आगमन से पूर्व जारी था वो लगभग 90 प्रतिशत समाप्त होता नजर आ रहा है क्योंकि शाहीन बाग धरने में गिनती के लोग दिखाई दिए तो लखनऊ और अलीगढ़ में कुछ कुछ ऐसा ही हाल रहा मगर यह सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि वक्त की मांग ओैर इंसानियत के दृष्टिकोण से मुझे लगता है कि हर विरोध को दरकिनार कर एकजुट होकर खड़े होना चाहिए।

देशभर में हुआ कमाल
कोरोना वायरस से शायद इतने बड़े स्तर पर धार्मिक स्थल पहली बार बंद हुए हैं तो दूसरी ओर देशभर में लगने वाले ऐतिहासिक मेले जो आदमी के लिए अपनों से मिलने का माध्यम बनते थे वो मोदीनगर में लगने वाला महामाया मेला 102 साल बाद आगे खिसक गया। तो लगभग साढ़े तीन शताब्दी से मेरठ में लगने वाला नौचंदी मेला भी इस वर्ष आगे सरक गया। तो उत्तराख्ंाड के जिला उद्धमसिंह नगर के कांशीपुर क्षेत्र में धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चेती मेला भी इस व्यवस्था से प्रभावित हो रहा है। और लगता हे कि देशभर में लगने वाले अन्य मेले भी अपने समय पर नहीं लग पाएंगे। कुछ स्थगित तो कुछ आगे बढ़ सकते हैं।

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सोशल मीडिया ही नहीं विश्वास तो किसी पर नहीं किया जा सकता
सोशल मीडिया के प्रभाव को वर्तमान समय में कोई भी नहीं नकार पा रहा है। देश और प्रदेश की सरकारें इसे अपना रही है तो हर सरकारी कार्यायल में इसका वर्चस्व कायम है। उसके बावजूद मामला चाहे कोरोना जैसी बीमारी को हो या देश में कहीं अशांति फैलने का सबके दौरान सोशल मीडिया पर अंगुली उठाने की कोशिश की जाती है। यह बात तो मैं भी कहता हूं कि सोशल मीडिया पर प्रसारित हर बात सही नहीं होती और अगर इससे जुड़े लोग चाहते हैं कि नागरिक उनकी बात पर विश्वास करें तो इससे जुड़े लोगों को अपनी कार्यप्रणाली और सोच में सुधार लाना होगा लेकिन यह भी सही है कि इस श्रेणी में सोशल साइटें ही नहीं प्रिंट और इलेक्टोनिक मीडिया या हर नागरिक को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया को बदनाम करने वाले अपने गिरेबान में भी झांक कर देखें तो ज्यादा अच्छा है।

कुछ पुलिसवालों के कारण
दोस्तों कोरोना वायरस को लेकर एकदिवसीय जनता कफर्यू के दोैरान प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों तथा चिकित्सकों की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही और चारों तरफ इसकी तारीफ भ्ीा हो रही है क्योंकि बंद होने से चली रेल अपने गंतव्य तक पहुंची तो उनके यात्रियों को उनके घर तक पहुंचाया गया और कई जगह बिना काम सड़क पर घूम रहे लोगों को गुलाब के फूल देकर समझाकर उनके घरों को भेजा। इसके लिए वाकई यह सब बधाई के पात्र हैं लेकिन यूपी के डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी और उपप्रमुख सचिव गृह अवनीश अवस्थी के आदेशों कि किसी से दुव्यर्वहार ना किया जाए उसके बावजूद कुछ पुलिसकर्मियों द्वारा दबंगई दिखाई गई वो सही नहीं था। ऐसे में 250 चालान एक शहर में उचित नहीं कहे जा सकते। थाना सदर बाजार क्षेत्र में एक व्यापारी के गले में पोस्टर डालकर कि मैं समाज का दुश्मन हूं और मवाना में महिला के थप्पड़ मारा जाना आदि घटनाएं उचित नहीं है। लाॅकडाउन के दौरान ऐसी घटनाओं से पुलिस के कर्मचारी बचें यह वक्त की मांग कही जा सकती है।

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