पहलवान कुछ ऐसे उठाते हैं 800 किलो का पत्थर

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जालोर 7 मार्च। राजस्थान के जालोर के चितलवाना उपखण्ड मुख्यालय से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर एक गांव है, जिसका नाम है कुंडकी. जहां तकरीबन 200 साल से चली आ रही पहलवानी परखने की विधि आज भी कायम है. यहां एक 800 किलो वजन का पत्थर, जिसे लोग स्थानीय भाषा में घट के नाम से जानते हैं इसको पलटने की विधि आज भी कायम है. जो व्यक्ति इस आठ क्विंटल पत्थर को पलट देता है उसे पहलवान माना जाता है. क्षेत्र के गांवों के हजारों लोग धुलंडी के दिन यहां आते हैं और अपनी शारीरिक ताकत आजमाकर इस प्रतियोगिता में भाग लेते हैं. हर वर्ष चार-पांच लोग उस पत्थर को पलटने में कामयाब होते हैं.

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गांव के बुजुर्गों ने बताया कि यह पत्थर आज से 200 साल पहले यहां मंदिर, कुआं और टांका बनाने के लिए चूना पिसाई के लिए चक्की का है. जिससे चूना पिसा जाता था और आज से तकरीबन 200 साल पहले यह परम्परा शुरू हुई थी. जिससे यह हर साल होली के अगले दिन धुलंडी पर यह परंपरा होती है. इसमें सैकड़ों लोग पहुंचते हैं और इसे उठाने का प्रयास करते हैं. प्रतियोगिता में चार या पांच लोग ही कामयाब होते हैं. जो व्यक्ति इसे उठाते हैं उसे पहलवान माना जाता है.

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एक ही परिवार के लोग 200 साल से उठा रहे हैं यह पत्थर

कुंडकी गांव के मोतीराम गोदारा के परिवार में से 200 साल से लगभग चार या पांच लोग इस पत्थर को उठा रहे हैं. बताया जा रहा है कि इसी परिवार के सबसे ज्यादा लोग हर होली पर इस पत्थर को उठाते हैं और यह परिवार ताकतवर माना जाता है. गत होली पर भी इसी परिवार को सबसे ज्यादा सदस्यों ने ही इस घट को उठाया था.

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बहरहाल, इसी होली के अवसर पर भी आस-पास के सैकड़ों युवा पहलवान बनने के लिए इस 8 क्विंटल वजनी पत्थर को उठाने के लिए आएंगे और कोशिश करेंगे. वहीं, इस परंपरा को देखने के लिए भी कई लोग उमड़ेंगे.

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