गुजरात और छत्तीसगढ़ की घटनाएं हैं शर्मनाक

16
loading...

कब तक महिलाओं का रूढ़िवादी परंपराओं के चलते होता रहेगा अपमान
दुनिया की आधी आबादी के मान सम्मान को कायम रखने और हर क्षेत्र में पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने का प्रयास कर रही माताओं बहनों आदि की सुरक्षा और उन्हें रूढ़िवादी शर्मनाक सोच से बचाने के लिए समाज और सरकार के साथ अग्रणीय सोच वाले नागरिक पूरी तौर पर प्रयास कर रहे हैं। माता बहनों को आदर देने की परंपरा कोई आज की नहीं है। हमारे समाज में आदिकाल से इनकी पूजा होती आ रही है। उसके बावजूद वर्तमान संचार व वैचारिक क्रांति और हर क्षेत्र में सुधार की चल रही लहर के बावजूद कुछ ऐसी घटनाएं हो रही हैं जो हर व्यक्ति को शर्मसार करने में सक्षम हैं चाहे उसका मतलब उनसे हो या ना हो। सवाल यह उठता है कि आखिर हमारी केंद्र और प्रदेश की सरकार इस मामले में बजट का भारी हिस्सा देश के हर कोने में महिलाओं की तरक्की और प्रगति हेतु जागरूकता के लिए खर्च कर रही है तो हमारी बेटियां भी दुनियाभर में उद्योग हो या खेल, राजनीति हो अथवा शिक्षा, धर्म हो या विज्ञान अपनी सोच का परचम अग्रणीय रूप से फहरा रही है। अब तो सेना में उन्हें अपने साहस और कौशल का प्रदर्शन कर देश की रक्षा के लिए भी बढ़ावा दिया जा रहा है। पुलिस और प्रशासनिक व चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी काबलियत का डंका वह पहले से ही बजाए हुए हैं।

कुछ समय पूर्व प्रमुख फिल्म अभिनेता श्री अक्षय कुमार द्वारा मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को होने वाली परेशानी और मानसिक कष्ट को ध्यान में रखते हुए सैनेट्री पैड को लेकर एक फिल्म बनाई जो खूब चली। वर्तमान समय में देश के तमाम शहरों के स्कूलों में सैनेटी पैड निशुल्क बांटे जाने का काम चल रहा है तो कई सामाजिक व अन्य संगठन भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। और यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि मासिक धर्म जीवन का एक अंग है। इसे गलत रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। और कितने ही परिवार में इससे होने वाले रक्सस्राव से बचने के लिए सैनेट्री पैड खरीदने में असमर्थता के चलते जो पुराने उपाय बेकार कपड़े, लकड़ी का बुरादा अािद का उपयोग किया जाता था और उससे जो बीमारियां उत्पन्न होती थी उनसे बचाव के लिए अब कुछ शहरों में जानकारी अनुसार ऐसी मशीनें लगाई गई हैं जिनसे बटन दबाकर बिना पैसे के सैनेट्री पैड प्राप्त किया जा सकता है। और इस संदर्भ हर गांव कस्बा और महानगरों में ऐसी मशीनें लगवाने और निशुल्क सैनेट्री पैड बांटने की व्यवस्था को अंजाम दिए जाने की चर्चा है तो कितने ही खुली सोच और आर्थिक रूप से मजबूत अथवा जीवट टाइप के कई जागरूक नागरिकों द्वारा सस्ते सैनेट्री पैड बनाने की भी व्यवस्था की गई है। लेकिन यह बहुत ही सोचनीय विषय है कि मासिक धर्म के नाम पर आज भी महिलाओं को बेइज्जत करने के साथ साथ काफी मानसिक कष्ट दिए जा रहे हैं अथवा उन्हें उठाने पड़ते हैं जिन्हें किसी भी रूप में सही नहीं कहा जा सकता। देश के जागरूक और आर्थिक रूप से मजबूत व राजनीतिक मुखरता वाले प्रदेश गुजरात के भुज में पिछले सप्ताह 68 लड़कियों से मासिक धर्म न होने का सुबूत मांगा गया और फिर एक रेस्ट रूम में ले जाकर उन्हें अंतः वस्त्र उतारने के लिए मजबूर किया गया। अभी हम इस घटना को भूला भी नहीं पाए थे कि गुजरात के ही सूरत नगर निगम द्वारा संचालित एक अस्पताल में म्यूनिंसपल इंस्टीटयूट आॅफ मेडिकल एजुकेशन में फिटनेस के नाम पर 100 महिला कर्मचारियों को 10-10 के समूह में एक साथ निर्वस्त्र खड़े होने के लिए मजबूर किया गया। यह तो रही हर प्रकार से जागरूक देश के प्रदेश गुजरात की बात।

इसे भी पढ़िए :  मकान खाली करने को कहने पर 4 लाख का लगाया जुर्माना

पाठक यह जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि एक तरफ हम 21वीं सदी में प्रवेश कर रहे हैं। कई क्षेत्रों में रोबोट महिलाएं इंसानों की जगह लेने को तैयार हैं। मगर हमारे देश के प्रदेश छत्तीसगढ़ के राजानंद जिला मुख्यालय से 120 किलोमीटर दूर सीतागांव में आज भी मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को 3 से पांच दिन शीलन और बदबू भरी उन झोपड़ियों में रखा जाता है जिनकी कभी सफाई भी नहीं होती। यहां यह विषय बड़ा सोचनीय है कि आजतक वहां के प्रशासन और पुलिस तथा स्वास्थ्य विभाग द्वारा जागरूक नागरिकों व समाजसेवी संगठनों को साथ लेकर इस शर्मनाक कुप्रथा के खिलाफ अभियान क्यों नहीं छेड़ा गया।

समाज में बदलाव की बातें भले कितनी ही की जाए, मगर रूढ़िवादी परंपराओं की जड़ें अब भी गहरी हैं। यह छत्तीसगढ़ के राजनांद जिला में सीतागांव जाकर देखा और समझा जा सकता है, जहां महिलाओं और युवतियों को मासिक धर्म की अवधि में तीन से पांच दिन एक झोपड़ी में गुजारने पड़ते हैं। यह झोपड़ी गंदगी से भरी और बदबूदार होती है। राजनांदगांव जिला मुख्यालय से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर है सीतागांव। इस गांव में कई मजरा-टोला हैं। इन मजरा-टोलों में अधिकांश आदिवासी वर्ग के लोग रहते हैं। ये लोग अभी तक अपनी पुरानी परंपराओं और कुरीतियों पर ही टिके हुए हैं। यहां परंपरा है कि मासिक धर्म की अवधि में महिलाओं और युवतियों को घर से बाहर झोपड़ी में रहना होता है। गांव की महिला कौशल्या का कहना है कि यहां महिलाओं और युवतियों को मासिक धर्म के दौरान झोपड़ी में रखे जाने की परंपरा है, जो वर्षो से चली आ रही है। जिसे मासिक धर्म होता है, उसे झोपड़ी में ही रखा जाता है। इस दौरान वह अपने घर नहीं जाती। गांव के लोग खुद इस बात को मानते हैं कि इस झोपड़ी में न तो सफाई की व्यवस्था है और न ही इस तरफ किसी का ध्यान है। यही कारण है कि यहां की महिलाओं व युवतियों के मासिक धर्म के तीन से पांच दिन यातना भरे होते हैं। झोपड़ी गंदगी व बदबू से भरी होती है। यहां तीन से पांच दिन बिताने वाली महिला के बीमार होने की संभावना भी रहती है। गांव के निवासी पटेल दुर्गराम ने कहा, यह परंपरा खत्म तो नहीं हो सकती, इसलिए प्रशासन को कुटिया के स्थान पर एक पक्का कमरा बनवा देना चाहिए, जहां पानी और बिजली की भी सुविधा हो। स्थानीय लोगों ने बताया कि मासिक धर्म की अवधि में झोपड़ी में ठहरने वाली महिलाओं व युवतियों को यहीं पर चाय-नाश्ता और खाना दे दिया जाता है, क्योंकि इस दौरान वह घर में नहीं जा सकतीं। इस मसले पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डाॅ. मिथिलेश चैधरी ने कहा, मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के साथ उपेक्षा का बर्ताव न हो, इसके लिए जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। साथ ही उन्हें स्वच्छता की आवश्यकता के बारे में भी जागरूक किया जाएगा। जानकारों का कहना है कि यह आदिवासी बहुल इलाका है और यहां गरीबी के कारण महिलाएं सेनेटरी पैड का खर्च वहन नहीं कर पातीं। इसके अलावा उनमें जागरूकता की भी कमी है। उनका कहना है कि जहां तक सरकारी अभियानों की बात है, वे यहां की महिलाओं पर ज्यादा असर नहीं छोड़ पा रहे हैं। यह कितना सोचनीय विषय है कि छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री हैं और कांग्रेस सत्ता संभाल रही है तो गुजरात में भाजपा के विजय रूपाणी मुख्यमंत्री हैं और यहां भाजपा सत्ता संभाल रही है। दोनों ही राष्ट्रीय दल हैं। सरकार किसी की भी रहे देश के घर घर में इनके समर्थकों की मौजूदगी है। दोनों ही महिलाओं को आगे लाने और सामाजिक कुरीतियां तथा आदिवासी क्षेत्रों में हर प्रकार से खुशहाली के साथ ही वहां के उत्थान और यहां की महिलाओं के सम्मान के दावे करते नहीं थक रहे हैं। उसके बावजूद ऐसी शर्मनाक घटनाएं पढ़ने और सुनने को मिल रही है जिनसे सिर शर्म से झुक जाता है क्योंकि हमें बहुमूल्य जीवन देने ओैर फिर हाथ पकड़कर चलना सिखाने वाली मातृशक्ति के साथ ऐसा हो रहा है।

इसे भी पढ़िए :  RBI ने सभी वित्‍तीय संस्‍थानों को दी कर्ज की किस्‍त वसूलने पर 3 महीने तक रोक लगाने की छूट

मैं किसी की आलोचना न करके सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि हाथ के दांत खाने के और और दिखाने के कुछ और की किदवंती को साकार करने की बजाय समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय दोस्तो और आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाध्ंाी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी व कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी और हर क्षेत्र में स्थापित इनके नुमाइंदों से आग्रह है कि अब कागजी आंकड़ेबाजी और दावे व घोषणा करने की बजाय मातृशक्ति को न्याय और उसका अधिकार दिलाने तथा ऐसी रूढ़िवादी परंपराओं से छुटकारा दिलाने हेतु हर प्रकार की विरोधी विचारधारा भूलकर देश के पिछडे दूरदराज के क्षेत्रों व आदिवासी इलाकों में व्याप्त अंधविश्वास और आर्थिक तंगी को दूर करने हेतु चाहे वहां रोजगार उपलब्ध कराकर या अन्य तरीकों से अब वो सबकुछ किया जाना चाहिए जिससे महिलाओं का अपमान न होता हो।

इसे भी पढ़िए :  WhatsApp Status पर नहीं डाल पाएंगे 16 सेकेंड से बड़ा वीडियो

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

10 + 18 =