जय हो बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की; अब ईमानदार छवि के नागरिकों को भी मिल सकता है माननीय बनने का मौका

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भाजपा नेता सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रोहिन्टन फली नरीमन एवं एस रविंद्र भट की पीठ द्वारा राजनीतिक दलों को 72 घंटे में अपने से संबंध प्रत्याशियों के अपराधिक इतिहास को अखबारों में, वेबसाइट और सोशल मीडिया पर प्रकाशित करने के दिए गए निर्देशों से मुझे लगता है कि अब राजनीति में वाकई में ईमानदार छवि के नेताओं का बोलबाला और उन्हें सम्मान मिलने के दिन आ गए लगते हैं।
बताते चलें कि देश की चुनावी राजनीति में हर गरीब व्यक्ति को भी चुनाव लड़ने का मौका भारत निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन द्वारा अपने कार्यकाल में चुनावी खर्चों और मतदाताओं को बांटे जाने वाली गिफट रूपी रेवडियों व गुंडागर्दी पर जो रोक लगाई गई थी। उसके बाद से अब हर निर्वाचन आयुक्त अपनी ताकत को समझकर चुनाव में पारदर्शिता बनाए रखने के भरपूर प्रयास करता है। मगर इसके बावजूद भी अपराधिक छवि के उम्मीदवारों पर रोक लगाने में निर्वाचन आयोग सफल नहीं हो पा रहा था लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अब दिए गए निर्देशों से यह उम्मीद बंधी है कि राजनीतिक दल आदेशों का पालन करने में अब देर नहीं लगाएंगे।

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मुझे लगता है कि एक काम और होना चाहिए वो यह है कि माननीय न्यायालय या सरकार अथवा निर्वाचन आयोग अपराधियों की श्रेणी भी तय करे कि किस स्तर का अपराधी चुनाव लड़ सकता है और किसका नहीं। क्योंकि कभी कभी आपसी मनमुटाव और राजनीतिक चुस्त बंदी के चलते या सरकार अथवा पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर टिप्प्पणी करने पर भी नाराज होकर इनसे संबंध व्यक्ति मुकदमे सीधे दर्ज करा देते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि हत्या, डकैती चोरी, बलात्कार, देशद्रोह, अमानत में खयानत, सरकारी भूमि पर कब्जा भूमाफिया, अवैध निर्माण कर्ता, अपहरणकर्ता और रंगदारी मांगने अथवा समाजविरोधी काम करने वालों को किसी भी रूप में चुनाव लड़ने के लिए ना तो राजनीतिक दल द्वारा उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए और अगर वो ऐसा करते हैं तो वो प्रत्याशी का पर्चा समीक्षा के दौरान निरस्त होना चाहिए।
रही बात वर्तमान में लोकसभा और प्रदेश विधानसभा में माननीयों की तो जैसा की पढ़ने को मिलता है। उसके अनुसार काफी पर विभिन्न प्रकार के मुकदमे विचाराधीन है। इसलिए उनकी भी जांच कराई जाए और जो लोग गंभीर अपराधों या माननीय उच्च न्यायालय की निगाह में अपराधियों की श्रृंखला में आते हैं उनका निर्वाचन भी अगर रद किया जाए तो कुछ विशेष गलती शायद नहीं होगी।

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लेकिन यह सब हो सकता है न्यायालय के द्वारा ही। क्योंकि कितने ही कारण है कि वर्तमान माननीयों के सामने विभिन्न परिस्थितियों के चलते कुछ लोग बोल नहीं पाते हैं। एक खबर के अनुसार वर्तमान में भाजपा के 116, कांग्रेस के 29, जदयू के 13, द्रमुक के 10, तृणमूल के 9, एलजेपी के 6, बसपा के 5, सपा के 2, एआईएमआईएम के 2 और एनसीपी के 2 सांसदों पर केस बताए जाते हैं। विधानसभाओं में तो बताते हैं कि और भी बुरा हाल है। लेकिन अब मुझे लगता है कि पिछले चार आम चुनावों में खबरों के अनुसार दागियों की जो संख्या बढ़ी है अब उसमें सुधार होगा। आश्चर्य की बात तो यह है कि कोई सा भी दल अपराधियों को टिकट देने में पीछे नहीं रहा। एक चर्चा अनुसार कांग्रेस के डीन कुरियाकोस पर सबसे ज्यादा 204 मामले लंबित हैं। तो कहा जा रहा है कि यूपी में सवा सौ से अधिक दागी विधायक हैं जिनमें से 34 पर हत्या के प्रयास के मुकदमे दर्ज हैं।

ऐसी चर्चा है कि 1988 के बाद राजनीति के अपराधीकरण की शुरूआत हुई और इस दौर में तमाम बाहुबली धन और बाहुबल तथा संपर्कों के आधार पर राजनेता बन बैठे। परिणामस्वरूप कई दलों ने अपनी धाक जमाने के लिए टिकट दिए तो कई ने किन्ही ओर कारणों से। मगर अपराधियों का दम राजनीति मंें बढ़ता ही गया और जनता के लिए कुछ करने के इच्छुक ईमानदार और जनप्रिय नेता पीछे हटते गए और जो नहीं हटे उन्हें विभिन्न मामलों में फंसाकर अयोग्य ठहरा दिया गया और जो फिर भी नहीं डिगे उन्हें पूरी तौर पर हटा दिया गया।

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अगर अकेले यूपी को लें तो जैसा कि आज विभिन्न अखबारों में छपा उसके अनुसार, धनंजय सिंह, अभय सिंह, अरूण शंकर अन्ना, अमरमणि त्रिपाठी, हरिशंकर तिवारी, मुख्तार अंसारी, ब्रिजेश सिंह, स्वामी चिन्मयानंद, मदन भैया, डीपी यादव आदि का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। बाकी तो यूपी के साथ ही बिहार और अन्य प्रदेशों में भी कमी या ज्यादा अपराधिक छवि के दबंगों को दबदबा तो पड़ने ओर सुनने को मिलता ही रहता है।

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