चाटुकारिता के चलते ; केैसे रूके फूलों की बर्बादी और शुरू हो सम्मान में कली देने का चलन

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फूलों की बर्बादी और सरकारी स्तर पर फिजूलखर्ची रोकने के लिए आकाओं से मुलाकात के दौरान उन्हें खुश करने हेतु फूलों के गुलदस्ते और पुष्पगुच्छ देने से बचने के निर्देश पूर्व में शायद दिए जा चुके हैं। उसके बावजूद कुछ माननीयों को खुश करने के लिए चाटूकार और जी हजूरी करने तथा मक्खन लगाने की बजाय पूरा डिब्बा उड़लने में विश्वास रखने वाले कुछ लोगों को शायद अभी यह बात समझ नहीं आई है। और वो सम्मान स्वरूप फूल की कली देने की बात को आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं।
एक सरकारी आयोजन में जब इस नियम को बलाएं ताक रख सजावट आदि पर फूलों की भारी कुर्बानी दी गई तो एक सत्ताधारी दल के माननीय ही एक खबर के अनुसार अपने ही लोगों से यह पूछते नजर आए कि जब ऐसी ही बर्बादी फूलों की करनी थी तो फिर गुलदस्ते देने में ही बुराई क्या थी।
मुझे लगता है कि आंखों को शीतलता प्रदान करने और मन को मोह लेने वाले फूलों के सही उपयोग और इनकी बर्बादी रोकने व इन पर होने वाली फिजूलखर्ची की समाप्ति हेतु शायद अब माननीय प्रधानमंत्री जी मुख्यमंत्री जी और सत्ताधारी पार्टी के राष्ट्रीय और प्रदेश अध्यक्ष को इस संदर्भ में स्पष्ट निर्देश देने होंगे और उनका पालन न करने वालों के खिलाफ क्या क्या कार्रवाई हो सकती है यह भी बताना होगा तभी इन बेशकीमती फूलों का बिना मतलब उपयोग बंद हो पाएगा।
वरना अपने नंबर बढ़वाने और अपने उच्च अफसर को खुश करने या जिनसे कुछ काम निकल सकते हैं उनकी निगाह में चढ़ने के लिए चाटूकार टाइप के लोग मुफ्त का चंदन घिर मेरे नंदन की तर्ज पर सरकारी पैसे का दुरूपयोग करने में चूकने वाले नहीं है। इनके लिए तो भय बिन प्रीत ना होय गोपाला वाली ग्रामीण किदवंती को ही अमल में लाना होगा।

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