जिन क्षेत्रों में नागरिकता कानून का हो रहा है विरोध वहां चलाया जाए जागरूकता अभियान

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सीएए को लेकर होने वाली इन बैठकों का क्या फायदा

नागरिकता विधेयक कानून लागू हुए सवा महीने से ऊपर होने को जा रहा है। लेकिन अभी तक इसका विरोध पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ है। हां तुरंत इसको लेकर जो हिंसा शुरू हुई थी वो लगभग अब समाप्त हो चुकी है। जिसे देखकर यह भी कह सकते हैं कि केंद्र और प्रदेशों की सरकारें जो इसका समर्थन करती हैं उन्होंने देर से ही सही स्थिति को संभालने में सफलता प्राप्त कर ली है।

सुप्रीम कोर्ट पहुंची केरल सरकार
जहां जहां जिन जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं वहां तो नागरिकता कानून लागू करने का कोई विरोध सरकारों द्वारा किए जाने की संभावना नहीं है। लेकिन पंजाब मध्य प्रदेश राजस्थान केरल आदि जिन प्रदेशों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं वहां आसानी से यह लागू हो पाएगा। यह कहना एकदम संभव नहीं है। जबकि सबको पता है कि अगर केंद्र सरकार लागू करने पर आ गई तो उसके पास इतने साधन हैं कि वो इन्हें हर प्रदेश में लागू कर सकती है। केरल की सरकार शायद इसी तथ्य को भांपकर नागरिकता कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। और शायद यह पहला राज्य है जिसने इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय की शरण ली है। बताते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 256 के तहत राज्यों को इसकाा पालन करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। माकपा सरकार ने अनुच्छेद 131 के तहत उससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर कर दी है। स्मरण रहे कि इसके अलावा अभी तक 59 याचिका इस मामले में दायर हो चुकी है जिन पर 22 जनवरी को चर्चा होनी है। इसके अतिरिक्त पंजाब सरकार भी 17 जनवरी को होने वाले दो दिवसीय विधानसभा के विशेष सत्र में इस संदर्भ में प्रस्ताव लाया जा सकता है और कैबिनेट में इस पर निर्णय लिया जा सकता है।

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बार बार धारा 144 क्यों
चर्चा ये भी है कि गृहमंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की बैठक में भी सीएए को लेकर हुई हिंसा पर चर्चा और पुलिस अधिकारियों से सफाई मांगी जा सकती है। बैठक में सदस्यों ने खबरों के अनुसार आंदोलनों से निपटने के लिए बार बार धारा 144 लगाने का कारण भी जानना चाहा जिससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में ऐसे मुददों पर प्रशासन और पुलिस जल्दी धारा 144 का उपयोग शायद करने से बचेगी। क्योंकि पूर्व में जम्मू-कश्मीर के मुददे को लेकर माननीय उच्च न्यायालय ने भी धारा 144 को लेकर कोई अच्छी टिप्पणी व्यक्त नहीं की थी।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष भी आए समर्थन में
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष गैरूल हसन रिजवी का कहना है कि सीए नागरिकता छिनने वाला नहीं देने वाला कानून है। विपक्षी दल इस पर सियासत करते हुए गलत प्रचार कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। गेरूल हसन साहब यूपी के मेरठ में स्थित सुभद्रा फार्म हाउस में मुस्लिम समाज के लोगों के साथ संवाद कायम करते हुए यह बात कही गई।

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भारतीय जनता पार्टी और उसके ज्यादातर सहयोगी दल समर्थन में सड़कों पर
भारतीय जनता पार्टी और उसके ज्यादातर सहयोगी दल सीएए के बढ़ते विरोध के बाद सड़कों पर उतर चुके हैं और नागरिकों को इसके बारे में विस्तार से जानकारी देने और यह बताने की इससे किसी को कोई नुकसान होने वाला नहीं है।

होगा उलेमा सम्मेलन
16 जनवरी को देश की राजधानी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के संदर्भ में आरएसएस द्वारा कांस्टीटयूशन क्लब में लगभग 200 उलेमा और धर्मगुरूओं के साथ चर्चा की जानी है। बताते चलें कि राष्ट्रीय मुस्लिम मंच देशभर में उलेमाओं को साधने और उनके माध्यम से मुस्लिम समाज को सीएए के बारे में पूर्ण जानकारी देने का काम कर रहा है। बताते हैं कि यह सम्मेलन जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष सुहैब कासमी के नेतृत्व में होगा जिसमें देवबंद, बरेली, निजामुददीन दरगाह जैसी धार्मिक संस्थाअेां के धर्मगुरूओं को बुलाया गया हैं और इसकी सफलता के लिए भरपूर प्रयास भी हर स्तर पर किए जा रहे हैं।

22 को राजनाथ सिंह की सभा
22 जनवरी को केंद्रीय रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के साथ साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं वो मेरठ में सीएए के समर्थन में एक जनसभा करने जा रहे हैं तो बाकी केंद्र व राज्यों के मंत्री व वरिष्ठ नेता तथा कार्यकर्ता गली मोहल्लों में सभा कर सीएए के प्रति आम आदमी को जागरूक कर गलतफहमियां दूर करने का प्रयास कर रहे हैं।

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मुस्लिम क्षेत्रों में चले जागरूकता अभियान
मेरा मानना है कि जो प्रयास सरकार नागरिकता विधेयक के समर्थन में कर रही है वो तो उचित है लेकिन जिन क्षेत्रों में जिन लोंगों के बीच ज्यादातर सम्मेलन और सभओं के साथ ही हस्ताक्षर अभियान अथवा जागरूकता रैली की जा रही है मुझे लगता है कि उनमें से ज्यादातर तो पहले से ही समर्थन में है। और लोगों की गलतफहमियां दूर करने में लगे हैं। ऐसे में अगर यह सम्मेलन मुस्लिम बाहुल्य इलाकांें में हो या जनसभाएं ऐसे इलाकों में जहां के लोगों को सीएए के बारे में जानकारी नहीं है सही मायनों में आवश्यकता तो उन्हीं लोगों को जागरूक करने की है जो इसके बारे में नहीं जानते हैं। या किसी और कारण से इसका विरोध कर रहे हैं उनको समझाना वक्त की सबसे बड़ी मांग है।

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