सात दशक पहले भी बेटियों से प्यार करते थे लोग; स्कूलों में मिड डे मील शुरू करने वाले 65 साल पहले भी थे

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आज हम बेटियों को आगे लाने और उन्हें हर क्षेत्र में मजबूत बनाने तथा बेटियां बचाओं बेटियां पढ़ाओं के नारे देने के साथ साथ बड़े बड़े अभियान चला रहे हैं। केंद्र व प्रदेश सरकारंें भी काफी कुछ कर रही है। इसी प्रकार हर बच्चें को साक्षर बनाने के लिए गरीब के बच्चें को स्कूल तक लाने हेतु मिड डे मील योजना चलाई जा रही है। जिसको लेकर समय असमय बड़े बड़े विवाद भी जन्म लेते हैं और इसके लिए जांच आदि भी लगभग चलती ही रहती है।

लेकिन नागरिक यह जानकर आश्चयचकित होंगे कि चंपारण जिले के बगहा टोल के नरईपुर गांव मंे बेटियों के प्यार और लगाव के चलते यहां के निवासियों ने 70 साल पूर्व अपने गांव से कुछ दूर दामादटोला नाम से एक गांव बसा दिया। पाठक जानकर आश्यर्चचकित होंगे कि यहां के लोग अपनी बेटियों को ब्याहते समय प्रस्ताव देते हेैं कि वर घर जमाई बनकर रहे ओैर दूल्हे के तैयार हो जाने पर लड़की के परिजन उसे मकान बनाकर देने के साथ जमीन जायदाद देते हैं। बताते हैं कि आज भी लगभग 50 दामाद परिवार यहां रहकर खुशहाली से जी रहे हैं। यह तथ्य इस बात का प्रतीक है कि जो प्रचारित किया जाता है कि पूर्व में बेटियों को दुश्मन समझा जाता था। ऐसा सब जगह नहीं था। ऐसा होता तो दामाद टोला 70 साल पहले नहीं बसता।

बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ आज का अभियान है मगर, बगहा के नरईपुर वालों ने तो 70 साल पहले इससे भी बढ़ कर बेटी बसाओ के सपने को साकार कर दिया था। यहां के लोगों को बेटियां इस कदर प्यारी हैं कि वे शादी के बाद भी उन्हें नजरों से दूर नहीं होने देते। बेटी-दामाद को पास में ही बसा लेते हैं। इसी लिए 58 में से 50 परिवारों के दामाद आज भी एक ही टोले में बसे बताए जाते हैं और इसका नाम ‘दामादटोला’ हो गया है। यहां बसे कुछ दामादों ने तो अपने दामादों को भी पास ही बसा लिया है।
बुजुर्ग 70 वर्षीय (गांव के दामाद) चंदर चैधरी बताते हैं, ‘18 की उम्र में शादी हुई थी। ससुर रामदेव चैधरी को अपनी बेटी गोदावरी से बहुत लगाव था। तब उन्होंने घरजमाई बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने मान लिया। उन्होंने घर-जमीन दी। तब से मैं यहीं का होकर रह गया। नौ साल पहले बेटी उषा की शादी पाडरखाप निवासी रामानंद से की और उसे भी यहीं बसा लिया। तीनों बेटों ने खुशी-खुशी बहन को घर-जमीन में हिस्सा दिया है। वार्ड पार्षद शांता देवी का कहना है दामादों के यहीं बसने से इसका नामकरण दमादपुरवा कर दिया गया है। जब भी किसी लड़की की शादी होती है, दामाद को घरजमाई बनने का आॅफर दिया जाता है। 80 प्रतिशत दामाद इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं। दमादपुरवा टोले की 42 वर्षीया मंजू बतातीं हैं, ‘मेरी शादी 20 साल पहले मंगरू यादव से हुई। मेरे पांच भाई हैं। सब ने मिलकर इसी गांव में हमें रहने की जगह दी।’ एक साल पहले ही दामाद बने उमेश बताते हैं उनकी शादी दुलारी से हुई। ससुर मुखलाल चैधरी ने गांव में रहने की पेशकश की। बेटी से मां-बाप के लगाव के कारण वह मना नहीं कर सके। प्रभावती देवी कहती हैं 50 वर्ष पहले विवाह हुआ था। कुछ दिन बाद ही पिताजी ने ससुराल से यहीं बुला लिया। वह भी पति संग आकर यहीं रहने लगी। यह परिवारों का बेटियों से लगाव।

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तो दूसरी बच्चों को साक्षर बनाने और जो परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने की स्थिति में नही थे उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए पिछले 106 साल से सेवा के काम में लगे ब्रोकर एसोसिएशन के सदस्यों द्वारा 65 साल पूर्व पांच एकड़ जमीन में शुरू किए गए स्कूल में मिड डे मील सुविधा के साथ ही अन्य व्यवस्थाएं भी जरूरतमंद बच्चों के लिए की जाती थी। जो इस बात का प्रतीक हैं कि हमारे देश में आजादी जब मिली तो उसके आसपास भी बेटियों को चाहने और साक्षर बनने के इच्छुक बच्चों को बढ़ावा देने वालों की कमी नहीं थी।

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भारत में मिड डे मील कार्यक्रम 15 अगस्त 1995 को लागू किया गया था। तब भी इंदौर स्थित श्री बाल विनय मंदिर स्कूल ने कमजोर तबके के बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधा देने के लिए मिड डे मील (मध्याह्न भोजन) और परिवहन आदि सुविधाओं को 65 साल पहले अमल में लाना शुरू कर दिया था, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
ब्रोकरेज या दलाली शब्द सुनते ही जो छवि सामने आती है, उससे लगता है दो पक्षों के बीच के लेनदेन में से हिस्सेमारी। यही हिस्सा जब बच्चों का भविष्य संवारने में लग जाए तो नेकी का सेतु तैयार हो जाता है। 106 साल से ऐसे ही सेवा कार्य में जुटा है क्लाॅथ मार्केट ब्रोकर एसोसिएशन। 27 मार्च 1914 को शहर में बनी दलाल कमेटी आज श्री क्लाॅथ ब्रोकर एसोसिएशन के नाम से यह नेक काम कर रही है। शहर में जिस वक्तकपड़ा मिलों का वर्चस्व था और यहां का कपड़ा विदेश में भी निर्यात होता था, उस समय संगठन ने अपने पैर जमाए थे। दलाली के एवज में ब्रोकर को एक प्रतिशत कमीशन मिलता था। इस एक प्रतिशत में से भी ब्रोकर एसोसिएशन तीन प्रतिशत राशि बचाकर समाज सेवा के लिए रखती थी। इससे गायों को चारा, पक्षियों को दाना और रोगियों की मदद होती थी। बाद में संगठन ने शिक्षा की ओर ध्यान दिया और 1954 में शहर में बाल विनय मंदिर स्कूल की शुरुआत की। एसोसिएशन के सचिव भानुकुमार जैन बताते हैं कि बाबूलाल बाहेती ने संगठन को शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने की सलाह दी। संगठन ने जमा राशि से पांच एकड़ जमीन पर श्री बाल विनय मंदिर की शुरुआत की। तब भवन निर्माण की लागत 35 हजार रुपए आई थी। नाममात्र शुल्क पर लगने वाले इस विद्यालय में शुरुआती दौर में ही 250 विद्यार्थी थे। शहर का यह पहला ऐसा विद्यालय था, जिसने विद्यार्थियों के लिए भोजन और वाहन की सुविधा मुहैया कराई। हिंदी मीडियम वाले इस स्कूल के बाद जब लगा कि अब अंग्रेजी में भी स्कूल संचालित करना समय की मांग है तो 1972 में देवी अहिल्या शिशु विहार शुरू किया गया और आज ये दोनों स्कूल सीबीएसई से संबद्ध हैं। वर्तमान में इस संगठन से 200 ब्रोकर जुड़े हुए हैं। आज बेशक व्यापार विदेश से नहीं होता इसलिए मुनाफा कम होता है, बावजूद संगठन सेवा के लिए राशि जमा करता है। विद्यालयों का संचालन वहां से प्राप्त होने वाली फीस से तो हो जाता है, लेकिन भवन निर्माण आदि के लिए संगठन ही जिम्मेदारी निभाता है।

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मेरा मानना है कि पश्चिम चंपारण के बगहा अनुमंडल के नरईपुर गांव के जिन परिवारों ने बेटियों के प्यार में दामाद पुरवा गांव बसाया उनके परिवार के सदस्यों को बिहार सरकार तथा 65 साल पहले स्कूल में मिड डे मील सुविधा शुरू करने वाले स्कूलों के संचालकों को सरकार द्वारा सम्मानित किया जाए क्योंकि यह दोनों घटनाएं यह दर्शाती हैं कि हमारे देश में बेटियों को कभी बोझ शायद नहीं समझा गया और साक्षरता को बढ़ावा देने और गरीब के बच्चे को साक्षर बनाने के मामले में भी समाज पीछे नहीं था।

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