जनहित में है पुनर्विचार याचिका खारिज होना, सदभाव व भाईचारा मजबूत करने हेतु

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अयोध्या आदेश को मान सभी पक्ष मिलकर करें मंदिर-मस्जिद का निर्माण
नौ नवंबर को अयोध्या मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद हिंदू महासभा द्वारा मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देने के आदेश पर तो मुस्लिम पक्ष ने अधिकतर याचिकाओं में कहा था फैसला कानून विरूद्ध और विरोधाभासी तथा पूर्ण न्याय का उल्लंघन है। माननीय सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीशों की पीठ ने याचिकाओं पर विचार के उपरांत समस्त 19 याचिकाएं जो दायर की गई थी खारिज कर दी। मेरा मानना है कि माननीय न्यायाधीशों की पीठ का उक्त निर्णय जनहित का तो है ही इससे भविष्य में विभिन्न्न न्यायालयों में लंबित वादों की संख्या में भी कमी आ सकती है। क्योंकि जब इतने बड़े मुददे से संबंध पुनर्विचार याचिका निरस्त हो सकती है तो अन्यों के बारे में तो कुछ सोचना भी शायद जरूरी नहीं होगा अगर न्यायाशीध चाहेंगे तो।
बताते चलें कि इन याचिकाओं में आठ मुस्लिम पक्ष की, तथा निर्मोही अखाड़ा अखिल भारतीय हिंदू महासभा व प्रभात पटनायक की अगुवाई में 40 नामचीन हस्तियों ने साझा याचिकाएं दायर की थी। मुस्लिम पक्ष की अधिकतर याचिकाओं में कहा गया था कि फैसला कानून विरूद्ध विरोधाभासी और पूर्ण न्याय का उल्लंघ है। तो हिंदू पक्ष द्वारा मस्जिद को दी गई पांच एकड़ जमीन के आदेश पर पुनर्विचार की मांग की गई थी। कानून के जानकारों का कहना है कि सुधारात्मक याचिकाएं बिरली ही स्वीकार होती हैं। खबरों के अनुसार आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के जफरयाब जिलानी का कहना है कि कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर विचार नहीं किया यह दुर्भाग्यपूर्ण है। दूसरी ओर जमीयत उलेमा ए हिंद के अरशद मदनी का कहना है कि याचिका खरिज होने का अफसोस है। कोर्ट ने माना था कि मस्जिद गिराई गई है पर फैसला हिंदुओं के पक्ष में दिया। तो मुस्लिम पैरोकार इकबाल अंसारी का कथन है कि कोर्ट ने देशहित में याचिकाएं खारिज की हैं। हम पहले से फैसले को मान रहे हैं। याचिकाएं दाखिल ही नहीं करनी थी। विहिप के आलोक कुमार ने कहा कि स्वागत योग्य कदम है। सभी पक्ष निर्णय स्वीकारें।

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सरकारें जल्द ट्रस्ट बनाकर श्रीराम के भव्य मंदिर का मार्ग प्रशस्त करें।
बताते चलें कि अयोध्या जमीन विवाद मामले में शीर्ष अदालत के फैसले को लेकर दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बीते गुरुवार 12 दिसंबर को सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने तमाम याचिकाओं को खारिज कर दिया। चार अन्य जजों में जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एसए नजीर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस संजीव खन्ना शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को विवादित 2.7 एकड़ जमीन पर ट्रस्ट के जरिए मंदिर और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था। इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसमें से अधिकतर याचिकाएं फैसले से असंतुष्ट मुस्लिम पक्षकारों की थीं।

मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के जिलानी ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया
प्राप्त विवरण से पता चलता है कि निर्मोही अखाड़ा ने भी बुधवार को पुनर्विचार याचिका दायर की। अखाड़ा ने राम मंदिर के ट्रस्ट में अपनी भूमिका तय करने की मांग की है। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के जफरयाब जिलानी ने कहा- यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने हमारी पुर्नविचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। हम अपने अगले कदम को लेकर कुछ नहीं कह सकते हैं। इस बारे में अब हम हमारे वरिष्ठ वकील राजीव धवन से चर्चा करेंगे।

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पहली याचिका जमीयत के सेक्रेटरी ने दाखिल की
अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पहली पुनर्विचार याचिका जमीयत के सेक्रेटरी जनरल मौलाना सैयद अशद रशीदी ने दाखिल की थी। रशीदी मूल याचिकाकर्ता एम सिद्दीक के कानूनी उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने कहा था कि अदालत के फैसले में कई ऋुटियां हैं और संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है।

रशीदी ने याचिका के साथ 217 पन्नों के दस्तावेज पेश किए
रशीदी ने याचिका के साथ अदालत में 217 पन्नों के दस्तावेज भी पेश किए। इसमें कहा गया- कोर्ट ने माना है कि वहां नमाज होती थी, फिर भी मुसलमानों को बाहर कर दिया गया। 1949 में अवैध तरीके से इमारत में मूर्ति रखी गई थी, फिर भी रामलला को पूरी जमीन दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में हिंदू पक्ष की अवैधानिक कार्रवाई को अनदेखा कर दिया।

याचिका में कहा गया था कि कोर्ट के फैसले में विरोधाभास
याचिका में कहा गया था कि कोर्ट के फैसले का पहला और दूसरा हिस्सा विरोधाभासी है। कोर्ट ने इस बात पर सहमति जताई कि मस्जिद का निर्माण, मंदिर को तोड़कर नहीं किया गया था। 1992 का मस्जिद विवाद अवैध है। फिर कोर्ट ने यह जमीन दूसरे पक्ष को क्यों दे दी? मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन दे दी गई, जिसकी न तो अपेक्षा की गई थी और न ही अदालत से इसकी मांग की गई थी। उन्होंने कहा- हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि याचिका में पूरे फैसले को चुनौती नहीं दी जा रही है।

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मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने भी समीक्षा की बात कही
अखिल भारतीय मुसलिम पसर्नल लाॅ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने बीते सप्ताह कहा था कि देश के 99 प्रतिशत मुसलमान अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा चाहते हैं। इस पर केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा था कि एआईएमपीएलबी और जमीयते इस्लामी के बयान समाज को बांटने वाले हैं।

अदालत ने विवादित जमीन हिंदू पक्ष को सौंपी
40 दिनों की लगातार सुनवाई के बाद 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की विवादित जमीन हिंदू पक्ष को सौंपी थी। अदालत ने कहा था- विवादित जमीम पर मंदिर का निर्माण ट्रस्ट करेगा, जिसे 3 माह के भीतर केंद्र सरकार को बनाना है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ जमीन देने का आदेश भी दिया था।

मेरा सुझाव है कि अब सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को मानते हुए पूर्व में आए अयोध्या पर आए फैसले के तहत मंदिर और मस्जिद का निर्माण कर सदभाव, भाईचारे को मजबूत करना चाहिए।

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