महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन में बुराई क्या है

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भाजपा नेता मेल और बेमेल की बात भूल जाएं, मतदाता सब समझता है

जब से देश में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा और राष्ट्रीय दल कमजोर होना शुरू हुए तथा समय समय पर मतदाताओं द्वारा किसे वोट देना है और किसे नहीं यह तय करना शुरू किया गया। तब से राजनीति में गठबंधन का जो दौर शुरू हुआ उसमें लगभग सभी राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता पर कम या ज्यादा प्रश्न चिन्ह लगना शुरू हो गया है।
दो बड़े राष्ट्रीय दल कांग्रेस हो या भाजपा इनकी स्थिति भी कई मौकों पर ऐसी देखने को मिलती है कि साथ मिलकर सरकार चलाएंगे और चुनाव के समय अलग-अलग से मैदान में उतरने की ताल ठोकने लगेंगे। इसी प्रकार एक दूसरे की कमियां निकाल आलोचना करते हुए वोट मांगेंगे और चुनाव के बाद सत्ता प्राप्ति के लालच में सारे विवाद और वैचारिक मतभेद भूलकर सरकार बनाएंगे।
कोई ऐसा सिद्धांतों के नाम पर करेगा तो कोई देशहित की बात करेगा। कुछ मतदाताओं के हितों की रक्षा तो कोई विकास और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के नाम पर घूमा फिराकर सरकार बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा।

मैं इसके लिए किसी की भी आलोचना तो नहीं कर रहा हूं क्योंकि जब सभी एक जैसे है तो कोई पीछे क्यो रहे। इसलिए अगर घोर विचार विरोधी राजनीतिक दल शिवसेना, कांगे्रस और एनसीपी महाराष्ट्र में मिलकर सरकार बनाने जा रहे हैं तो मुझे लगता है कि वर्तमान परिस्थितियों में कुछ भी गलत सा नहीं है। लेकिन एक तथ्य इन तीनों दलों के नेताओं को जरूर ध्यान रखना होगा कि पांच साल से पहले गठबंधन ना टूटे यह विषय पूरी तौर पर तय कर लें क्योंकि इससे जहां पहले से ही राजनीतिक दलों से विश्वास खोते जा रहे मतदाताओं को एक और आघात पहुंचता है। शिवसेना 25 साल मिलकर सरकार बनाने और चलाने का दावा कर रही है तो कांग्रेस और एनसीपी के कुछ नेता 5 साल पूर्ण बहुमत से बिना विवाद के सरकार चलाने की बात कर रहे हैं। यह कितना सत्य साबित होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन 1998 में एनडीए के नेशनल एजेंडा फाॅर गर्वनेस के माॅडल पर साझा कार्यक्रम बनाकर सरकार बनाने जा रहे इन तीनों दलों ने अगर सच्चे दिल से गठबंधन किया और सरकार चलाई तो मुझे लगता है कि राजनीति में एक नया निर्णायक दौर होगा। वैसे कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री का पद शिवसेना को तो कांग्रेस और एनसीपी को उपमुख्यमंत्री का पद देने के साथ साथ 14 मंत्री शिवसेना के और 14 एनसीपी के तथा 12 कांग्रेस के बनाए जाएंगे। विधानसभा अध्यक्ष का पद कांग्रेस को मिलेगा। उपाध्यक्ष पद शिवसेना की झोली में जाएगा। अगर देखें तो इसमें कुछ बुराई नहीं है। सबको सम्मानजनक प्रतिनिधित्व इस सरकार में मिलेगा। और अगर यह दल संयम बनाए रहें तो जनता का भी कुछ भला हो सकता है। जो बिंदु उभरकर आ रहे हैं उसके अनुसार तीनों दल अपने वैचारिक मुददों को फिलहाल नजरअंदाज कर आगे बढ़ेंगे। जहां तक बताया जा रहा है। किसानों की कर्जमाफी मुंबई व अन्य शहरों में आधारभूत विकास, 10 रूपये में खाने की थाली, एक रूपये में मरीजों की जांच जैसे बिंदुओं को अगर 17 नवंबर को शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की पुण्यतिथि के मौके पर सोनिया गांधी और एनसीपी प्रमुख शरद पवार घोषणा करते हैं तो संयुक्त गठबंधन इसी दिन सरकार बनाने का दावा भी कर सकता है। हरियाणा में भाजपा और जजपा से मिलकर सरकार बना चुकी है। लेकिन भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गिंय शिवसेना और एनसीपी के मेल को बेमेल गठबंधन बता रहे हैं। अब कोई पूछे कि अगर ऐसे गठबंधन आप करें तो सकारात्मक निर्णय और दूसरे करें तो बेमेल अब यह सोच ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है। या तो राष्ट्रीय स्तर के दल राजनीतिक नफा नुकसान और सत्ता प्राप्ति का मोह छोड़कर एक सिद्धांत पर चलना शुरू करें वरना ऐसे गठबंधन तो अब सब जगह ही और ज्यादा होंगे, ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दलों के नफे द्वारा नुकसान ओैर जनहित की बात कर अपने सिद्धांतों को इनके द्वारा त्यागे जाने से अब एक बात बड़ी स्पष्ट हो गई है कि चुनाव चाहे ग्राम प्रधानी का हो या सबसे उच्च सदन के सदस्यों का । हमारे राजनेता और उनके उम्मीदवार सिर्फ किसी को बुरा भला बताकर वोट प्राप्त नहीं कर पाएंगे क्योंकि अब तो लगभग सभी एक श्रेणी में आते जा रहे हैं। यह सरकार अकेले बनाए या गठबंधन से। इन्हें काम करना होगा और जनता का यह विश्वास जीतना होगा कि चुनाव बाद सरकार वह कैसे भी बनाए मगर जनता से किए वादे और देशहित के काम प्रभावित नहीं होंगे तभी मतदाताओं के वोट नेता प्राप्त कर पाएंगे वरना अब कोई भी दल इस विश्वास के साथ आगे नहीं बढ़ सकता कि फलां वर्ग या जाति अथवा व्यवसाय के मतदाता उसके साथ खड़े हैं।

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