अयोध्या मामला फैसला कुछ भी हो सबको होगा सर्वमान्य : पुलिस और प्रशासन कुछ बदनाम चेहरों और असामाजिक तत्वों ?

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आम आदमी का भी लिया जाए सहयोग
अयोध्या प्रकरण में फैसला कब आएगा और क्या होगा इसका तो अभी सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है क्योंकि जो भी करना है वो सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश के निर्णय पर निर्भर है। लेकिन उत्तर प्रदेश सहित देशभर में शांति सदभाव भाईचारा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के जो प्रयास देशभर में हो रहे हैं। उन्हें देखकर आम आदमी में विश्वास की भावना बनी हुई है। क्योंकि लगता है कि इतने इंतजाम और हर व्यक्ति की चाहे वह किसी भी वर्ग या संप्रदाय का हो राष्ट्रीय एकता को लेकर मजबूत हुई सोच से महसूस होता है कि निर्णय कुछ भी आए वो सर्वमान्य होगा और ऐसा सभी वर्गों और जातियों के प्रमुखों द्वारा कहा भी जा रहा है।
क्योंकि मामला यूपी का है। इसलिए प्रदेश के सभी जिलों में इसको लेकर एहतियात का हर कदम उठाया जा रहा है। गली मौहल्लों और शहरों की शांति समितियों व प्रमुख नागरिकों के साथ बैठकें की जा रही है तो सभी धर्माें के नागरिकों द्वारा भी यह अपील दोहराई जा रही है कि फैसला कुछ भी हो शांति और भाईचारा बना रहे।
वैसे तो जिलाधिकारियेां और पुलिस अधीक्षकों द्वारा हर जिले में अपने सहयोगियों संग विचार विमर्श कर सारी तैयारियां पुख्ता की जा रही है। लेकिन पिछले लगभग पांच दशक में जो व्यवस्थाएं देखी उससे यह लगता है कि अगर इन सुझावों पर भी ध्यान दिया जाए तो अच्छा है

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1-पुलिस और प्रशासन हर मिश्रित आबादी वाले इलाकों पर निगाह रखी जाए और गली मौहल्लों के कोनो पर समय और योजना के अनुसार पुलिस पिकेट तैनात की गई तो उसका काफी लाभ भय मुक्त वातावरण की स्थापना और भाईचारा बनाने में मिलेगा।

2-शांति समितियों और उनके पदाधिकारियों की बैठक तो बुलाई ही जा रही है और यह लोग हर सहयोग के लिए पुलिस प्रशासन के साथ भी खड़े नजर आते हैं लेकिन यह भी पक्का है कि आज तक जब कभी भी हिंसा हुई उसमें शांति व्यवस्था में सहयोग इनके द्वारा दिया गया मगर असामाजिक तत्तों और बदनाम चेहरों पर किसी का कोई विशेष असर नहीं होता है इसलिए सभी जिलों के अधिकारियों को चाहिए कि थानेदारों के माध्यम से हर क्षेत्र के आसामाजिक तत्वों और बदनाम चेहरों को थाने में बुलाकर या बैठक कर यह समझा देना चाहिए कि अगर कुछ भी हुआ तो उनकी खैर नहीं है।

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3-पिछले लगभग चार दशक से जब भी ऐसी स्थिति आती है तो एक बात विशेष रूप से सुनने को मिलती है कि यह जो हो रहा है यह अनपढ़ और ऐसे लोगों के कारण हो रहा है जो जल्दी से बहकावे में आ जाते हैं। मेरा मानना है कि इस बात को ध्यान में रखते हुए जिला और पुलिस प्रशासन द्वारा जो सौहार्द्र के लिए बैठकें बुलाई जा रहीं हैं उनमें परंपरागत रूप से बुलाए जाने वाले चेहरों के साथ साथ उन कुछ लोगों को भी बुलाया जाए जिनके भड़कावे में आने और गुमराह होने की चर्चाएं हमेशा ऐसी बैठकों में की जाती है। जिससे बोली गई बात समझ सके।

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4-जितनी व्यवस्थाएं की जा रही हैं वो काफी नजर आती हैं। लेकिन अगर थोड़ा सा चाक चैबंद रहते हुए अफसर बैठकों में आए लोगों से थोड़ी आत्मीयता दर्शाते हुए मुस्कराकर बातचीत भी कर लिया करें तो उसका बहुत अच्छा संदेश तो समाज में जाता ही है सहयोग की भावना भी मजबूत होती है। क्योंकि कई जिलों में ऐसी बैठकों के दौरान देखने को मिला कि सहयोग के लिए अधिकारी आग्रह तो करते हैं लेकिन बैठक से पहले और बाद में आपस में बतियाने के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से आए लोगों से भी बात कर लिया करें तो मुझे लगता है कि काफी लाभदायक सूचनाएं भी मिल सकती हैं क्योंकि हर व्यक्ति खुलकर कुछ कहने की हिम्मत नहीं दिखा पाता है ऐसा पूर्व में हुए अनुभव के आधार पर मेरे द्वारा सुझाव दिया जा रहा है।

 

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