आपसी सहमति से सुलझाया जाए कालापानी विवाद का मसला

33
loading...

नेपाल सरकार द्वारा कालेपानी को लेकर जो विवाद उत्पन्न किया गया है और आक्रामक रूख अपनाया जा रहा है। खबरों के अनुसार भले ही हमारी सरकार इस मामले में कोई बहुत गंभीर ना हो लेकिन क्योंकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का स्पष्ट कहना है कि कालापानी भारत का हिस्सा है और रहेगा। नेपाल का बयान इस संदर्भ में दुर्भाग्यपूर्ण है। दोनों देशों की संस्कृति एक है। हम मित्र राष्ट्र है। इस मुददे का बातचीत के जरिए समाधान कर लिया जाएगा।

मुझे भी लगता है कि यह मामला और ज्यादा उछले इससे पूर्व ही हमारे नेताओं और विदेश मंत्रालय को इस कालापानी के संदर्भ में आ रहे बयानों को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र इस समस्या का समाधान खोज लेना चाहिए। खबरों के अनुसार कालापानी विवाद पर नेपाल सरकार के आक्रामक रुख पर कूटनीतिक जानकारों ने हैरानी जताते हुए कहा है कि इसके पीछे चीन का प्रभाव भी हो सकता है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा है कि वह भारत से कालापानी क्षेत्र से अपने सशस्त्र बलों को हटाने के लिए कहेंगे। नेपाल ने कुछ दिन पहले भारत के मानचित्र में भी कालापानी क्षेत्र को लेकर अपनी आपत्ति जताई थी।

इसे भी पढ़िए :  नागरिकता कानून को लेकर फिल्म अभिनेताओं की जंग; नसीरूददीन शाह साहब से आखिर जन्म प्रमाण मांगा किसने है

पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि इस तरह की खबरे हैं कि नेपाल सीमा के कुछ इलाकों में चीनी सेना की भी मौजूदगी है इसे लेकर वहां काफी विरोध हो रहा है। इसकी वजह से संतुलन साधने की रणनीति के तहत नेपाल सरकार कालापानी को लेकर सवाल उठा रही है।
उन्होंने इस आशंका से भी इनकार नहीं किया कि इसके पीछे चीन हो सकता है। उन्होंने कहा कि नेपाल का रुख निश्चित रूप से चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के बीच काफी दोस्ताना रिश्ते रहे हैं। पूरी उम्मीद है कि भारत नेपाल को अपना पक्ष समझाने में सफल होगा।

इसे भी पढ़िए :  आम आदमी को निःशुल्क उच्च स्तरीय चिकित्सा प्राप्त हो, बजट में की जाए व्यवस्था

सूत्रों ने कहा कि सरकार इस मामले को बहुत गंभीर नहीं मान रही है। जानकारों ने कहा कि इस मामले पर भारत का रुख नया नहीं है लेकिन पहली बार नेपाल की तरफ से इस तरह की आक्रामक बयानबाजी की जा रही है। उधर, विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने इस तरह की अटकलों को गलत बताया कि कालापानी मामले में भारत सरकार का कोई संदेश लेकर पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन को नेपाल भेजा गया है।
मेरा मानना है कि जो भी हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय विदेश मंत्री को इस मामले में विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि भारत नेपाल की दोस्ती जगजाहिर है। और कुछ पड़ोसी देश इसमें खटास पैदा करने का प्रयास कर सकत हैं। ऐसा हो या किसी को कुछ करने का मौका मिले उससे पहले ही हमें आपस में इस मसले का निस्तारण कर लेना चाहिए।

इसे भी पढ़िए :  संघ प्रमुख की पर्यावरण संरक्षण में दिलचस्पी के होंगे अच्छे परिणाम

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

twenty + one =