गंभीर खाते रहे जलेबी नहीं पहुंचे प्रदूषण का समाधान खोजने

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बढ़ते प्रदूषण के नाम पर निर्माण कार्य उद्योग धंधे और स्कूल बंद करने के आदेश देने और उसके लिए नियम बनाने वाले वर्ग के लोग खुद इस मामले में कितने गंभीर है। इसका खुलासा गत शुक्रवार 15 नवंबर को आवास व शहरी मामलों की संसद की स्थायी समिति द्वारा बुलाई गई बैठक। जिसमें खबरों के अनुसार पर्यावरण मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी, डीडीए, एवं नगर निगमों के आयुक्त समेत कई सांसद जो इसके सदस्य हैं इसमें शामिल नहीं हुए। जिससे नाराज शामिल सदस्यों ने इस मुददे को लोकसभा अध्यक्ष के सामने उठाने की बात कही तो अनुपस्थित अफसरों द्वारा पुराने बहाने मीटिंगों में व्यस्त होने का हवाला देकर या तो अपने जूनियरों को भेज दिया गया अथवा कुछ ने जाना ही जरूरी नहीं समझा। अब अगली बैठक 20 नवंबर को होना बताया जा रहा है और समझा जाता है कि इस बैठक को लेकर जो नाराजगी उभरकर सामने आई उसे देखकर इसमें उपस्थिति पूर्ण हो सकती है। मगर सवाल इस बात का है कि गौतम गंभीर जो दिल्ली से सांसद हैं।

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उनका यह कथन कि मुझे गाली देने से दिल्ली का प्रदूषण कम होता है तो जी भरकर दीजिए। मैं राजनीति में धन कमाने नहीं आया। मेरे ऊपर परिवार की भी जिम्मेदारी है। मैं मेहनत की कमाई में यकीन करता हूं। वो बैठक में भाग लेने की बजाय इंदौर में जलेबियों का मजा उठा रहे सांसद गंभीर अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कितना गंभीर है यह तो वहीं जान सकते है लेकिन उनके जो बोल हैं वो सही नहीं लगते हैं। गंभीर भूल गए हैं कि परिवार की जिम्मेदारी सभी सांसदों पर है और सब मेहनत की कमाई खाने में विश्वास रखते हेंैं। मगर जब बात सामूहिक रूप से जनहित की हो तो एक राजनेता होने के चलते सर्वप्रथम होने की जिम्मेदारी वो हो जाती है। और गौतम गंभीर जी भले ही आपने यह शब्द किसी सोच के तहत कहें हो मगर मुझे लगता है कि यह ठीक नहीं है। क्योंकि मुफ्त की कमाई में कोई विश्वास नहीं करता है। सब जनप्रतिनिधि मेहनत की कमाई में विश्वास रखते हैं। आपको अगर जलेबियां खाने का इतना ही शोैक था तो चुनाव लड़ने से इंकार कर देना चाहिए था। क्योंकि आप अब संसद सदस्य हैं और परिवार के साथ अब जनता के प्रति भी आपकी जिम्मेदारियां है।

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