डाॅक्टर-तीमारदार का विवाद ठीक नहीं, केंद्र सरकार ला रही है नया विधेयक

21
loading...

डाॅक्टर का जब नाम आता है तो सिर श्रद्धा से झुकता है और मन में सम्मान की भावना पैदा होती है क्योंकि पुरानी ग्रामीण कहावत के अनुसार भगवान के बाद डाॅक्टर का दूसरा दर्जा आम आदमी के जीवन में है। और हों भी क्यों ना क्योंकि जिस प्रकार ईश्वर हमारे कष्ट हरते हैं। उसी प्रकार डाॅक्टर भी एक छोटी सी गोली और इंजेक्शन देकर बड़ी से बड़ी बीमारी में राहत पहुंचाने का काम करता है।
और अगर दूसरे दृष्टिकोण से सोचें तो भी डाॅक्टर और इससे जुड़े अन्य लोग भी समाज का महत्वपूर्ण अंग और हमारे परिवारो के सदस्य ही हैं। कोई किसी का बेटा है तो किसी का भाई है। किसी का पोता है तो किसी का पति है। हर कोई किसी न किसी रूप में हमसे और हमारे परिवारों से जुड़ा है।

लेकिन यह भी सही है कि कुछ डाॅक्टर अपने पैसे की हवस मिटाने तो कुछ अपने अहम की संतुष्टि के लिए तो कुछ सामने वाले को नीचा दिखाने और उसकी बेइज्जती करने के दृष्टिकोण से यह भूल जाते हैं। कि इस पवित्र पेशे में आते समय उन्होंने सेवा भाव से हर व्यक्ति को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने और अपनी जिम्मेदारियों को निस्वार्थ भावना से पूरा करने का संकल्प लिया था। इसके बावजूद उनमें से कुछ का आचरण होता है वो असहनीय तो है ही। उसको बर्दाश्त करना भी किसी भी व्यक्ति के लिए मुश्किल हो सकता है।
डाॅक्टर बनाने के लिए मां बाप अगर एक बड़ी धनराशि खर्च करते हैं और बच्चे दिन रात मेहनत कर इसके एग्जाम पास करते हैं तो यह भी सही है कि इन्हें चिकित्सक बनाने तक सरकार का भी काफी मोटा बजट जो आम आदमी के खून पसीने की कमाई टैक्सों के रूप में प्राप्त होती है उसमें से खर्च होता है। जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि कोई भी अपने दम पर नहीं सरकार के सहयोग से ही चिकित्सक बन पाता है। ऐसे में अपने पेशे के अनुकूल मरीजों और अभिभावकों से व्यवहार न करने पर जो विवाद उत्पन्न होता है उसके बाद जो हड़ताल इनके द्वारा की जाती है उसे सही नहीं कहा जा सकता।

इसे भी पढ़िए :  सीएम साहब दें ध्यान; शाॅपिंग माॅल व जनरल स्टोरों पर शराब बिकी तो

लेकिन जनमानस को पूर्ण सुरक्षा चिकित्सा सुविधा सस्ती और आसानी से दिलाने के लिए वचनबद्ध हमारी सरकारें कुछ बिगडै़ल स्वभाव के लालची और बैंक बैलेंस बढ़ाने में लगे अहम के मारे डाॅक्टरों की गलती की सजा उन्हें देने की बजाय इनके द्वारा की जाने वाली हड़तालों के दबाव में आकर शायद आम आदमी के खिलाफ कार्रवाई करने का आश्वासन देने के साथ साथ निर्दोष होने के बाद भी झूठे आरोप झेल रहे नागरिकों का उत्पीड़न विभिन्न तरीके से सरकार के विभिन्न विभागों से जुड़े अधिकारियेां द्वारा किया जाता रहा है। लेकिन अब तो लोकसभा के इस शीतकालीन सत्र में डाॅक्टरों के प्रति बढ़ती हिंसा के मामलों से निपटने के लिए नागरिकों के विरूद्ध जो विधेयक लाया जा रहा है अगर वो पास हो गया तो डाॅक्टर और निरंकुश हो आम आदमी को पीड़ित लगेंगे। इसलिए मेरा मानना है कि इस पवित्र पेशे से जुड़े सम्मानित डाॅक्टरों की गरिमा व सम्मान बचाने के लिए तो सरकार को तो व्यवस्था करनी ही चाहिए लेकिन ऐसा नियम भी बनाना चाहिए कि दोषी डाॅक्टरों की डिग्री निरस्त हो और उन पर भी वहीं धारा और नियम लागू किए जाएं जो इनसे संघर्ष होने पर आम आदमी के खिलाफ लागू किए जाने की तैयारी चल रही है।

इसे भी पढ़िए :  राजस्थान के मुख्यमंत्री के कथन में गलत क्या है

जानकारी के अनुसार डाॅक्टरों के खिलाफ देश में बढ़ते हिंसा के मामलों को लेकर सरकार इसी शीत सत्र में बिल ला सकती है। इसके तहत डाॅक्टर-नर्स से मारपीट होने पर अस्पताल प्रबंधन को कानूनी मुकदमा लड़ना होगा। इसके लिए 10 साल तक के कारावास और दो से 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान हो सकता है। पीड़ित कर्मचारी से लिखित शिकायत लेने के बाद अस्पताल की ओर से मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। साथ ही डीसीपी या एसएसपी स्तर के अधिकारी के स्तर पर मामले की जांच होगी। बताते हैं कि शीत सत्र में इस बार स्वास्थ्य महकमे की तीन बड़े बिलों पर नजर है। डाॅक्टरों के खिलाफ हिंसा के अलावा, ई-सिगरेट और राज्यसभा में लंबित सरोगेसी बिल के पास होने की उम्मीद जताई जा रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि शीत सत्र में स्वास्थ्य देखभाल सेवा कार्मिक और नैदानिक प्रतिष्ठान (हिंसा एवं संपत्ति क्षति निषेध) 2019 बिल इसी सत्र में लाया जाएगा।

देश के चिकित्सकों को भी इस बिल के आने का इंतजार
अस्पताल के सभी वर्ग के कर्मचारियों को सुरक्षा देने वाले इस बिल में चिकित्सा कर्मियों को गंभीर चोट पहुंचाने वाले व्यक्ति के लिए तीन से 10 साल के कारावास की सजा और दो से 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। साथ ही अस्पताल या क्लीनिक की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर छह माह से 10 साल के कारावास की सजा और 50 हजार रुपये से पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। देश के चिकित्सकीय वर्ग को भी इस बिल के आने का इंतजार है। फेडरेशन आॅफ रेजीडेंट डाॅक्टर्स एसोसिएशन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. सुमेध का कहना हैं कि लंबे समय से चिकित्सीय वर्ग अस्पतालों में असुरक्षित महसूस कर रहा है। संसाधनों की कमी के कारण उसे तीमारदारों का शिकार होना पड़ता है। इस बिल के लिए देश के डाॅक्टर लंबे समय से एक लड़ाई लड़ते आ रहे हैं जिसे अब विराम देने की जरूरत है। वहीं दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) आरडीए के सचिव डाॅ. राजीव का कहना है कि पश्चिम बंगाल में दो डाॅक्टरों से मारपीट के बाद एम्स के बैनर तले पूरे देश में विरोध बढ़ा था। सदन में बिल आने के बाद चिकित्सीय वर्ग के लिए सबसे बड़ी जीत होगी।
हमारे चिकित्सक इसे अपनी जीत समझें, हमें भी ऐतराज नहीं है क्योंकि आदरणीय किसी बात से खुश होते हैं तो यह अच्छा है लेकिन एक बात सबको समझनी होगी कि जनमानस की ताकत से बड़ी कोई शक्ति नहीं है। जब यह गुस्साती है तो आसानी से किसी के काबू नहीं आती और उस समय कुछ देर के लिए कोई नियम और कानून काम नहीं आता।

इसे भी पढ़िए :  मुख्यमंत्री का निर्णय है साहसिक और सराहनीय, लखनऊ और नोएडा के बाद मेरठ में भी हो लागू

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

nineteen − ten =