काँग्रेस को बचाने हेतु : इंद्रा गांधी की नीतियों की समीक्षा करें सोनिया, राहुल, प्रियंका।

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नहीं रुका नेता और कार्यकर्ताओं का पलायन तो काँग्रेस का हो सकता है सफाया।
बुजुर्ग नेताओं को संगठन में दिया जाए महत्व; जाटों की अवहेलना क्यों।

पिछले लगभग तीस साल से यूपी में सत्ता से दूर और अब धीरे-धीरे आम आदमी पर अपनी पकड़ खोती जा रही कांग्रेस को बीते लोकसभा चुनाव में भले ही पहले के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलकर संख्या 42 तक पहुंच गई हो मगर एक समय में पूरे देश में लगभग एक छत्र शासन करने वाली यह पार्टी इतनी व्यवस्था भी नहीं कर पाई कि लोकसभा में अपने दम पर विपक्ष के नेता का पद भी हासिल कर पाती। इसके पीछे क्या कारण हैं या तो इस संदर्भ में इस पार्टी के नेता सोचना ही नहीं चाहते अथवा उनके वर्तमान सिपहसलार ऐसा करने नहीं दे रहे हैं। जो भी हो यह कहने में कोई हर्ज महसूस नहीं हो रहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व0 राजीव गांधी के बाद कांग्रेस पुरानी स्थिति में कभी आ नहीं पाई। और ऐसा क्यों हो रहा है यह सोचने की फुर्सत उसके नेताओं के पास नहीं है।

हरियाणा में बिखरती कांग्रेस
वर्तमान में हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। लेकिन यह कितने ताज्जूब की बात है कि अभी पिछले दिनों महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता कृपाशंकर पार्टी छोड़कर चले गए और अब ठीक मतदान से पहले हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक तंवर पार्टी छोड़ गए। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र सिंह हुडडा के बेटे पूर्व सांसद दीपेंद्र हुडडा ने विधानसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया है और स्व0 मुख्यमंत्री श्री भजनलाल के पोते और कुलदीप विश्नोई के बेटे भव्य विश्नोई ने भी चुनाव से दूरी बना ली है। जिसे देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि हरियाणा में कांग्रेस की क्या स्थिति होगी। वो बात और है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य कुलदीप विश्नोई कह रहे हैं कि वो अशोक तंवर को मनाने के लिए भरपूर प्रयास करेंगे। मगर पार्टी के चुनाव लड़ रहे 15 बागी और उनके समर्थक किस तरह इस पार्टी का चुनावी समीकरण बिगाड़ेंगे यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। एक बात थोड़ी आशा के अनुकूल कही जा सकती है कि 2014 से 2019 तक इनेलो के टिकट पर सिरसा से सांसद रहे चरणजीत सिंह रोड़ी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। मगर लगता नहीं की पूर्व केंद्रीय मंत्री और पार्टी की नेता द्वारा की जा रही चुनावी घोषनाएं कोई विशेष असर दिखा पाएंगी।

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आखिर यूपी में 30 साल में इस स्थिति में क्यों पहुंची कांग्रेस, सोचना होगा
पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने यूपी में पार्टी की स्थिति मजबूत करने एवं सत्ता के निकट पहुंचने की सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनाई गई रणनीति कोई करिश्मा वर्तमान में दिखा पाएगी ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि 26 अनुभवी नेताओं को सलाहकार बनाकर 41 नेताओं की जो कमेटी यूपी में कुशीनगर जिले के तमईराज से विधायक अजय कुमार लल्लू को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर गठित की गई है। मुझे लगता नहीं कि वो भी कोई विशेष असर दिखा पाएगी। क्योंकि 50 से ऊपर के अनुभवी कांग्र्रेसियों सांसद संतोष सिंह, केके शर्मा, नसीब पठान, रामकृष्ण दिवेदी और पार्टी के पदाधिकारियों को जिस प्रकार संगठन से बाहर रखा गया है उसके चलते प्रियंका गांधी अपने मकसद में सफल हो पाएंगी लगता नहीं है। और यह कहने में भी मुझे कोई गलती नजर नहीं आ रही है कि अमेठी तो इस बार कांग्रेस गंवा चुकी है भविष्य में कहीं रायबरेली में ऐसे परिणाम ना निकल आए क्योंकि बताते हैं कि पार्टी के एमएलसी दिनेश सिंह पहले ही कांग्रेस छोड़ गए। अब मात्र सात विधायकों में से दो राकेश और अदिति सिंह की भी गतिविधियों को देखकर यह लगता है कि इनके मामले में भी चला चली का मेला हो सकता है क्योंकि कई बार इनके द्वारा पार्टी की नीतियों और घोषणाओं का उल्लंघन किया जा चुका है जो इस बात का प्रतीक है कि पूर्व में प्रशांत कुमार के साथ चलकर कांग्रेस ने अपना पूर्ण जनाधार लगभग खो ही दिया। और अब भी शायद वो ही स्थिति होगी और बाकी विधानसभा के हो रहे उपचुनावों के परिणाम आने के बाद स्पष्ट हो जाएगी।

संगठन में जाटों को प्रमुख स्थान न मिलना हो सकता है घातक
बतातें चलें कि अपना दल जैसे क्षेत्रीय दल के यूपी में नौ विधायक हैं और कांग्रेस अपने सात भी संभालकर नहीं रख पा रही। और यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं है कि अगर भाजपा चाहेगी तो इन सातों का भी मन परिवर्तन कर सकती है। क्योंकि 50 साल से ऊपर के बुजुर्गों को जिस प्रकार से नजरअंदाज करने की कोशिश की जा रही है उसके चलते अनुभवी नेताओं का पार्टी से मोहभंग हो सकता है। और अगर वो कहीं ना भी जाएं तो भी मन मसोस कर एक तरफ पड़े रहेंगे क्योंकि जिस नई लाॅबी को युवाओं के नाम पर आगे लाने की कोशिश की गई है वो प्रयास तो अच्छा है मगर वो शायद बुजुर्ग नेताओं को वह सम्मान नहीं दे पाएगी जिसके वह हकदार हैं। इसलिए अगर सोनिया गांधी आप अपने नेतृत्व में पार्टी को मजबूत करना चाहती हैं तो युवाओ के साथ-साथ बुजुर्ग नेताओं को भी पार्टी में भरपूर महत्व दिया जाना चाहिए। चाहे संगठन हो या कोई और क्षेत्र। यह कितने ताज्जूब की बात है कि यूपी के अंदर भारी तादात में वोट होने के बावजूद कांग्रेस समर्पित जाट मतदाताओं की संख्या होने के चलते पुराने अनुभवी व निष्ठावान नेताओं को कोई प्रमुख स्थान शायद नहीं दिया गया है।

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50 साल के ऊपर के मोतीलाल वोरा ओैर गुलाम नबी आजाद भी तो हैं
यूपी की कमेटी गठित होने के बाद एक चर्चा कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं में काफी जोरशोर से चल रही है कि एक तरफ तो 50 साल से ऊपर के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को प्रमुख स्थान नहीं दिया जा रहा तो फिर केंद्रीय नेतृत्व में इससे ऊपर के लोग क्यों। सोनिया गांधी पार्टी की सर्वेसर्वा हैं। उनके बारे में तो कोई कुछ नहीं बोल रहा है लेकिन मोतीलाल वोरा, गुलाम नबी आजाद आदि का नाम लेकर यह चर्चा चल रही है कि इन्हें महत्व क्यों दिया जा रहा है। कुछ का कहना है कि अभी पिछले दिनों मनमोहन सिंह जी को राज्यसभा सीट दी गई। जब युवाओं को ही आगे लाना है तो फिर केंद्र और अन्य पदों पर ऐसा क्यों नहीं हो रहा। पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही यह अन्याय क्यों।

सुशील कुमार शिंदे आदि का प्रयास है सराहनीय
पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे जैसे प्रमुख नेता अभी भी पार्टी को जोड़ने और कार्यकर्ताओं को बांधे रखने के लिए प्रयासरत हैं और कह रहे हैं कि एनसीपी और कांग्रेस मिलकर लड़ सकते हैं महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव। पांडुचेरी के सीएम कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी शासन निरंकुश हो रहा है तो शशि थरूर फरमा रहे हैं कि मोदी जी जो कहा है वो करिए वरना मन की बात मौन की बात बनकर रह जाएगी। यह दोनों ही बातें कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए अच्छा प्रयास है। लेकिन जब तक आम कार्यकर्ता और नेता को जोड़ने और उनमें उत्साह भरने का प्रयास नहीं किया जाएगा तब तक सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी कितना ही सियासी ऑक्सीजन पार्टी को देने की कोशिश कर लें उसका कोई लाभ होने वाला नहीं होने लगता है।

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इमरजेंसी के बाद जिस ताकत से उभरी इंदिरा गांधी, समीक्षा हो
वरिष्ठ कांग्रेसी शायद भूले नहीं होंगे की इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस की क्या स्थिति देश में हुई थी, लेकिन इस चुनाव में मिली पराजय के बाद जो चुनाव हुए उसमें यह दल कितनी मजबूती के साथ उभरकर आया और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में केंद्र में मजबूत सरकार बनीं ऐसा क्यों हुआ उन घटनाओं प्रसंगों तथा नीतियों का अवलोकन और समीक्षा सोनिया, प्रियंका और राहुल गांधी को करनी होगी कि इतनी बड़ी पराजय के बाद इंदिरा गांधी सत्ता में कैसे लौटीं। मुझे लगता है कि अगर समीक्षा की गई तो कई ऐसे बिंदु मिल सकता है जिनसे इस पार्टी में टूट पर विराम लग सकता है।

राहुल गांधी को दौरा इस समय ठीक नहीं
हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव से ठीक पहले जैसे राहुल गांधी विदेश यात्रा पर गए उसका कोई अच्छा असर कार्यकर्ताओं पर नहीं पड़ रहा है इसलिए कांग्रेस मुखिया को ऐसे दौरों के लिए एक नीति जरूर बनानी चाहिए क्योंकि चुनाव जीतने के लिए ऐसी छोटी बात का भी बड़ा महत्व होता है।

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