सरकारें सोच-समझकर क्यों नहीं लेती फैसला : छत्तीसगढ़ में बढ़ाए गए आरक्षण पर लगी रोक

32
loading...

छत्तीसगढ़ की सरकार द्वारा ओबीसी के लिए आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किये जाने के फैसले का विरोध करते हुए वेद प्रकाश सिंह ठाकुर और कुछ अन्य द्वारा न्याय पालिका में दायर याचिका के बाद उच्च न्यायालय ने सरकार के इस निर्णय पर रोक लगा दी है। राज्य के महाधिवक्ता सतीशचंद्र वर्मा के अनुसार मुख्य न्यायाधीश पीआर रामचंद्र मेनन और न्यायमूर्ति पीपी साहू की पीठ ने गत दिवस आरक्षण के मुद्दे पर अपना आदेश जारी किया। बताते चलें कि राज्य सरकार ने विगत दिनों नई आरक्षण नीति के तहत राज्य में 72 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े तबके को दिए गए 10 प्रतिशत आरक्षण सहित कुल 82 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। इसके खिलाफ वेदप्रकाश सिंह ठाकुर और अन्य ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं। जिस राज्य सरकार ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 32 प्रतिशत, अनुसूचित जाति (एससी) को 13 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत सहित कुल 72 प्रतिशत आरक्षण तथा केंद्र सरकार की व्यवस्था के अनुसार सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण सहित कुल 82 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद एक अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इसे भी पढ़िए :  चर्चाओं मे ब्लड बैंक को लेकर डाॅक्टरों में टकराव, आला ग्रुप के कुछ सदस्य लगे है अवैध निर्माण करने और दबाव बनाने में

मामला माननीय उच्च न्यायालय में पहुँचे गया है इसलिए इस संदर्भ में नीतिगत आधार पर कुछ भी कहना उचित नहीं है लेकिन सामाजिक व्यवस्था और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि सरकार चाहे केंद्र की हो या प्रदेश की अगर कोई फैसला ऐसा करे जिससे किसी को फायदा और किसी को नुकसान होता हो या निर्णय का विरोध होने की संभावना हो तो उसे पहले किसी योजना की घोषणा करने से पूर्व न्याय के जानकारों से पूर्ण राय जरूर लेनी चाहिए। क्योंकि कोई घोषणा होने के उपरांत अगर विरोध होता है या उसके क्रियांवयन पर रोक लगती है तो कुछ लोगों में असंतोष की भावना पैदा होने से इन्कार नहीं किया जा सकता और ऐसी परिस्थितियों में तो सरकार को विरोधों का सामना करना ही पड़ता है तथा नागरिकों को भी तनाव झेलना पड़ता है और कभी कभी कुछ लोग ऐसे मामलों को लेकर मुखर होकर खिलाफ बोलने से भी नहीं चूकते हैं ऐसी स्थिति में घोषणा से किसी भी रूप से जुड़े व्यक्ति संगठन आदि के भी विवाद में घिरने की संभावनाएं बढ़ जाती है जो ठीक नहीं है। इसलिए सरकार जनहित में लिए जाने वाले फैसले खूब सोच समझकर ही ले तो अच्छा है।

इसे भी पढ़िए :  जया बच्चन के बयान से शिवसेना खुश, मुखपत्र सामना में की तारीफ

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

two × five =