योगी के इस फैसले से मॉब लिंचिंग के पीड़ितों को मिलेगी राहत और लगेगा भीड़तंत्र पर लगाम

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मॉब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डालने की अजीब घटना है। इस रोज के लिए तो नहीं आजाद हुआ था मुल्क। जब सारे मतभेदों को भुलाकर सोचा था कि 1947 की अगस्त की 14वीं तारीख को आदमी और आदमी बराबर होगा। हर व्यक्ति नागरिक होगा भीड़ नहीं। लेकिन स्वतंत्रता के 72 साल बाद भी बराबरी नहीं आई है। संवैधानिक मूल्यों के डकैत और आपसी भाईचारे के हत्यारों ने मर्यादा पुरूषोत्तम राम के नाम पर खल्क की पर्चियां उठा लीं। जब भीड़ ही किसी की मार डाले तो क्या कहेंगे। हाड़-मांस के इंसान को बिजली के खंभे से बांधकर, पीट-पीटकर मार दिया। आरोप बस इतना कि उसने मोटरसाइकिल चुराने की गंभीर गुस्ताखी कर दी। पिटाई का वीडियो भी सोशल मीडिया में सर्कुलेट हुआ। वीडियो में भीड़ को पिटाई के दौरान युवक से ‘जय श्री राम’ और ‘जय हनुमान’ के नारे लगवाते भी देखा गया।

एक मिनट के लिए मान लें कि मार खाने वाले का नाम तबरेज नहीं राजेश हो फिर भी इस घटना को जायज नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि बात हिन्दू-मुसलमान की आरती अजान और कौम के ईमान की नहीं बल्कि देश के विधान की है। धार्मिक चश्मे को परे रखकर देखें तो जून के महीने में सभ्यता की लाश पर सनातन संसार के सूरमाओं ने दिन दहाड़े हत्या का अध्याय रच दिया। झारखंड पुलिस का कमाल ही कहेंगे कि उल्टा तबरेज अंसारी पर ही मुकदमा कर दिया। उनकी लॉकअप में ही मौत हो गई। बहुत मुश्किल से 11 लोगों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ। लेकिन सिर्फ तीन महीने में बिना किसी चार्जशीट, सुनवाई और मुकदमे के पुलिस ने इस मामले में 11 अभियुक्तों पर से हत्या की धारा को भी हटा दिया है।

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झारखंड की सरकार, झारखंड की पुलिस और झारखंड के सरकारी तंत्र ने हत्या के आरोपियों के सामने हाथ जोड़ लिया कि हमसे भूल हो गई कि हमने हत्या का मुकदमा दर्ज किया। पुलिस वाले पूरी बेशर्मी से कहते हैं कि तबरेज की मौत तो दिल का दौरा पड़ने से हुई। तो क्या तबरेज अंसारी को किसी ने नहीं मारा और वो अपने आप मर गया। पहलू खान को भी किसी ने नहीं मारा। तबरेज अंसारी को भी किसी ने नहीं मारा। दोनों अपने आप ही मर गए। आदमी की जान ले लेना बिना लाइसेंस की गाड़ी चलाने से भी सस्ता हो गया है। पहलू ख़ान के मामले में भी सभी 6 आरोपी बरी हो गए। वह भी तब जब पहलू ख़ान को सरेआम पीट-पीट कर मार दिया गया था। लिन्चिंग का वीडियो बनाया गया। इसकी साफ़-साफ़ तस्वीरें थीं। पहलू ने मौत से पहले ‘डाइंग स्टेटमेंट’ दिया था और पीटने वालों के नाम बताए थे। पहलू के दो बेटे प्रत्यक्षदर्शी थे। फिर भी सभी अभियुक्त बरी होकर हंसते मुस्कुराते गर्व के साथ अलवर के जिला मजिस्ट्रेट के कोर्ट से बाहर निकले। मंत्री हत्या के आरोपियों को माला पहनाते हैं, उनका सम्मान करते हैं और उनका हौसला बढ़ाते हैं।

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लेकिन मॉब लिचिंग यानी भीड़ तंत्र के जरिये होने वाली आपराधिक घटनाओं को रोकने और ऐसी घटनाओं के पीड़ित परिवारों की मदद के लिए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। यूपी सरकार ने यूपी में मॉब लिचिंग के पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने का फैसला किया है। योगी सरकार जांच से पहले मुआवजे की 25 फीसदी की राशि पीड़ित परिवार को दे देगी। इसके पहले जांच के बाद मुआवजा दिया जाता था। लेकिन अब इसमें बड़ा बदलाव किया गया है। इसमें रेप जैसे जघन्य मामले को भी जोड़ा गया है। योगी कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश में मॉब लिंचिंग, रेप और एसिड अटैक के पीड़ितों एवं उनके परिवारों को मुआवजा देने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी है।

योगी कैबिनेट के फैसेल के अनुसार जिलाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर सम्बन्धित श्रेणी में दी जाने वाली राहत की राशि के अधिकतम 25% हिस्से को अंतरिम क्षतिपूर्ति के तौर पर दिया जाएगा। जबकि अभी तक बलात्कार और मॉब लिंचिंग के मामलों में फौरी मदद के बजाय जांच के बाद ही पीड़ितों को मदद दी जाती थी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, भीड़ हिंसा, दुष्कर्म, एसिड अटैक जैसी अलग-अलग परिस्थिति में 14 बिंदुओं पर तय मुआवजे में से जिलाधिकारी के स्तर पर अब 25 फीसदी अंतरिम मुआवजा दिया जा सकेगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि योगी सरकार का भीड़तंत्र की घटनाओं को कम करने की दिशा में पहला कोई कदम हो। इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मॉब लिचिंग की घटनाओं को देखते हुए गोवंश मालिकों के लिये गौ सेवा आयोग के प्रमाणपत्र का प्रावधान दिया था जिसके अनुसार अगर कोई व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर गोवंश को ले जाता है तो गौ सेवा आयोग उसे प्रमाणपत्र देगा। सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आयोग की ही होगी ताकि मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं को रोका जा सके।

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