देवताओं के अभिशाप के चलते इस गांव ने 400 वर्षों से नहीं सुनी बच्चे के जन्म की किलकारी!

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भोपाल, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 80km दूर राजगढ़ जिले का गांव है सांका जागीर. इस गांव को सांका श्याम जी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहां 16वीं शताब्दी का अति प्राचीन मंदिर है, मंदिर में श्यामजी की छत्री बनी हुई है. इस गांव की आबादी करीब एक हजार है और दो गांवों को और शामिल कर इसे ग्राम पंचायत बनाया गया. इस गांव में 400 वर्षों में किसी भी घर पर बच्चे का जन्म नहीं हुआ. गांव की सीमा में एक बच्चे का भी जन्म नहीं हुआ. जन्म के समय किसी भी बच्चे की किलकारी इस गांव में नहीं सुनाई दी, ऐसा इसलिए कि गांव में मंदिर निर्माण के दौरान व्यवधान उत्पन्न होने से देवताओं ने नाराज होकर गांव में किसी भी बच्चे का जन्म न होने का अभिशाप दिया था.

आज भी उसी अभिशाप के चलते गांव वाले गर्भवती महिला की डिलीवरी गांव की सीमा से बाहर कराते हैं. इस गांव में कोई भी व्यक्ति शराब या मांस का भी सेवन नहीं कर सकता. भूल से यदि कोई शराब पीकर या मांस खाकर गांव में आ गया, तो उसे तत्काल दंड मिलता है. वह बीमार हो जाता है और गांव में रह नहीं पाता, स्थानीय ग्रामीण इसे देवता का दंड बताते हैं.

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राजगढ़ जिले की नरसिंहगढ़ तहसील के गांव सांका जागीर में इस सच को जानने के लिए जी मीडिया की टीम पहुंची. जब पूरे मामले की पड़ताल की, तो पूरा मामला 400 वर्ष पहले से जुड़ा निकला. गांव में 16वीं शताब्दी का श्यामजी का मंदिर है, जिसे मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने पर्यटन स्थल भी घोषित किया है. इस प्राचीन मंदिर की अद्भुत बनावट को देखने के लिए रोजाना पर्यटक आते हैं. इस मंदिर का निर्माण कोटरा के राजा श्यामसिंह की युद्ध में मौत होने पर उनकी पत्नी महारानी भाग्यवती ने कराया था. 16वीं शताब्दी के इस मंदिर के मुख्य मंदिर पर धार्मिक दृश्यों का अंकन है, श्यामजी की छत्री के पूर्व की ओर गणेश, भैरव व द्वारपाल के अंकन वाला शिव मंदिर बना हुआ है.

कहा जाता है कि जब महारानी ने श्यामजी की छत्री बनाने का काम शुरू किया, तो इस मंदिर का निर्माण एक दिन में होना था और देवताओं ने मंदिर निर्माण को सूर्य उदय से पहले करने का निर्णय लिया था. मंदिर का निर्माण खुद विश्वकर्मा कर रहे थे. गांव वालों से कहा गया कि मंदिर निर्माण में किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो और गांव में किसी प्रकार का शोरगुल न हो. मंदिर का निर्माण अंतिम चरण में था और मंदिर की पताका फहराने के लिए मंदिर के मुख्य द्वार पर एक सेवादार खड़ा हुआ था. इसी बीच सुबह 4 बजे के लगभग एक महिला ने अपने घर में अनाज पीसने के लिए घट्टी चला दी.

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मंदिर के निर्माण में व्यवधान पैदा हो गया और द्वार पर पताका फहराने के लिए लेकर खड़ा सेवादार उसी स्थान पर जड़ होकर पत्थर का बन गया. मंदिर निर्माण आए व्यवधान से देवता नाराज हो गए और उन्होंने गांव में अभिशाप दे दिया आज के बाद इस गांव में कोई जन्म नहीं लेगा. तभी से गांव वाले इस अभिशाप से बचने के लिए गांव में डिलीवरी नहीं कराते.

गांव वालों का कहना है कि देवताओं के अभिशाप के बाद गांव में एक दो बार डिलीवरी कराने की कोशिश की गई तो या तो बच्चे की मौत हो गई या बच्चा विकलांग हुआ. इसके बाद गांव वालों ने इस अभिशाप को स्वीकार कर लिया और उसके बाद कभी बच्चे के जन्म के समय की किलकारियां इस गांव में नहीं गूंजी. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब संसाधन नहीं थे, तब गांव की सीमा से बाहर एक कमरा बना रखा था और वहीं गर्भवती महिला को ले जाकर डिलीवरी करवाई जाती थी. इसे किंवदंती कहें या अभिशाप. इसे अंधविश्वास कहें या आस्था.

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ऐसा नहीं इसे केवल इस गांव के लोग ही मानते हैं. इस गांव के विकास खंड के अधिकारी भी इस बात की पुष्टि करते हैं. नरसिंहगढ़ के ब्लॉक मेडिकल अधिकारी गौरव त्रिपाठी और विकास खंड अधिकारी रीना कुमारियां भी इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि इस गांव में किसी बच्चे का जन्म नहीं होता. अभिशाप के चलते ग्रामीण गांव में किसी भी बच्चे का जन्म नहीं होने देते. गर्भवती महिला को नरसिंहगढ़, भोपाल या कोटरा डिलीवरी के लिए ले जाते हैं. कहने को इस गांव में ग्राम पंचायत है, लेकिन यहां आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. गांव में केवल एक आशा कार्यकर्ता है. गांव में पर्यटन के लिए आने वाले भी इस गांव से जुड़ी किंवदंती की पुष्टि करते हैं.

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