MeToo पर महिलाओं की आवाज अनसुनी कर दी गई थी

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नई दिल्ली । पितृसत्ता, लैंगिक भेदभाव बचपन से हमारे लिए ऑक्सीजन जैसा काम करते हैं, जिसमें हम पलते-बढ़ते हैं। इसलिए बड़े बदलाव आने में थोड़ा वक्त लगेगा, फिर भी मीटू आंदोलन की वजह से औरतों को अपनी आवाज उठाने और राय रखने का मंच मिला है। अमेरिकी लेखक व एक्टीविस्ट डार्नेल एल मूर ने महिला मुद्दों पर काम करने वाली स्वंयसेवी संस्था ब्रेकरू और क्वार्टस द्वारा आयोजित परिर्चचा में यह बात कही।

इसका विषय था ‘‘मीटू का एक साल, क्या हुआ क्या बाकी’। खबर लहरिया की दिशा मलिक और ब्रेकरू की प्रियंका खेर इसमें शामिल हुईं। वक्ताओं ने माना कि इस मुद्दे पर वैकल्पिक नैरिटिव गढ़ने में पापुलर कल्चर प्रभावी माध्यम है, जो खासतौर से युवा वर्ग के बात व्यवहार को बदलने में सहायक होता है। डार्नेल ने बताया कि अमेरिका में भी रंग के आधार पर औरतों के साथ ऐसे ही भेदभाव की कहानियां और किस्से होते रहते हैं।

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2006 के बाद से जब महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा, जैसे यौनिक हिंसा के मुद्दे ने जोर पकड़ा, तब से स्कूलों, कॉलेजों विविद्यालयों, कार्यालयों (वॉल स्ट्रीट, हॉलीवुड) की नीतियों में बदलाव देखने को मिले हैं। उन्होंने आगे कहा कि उनका मकसद किसी को सजा दिलाना नहीं किंतु लोगों की सोच और व्यवहार को बदलना है।उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया की वज़ह से लैंगिक हिंसा के बारे में बात करने और इसको मुद्दे के रूप में उठाने में एक अलग तरह की क्रांति आ गई है। जबकि यह मुद्दे कुछ वक्त पहले तक टैबू की तरह थे।

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जिस पर बात करना काफी मुश्किल था। मीटू मूवमेंट कितना वायरल हुआ, यह सिर्फ इसी से पता लग जाता है कि हैसटैग मीटू एक करोड़ नब्बे लाख से अधिक बार प्रयोग किया गया, यानी हर दिन 55,319 ट्वीट हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि इंटनेट की वजह से कितनी महिलाएं अपनी आवाज उठा रहीं हैं और लोगों तक अपनी परेशानियां पहुंचा रही है। खबर लहरिया की मैनेजिंग डायरेक्टर दिशा ने कहा कि इंटरनेट की वजह से घर पर बैठी महिला और प्रशासन के बीच की दूरी समाप्त हो गई है। महिलाएं अब डिजीटल सिटीजन के रूप में उभर रहीं हैं।

ग्रामीण इलाके में रहने वाली महिला भी अगर वाट्सअप और फेसबुक का इस्तेमाल करना जानती है तो अपनी आवाज सही लोगों तक पहुंचा सकती है। कार्यक्रम में कानून का पालन कराने वाली संस्थाओं और उन रु कावटों के बारे में भी र्चचा हुई ।

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प्रियंका खेर ने कहा कि इतनी उन्नति के बाद भी परिस्थियों यानी घटना को सच साबित करने की जिम्मेदारी औरत पर ही होती है। बॉलीवुड का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि बहुत ही कम मामले ऐसे दिखे जिन पर मीडिया ने थोड़ा ध्यान दिया और उन मामलों में आरोपियों पर खबरें कीं।

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