सरकार सोचे, क्यों बढ़ रही है नौकरशाहों में आत्महत्या की प्रवृति

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बीती 14 अगस्त को इंस्पेक्टर अब्दुल शहीद भूपामी थाना प्रभारी और एक अन्य व्यक्ति सतीश मलिक की वजह से आत्महत्या करने की बात कहकर फरीदाबाद एनआईटी में तैनात डीसीपी विक्रम कपूर द्वारा सेक्टर 30 स्थित सरकारी आवास पर पिस्तौल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली गई। तो बीते मंगलवार को मुजफ्फरनगर के महिला थाने में तैनात दारोगा सीमा यादव द्वारा स्वयं को भ्रष्टाचार के मामले में फंसाये जाने का आरोप लगाते हुए जहर खा लिया गया। महिला थाना प्रकरण में वहां के एसएसपी द्वारा पूरा थाना लाइन हाजिर कर दिया गया तो फरीदाबाद के डीसीपी प्रकरण में आरोपी इंस्पेक्टर के खिलाफ जांच शुरू हो गई। असलियत क्या है यह रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा और वो कब तक आएगी इस संदर्भ में कोई कुछ नहीं कह सकता।

ये दो घटनाएं तो मात्र उदाहरण हैं। समाचार पत्र पढ़ने और सोशल मीडिया पर सक्रिय चैनलों पर खबर सुनने वाले जागरूक पाठक अच्छी तरह जानते हैं कि आए दिन कहीं न कहीं से किसी न किसी सरकारी अधिकारी व कर्मचारी द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने की खबरें पढ़नें और सुनने को मिलती हैं। इसके लिए कारण कुछ भी रहे हों और कहीं कहीं तो ऐसे प्रकरणों में बाद में पता चलता है कि मरे व्यक्ति की मौत को दुर्घटना दर्शाया गया जबकि उसने आत्महत्या की थी। जो भी हो परिवार से ऐसे मामलों में एक कमाऊ सदस्य और आत्माओं से जुड़ा कोई न कोई रिश्तारूपी अंग तो बिछड़ ही जाता है और जिसके संग जो होता है उसके कष्ट तो वहीं जान सकता है। अन्य तो संवेदनाएं और दुख व्यक्त करने के अतिरिक्त मुआवजा या परिवार को कोई सुविधा देने की बात कहकर मामले की इतिश्रि कर लेते हैं। अब तो शायद कुछ ऐसा भी हो गया है कि मृतक के आश्रित को नौकरी दिया जाना कोई अनिवार्य नहीं है।

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हम देश का 73वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। हमारी केंद्र और प्रदेश की सरकारों ने अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की चाहे वो किसी भी विभाग में क्यों न हो। उनकी तनख्वाह में बेतहाशा वृद्धि करते हुए उन्हें और उनके परिवारों को सरकारी खर्च पर चिकित्सा सुविधा यात्रा, और अन्य लाभ भी दिये जा रहे हैं। ऐसे में आत्महत्या या हत्या सरकारी कर्मचारी और अधिकारी क्यों करने को मजबूर हैं और क्यों हो रही है इस विषय पर सरकार को विशेष तौर पर विचार करना होगा।

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मुझे लगता है कि कहीं न कहीं आम आदमी की मानवीय कमजोरी ज्यादा से ज्यादा धन कमाना और इस चक्कर में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करना और जिन लोगों से काम कराया जाना हैं उन्हें विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करना और वांछित इच्छाएं पूरी न होने से दुखी होकर डिप्रेशन में चले जाना भी आत्महत्या का कारण हो सकता है। औरों से ज्यादा इच्छाएं रखना हत्या की वजह बन सकती है। कई मामलों में ऐसा भी देखा गया है कि घर में जब बिना मेहनत करें ज्यादा लाभ प्राप्त होने लगता है तो परिवार के लोगों की इच्छाएं भी बढ़ जाती हैं और जब पूरी करने वाला उन्हें पूरा करने में सक्षम सिद्ध नहीं होता तो जो कलह घरों में शुरू होता है वह भी आत्महत्या या हत्या का कारण बन सकता है।
कुल मिलाकर मेरे कहने का आशय यह है कि गुणवत्ता के अनुसार समयसीमा में हर काम कराने के साथ ही भ्रष्टाचार और लापरवाही तथा मानसिक उत्पीड़न रोकने के लिए प्रयासरत केंद्र और प्रदेश की सरकारों को कुछ ऐसी व्यवस्था भी अब राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित करनी पड़ेगी और करनी भी चाहिए जिससे पैसे का बढ़ता लालच, भ्रष्टाचार आदि को वैचारिक चर्चा से रोका जा सके और आम आदमी को चाहे वह सरकारी नौकर हो या व्यापारी अथवा उद्योगपति कोई किसी की हत्या करने या स्वयं आत्महत्या करने की सोच से मुक्त हो सकें। मुझे लगता है कि अगर यह व्यवस्था लागू हो जाती है तो जहां देश का चैमुखी विकास गति पकड़ेगा वहीं राष्ट्रप्रेम और देश की अखंडता की भावना मजबूत होगी और कोई भी व्यक्ति अपने परिवार से कारण कोई भी हो बिछड़ने के लिए मजबूर नहीं होगा।और वैसे भी इस विषय में सरकार और समाज दोनों को सोचना होगा क्योंकि एक सरकारी नौकर चाहे वो अफसर हो या कर्मचारी उसकी पढ़ाई या अन्य सुविधाओं पर जितना पैसा परिवार का खर्च होता है उतना सरकार भी खर्च करती है।

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