मुत्यु दंड समस्या का समाधान नही, यौन उत्पीड़न के लिए समाज में वैचारिक क्रांति के हो प्रयास

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एक जनवरी से बीती 30 जून तक देश में बच्चों के साथ दुष्कर्म की 24212 घटनाएं हुई जो वाकई में चिंता और शौच का विषय है तथा मासूम बच्चों के स्वस्थ्य मानसिक विकास के लिए इन्हे रोका जाना अत्यंत जरूरी है। माननीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गंगोई, दीपक गुप्ता, अनिरूद्ध बोस की तीन सदस्य पीठ ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए इन्हे रोकने के लिए प्रयास शुरू कर दिये है।
खबर के अनुसार यौन उत्पीड़न के मामलों में यूपी पहले स्थान पर बताया गया है। देश में महिलाओं, बच्चों आदि के साथ होने वाली छेड़छाड़ दुष्कर्म बालात्कार आदि की घटनाएं एक गंभीर अपराध और व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों पर कुठाराघात है जिसे रोका जाना अत्यंत जरूरी हो गया है।
लेकिन इस अपराध के लिए मुत्यूदंड का प्रावधान किसी भी रूप में सही नही कहा जा सकता। विश्व के 140 देशों में जानकारी से पता चलता है की मृत्यु दंड की व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है। इस संदर्भ में कांग्रेस के सांसद सदस्य प्रदीप टम्टा और सपा के विश्म्भर प्रसाद निषाद द्वारा भी सवाल उठाये जा चुके है।
मेरा भी मानना है की मुत्यु दंड किसी समस्या का समाधान नही है क्योकि हत्या में मृत्यु दंड की सजा है लेकिन हत्या जैसा जुर्म समाप्त हो गया हो ऐसा लगता नही है।
और भी कई ऐसे कानून है जिनके बन जाने के बाद भी उनसे सबंध अपराध खुब हो रहे है।
जो इस बात का प्रतीक कहे जा सकते है की सजा के डर से अपराध रूक जायेगे यह विश्वास के साथ नही कहा जा सकता क्योकि अगर ऐसा होता तो दुनियां में हर प्रकार के अपराध लगभग समाप्त हो गये होते जबकी हो इसका उलटा रहा है अपने देश में तो आये दिन मीडिया के माध्यम से इनसे सबंध खबरें ओर जानकारियों खुब पढ़ने और सुनन को मिल रही है।
मेरा इस संदर्भ में किसी भी स्तर पर लिये जा रहे निर्णयों का विरोध करने का कोई इरादा नही है। लेकिन मुझे लगता है की समाज में दशकों से यौन उत्पीड़न ओर छेड़छाड़ की चली आ रही घटनाओं को सजा से ज्यादा समाज में इससे सबंध वैचारिक क्रांति लायी जानी चाहिए। हां उसके साथ ही सजा का प्रावधान भी हो लेकिन उसमें ऐसी व्यवस्थाएं जरूर की जाये की कोई निदोष इस मामलें में फंसकर या उसे फंसाकर जबरदस्ती की सजा ना दी जा सके।
इसलिए मुझे लगता है की बाल यौन उत्पीड़न दुष्कर्म जैसी घटनाओं को रोकने के लिए हर उपाय हो लेकिन उसमें ऐतियात विशेष तौर पर रखे जाने चाहिए क्योकि पिछले कुछ वर्षो में इससे सबंध कुछ प्रायोजित मामलें जो प्रकाश में आये उससे यह स्पष्ट सा होता है की कुछ लोग धन, बाहुबल और समाज में अपनी धमक का लाभ उठाकर अपने विरोधियों से बदला लेने का भी माध्यम ऐसे आरोपों को बनाने लगे है।
उन्ही को दृष्टिगत रख यह कहा जा सकता है की मुत्यु दंड के बाद कही ऐसा ना हो की कुछ लोग अपनी ताकत के दम पर अपने विरोधियों के खिलाफ षडयंत्र कर उन्हे गलत तरिके से सजा दिलाने में सफल ना होने लगे।

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– रवि कुमार बिश्नोई
संस्थापक – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समाज सेवी संगठन आरकेबी फांउडेशन
सम्पादक दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
आनलाईन न्यूज चैनल ताजाखबर.काॅम, मेरठरिपोर्ट.काॅम

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