बाल श्रम का विरोध क्यो?

18
loading...

आर्थिक परेशानियों और अभावों में पल रहे बच्चों को गलत राहों पर जाने से रोकने के लिए काम है एक सही रास्ता

अभिभावक गरीब हो या अमीर हर कोई अपने बच्चों को सभी सुख सुविधा उपलब्ध कराने तथा सम्मान से जीने के अवसर देने हेतु वो सबकुछ करते है जो जरूरी होता है लेकिन कारण कुछ भी हो कुछ मां बाप अपने बच्चों को वो नही दे पाते है जो उन्हे मिलना चाहिए या जिसके वो हकदार होते है इसलिए ऐसे बच्चे अपने दम पर अपना मार्ग प्रस्त कर अपनी मेहनत लगन से जो उन्हे चाहिए वो और समाज में प्रमुख स्थान प्राप्त करते है ओर कभी कभी तो ऐसे बच्चे अपने प्रयासों से कुछ ऐसे उच्च स्थान तक पहुंचते है जहां तक सुविधा प्राप्त माहोल में पलने वाले बालक सोचते भी नही है।
लेकिन बाल श्रम के नाम पर मुझे लगता है की हम उनकी तरक्की का मार्ग अवरूध करने में कही ना कही दोषी जरूर है सरकार श्रम कानूनों में सुधार करे और यह प्रयास करे की कोई बच्चा बाल श्रम करने के लिए मजबूर ना हो। हर नवजात को अपनी उम्र के हिसाब से पढ़ाई लिखाई सहित सबकुछ प्राप्त हो।
मगर अगर अभिभावक और सरकार तथा बाल श्रम विरोधी संगठन उन्हे ऐसा माहौल उपलब्ध कराने में सक्षम नही हो पा रहे है तो कारण कुछ भी हो फिर बच्चो को उनके हाल पर छोड़ा जाये जिससे वो अपनी काबिलियत और कुब्बत के दम पर अपना मार्ग और जीवन का सफर तय करने हेतु आगे बढ़े।
मै बाल श्रम समर्थक नही हुं लेकिन मेरा मानना है की आर्थिक परेशानियों और अभावों में पल रहे बच्चों को काम जरूर करना चाहिए क्योकि एक तो इससे उनके परिवारों के भरण पोषण में मद्द होती है दूसरे अगर दम है तो हम है वाली कहावत को चित्रार्थ करते हुए पैर मारकर धरती से पानी निकालने की किदवती को आत्मसाध कर ऐसे ही बच्चे आगे बढ़कर समाज में वो स्थान प्राप्त करते है जिनके बारंे में सोचा नही जा सकता और वो हर क्षेत्र में सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए अपने लिए ही नही अपने जैसे और बच्चों का मार्ग प्रस्त कर ऐसे ऐसे जनहित के कार्य कर जाते है जो कोई सोच भी नही सकता।
जितना मुझे ज्ञान है या सुना और पढ़ा है उसके अनुसार हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा भी काफी श्रम शायद बालपन में किया गया है तो अक्सर विवादों में रहने वाले ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सनारो ने बार-बार बालश्रम का बचाव कर इस सप्ताह एक बार फिर विवाद को न्यौता दे दिया है। घोर दक्षिणपंथी नेता ने इस सप्ताह फेसबुक पर लिखा, मैं तब से काम कर रहा हूं, जब मैं आठ साल का था..और आज जो मैं हूं..वह मैं हूं। उन्होंने पहले कहा, जब कोई आठ-नौ साल का बच्चा काम करता है तो कई लोग ‘जबरन श्रम’ या ‘बालश्रम’ कहकर इसकी निंदा करते हैं। उन्होंने कहा, यदि वही बच्चा ‘कोका पेस्ट’ पीता है तो कोई कुछ नहीं कहता। उन्होंने एक बार फिर एक समारोह में कहा, मैं आठ साल की उम्र से काम कर रहा हूं, कभी मक्का उगाया, कभी केले तोड़े.. इसके साथ ही मैं पढ़ाई भी कर रहा था। उन्होंने कहा, आज जो मैं हूं.वह मैं हूं। उनके इन बयानों की चारों तरफ खूब निंदा की जा रही है। ब्राजील के कानून के अनुसार 16 से कम आयु के बच्चों का काम करना वर्जित है। केवल प्रशिक्षु 14 वर्ष से काम कर सकते हैं। ब्राजील के भूगोल एवं सांख्यिकी संस्थान के अनुसार ब्राजील में पांच से 17 वर्ष के करीब 25 लाख बच्चे या किशोर काम करते हैं।
औरो की बात मै नही करता और ना ही यह कहता हुं की मै कोई बहुत सफल हुं लेकिन यह बात गर्व से कह सकता हुं की अपने बचपन में कोई सुविधा ना होने के चलते ओर परिवार की आर्थिक तंगी के कारण मै पांच छः साल की उम्र में फूल सिंह चाय वाले की दुकन पर 50 पैसे महिना पर छूठे प्याले धोता था और 8-10 साल की उम्र में वर्तमान में उतरांखड के उधमसिंह नगर के काशीपुर जसपुर रोड पर आज से लगभग 55 साल पूर्व बन रही सड़क के लिए 10 पैसे से लेकर 25 पैसे रोज पर पत्थर तोड़ने का काम किया करता था। परिणाम स्वरूप पढ़ाई के नाम पर पूर्ण रूप से निरक्षर तथा व्यवहार से जाहिल और गवार होने के बाद भी मैने अपनी कमियों और अभाव को अपनी ताकत बनाया और आज भगवान के आर्शीवाद और अपने शुभचिंतकों के सहयोग से सुख सुविधा से पूर्ण जीवन यापन कर रहा हुं अनपढ़ होने के बावजूद दुनियां में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे विद्वानों द्वारा किये जाने वाले कार्य समाचार पत्र प्रकाशन ओर आॅनलाईन न्यूज चैनलों का संचालन अपने सहयोगियों तथा अपने पुत्र मजीठिया बोर्ड यूपी के सदस्य, आॅनलाईन न्यूज चैनल ताजाखबर.काॅम के चेयरमेन अंकित बिश्नोई के साथ किया जा रहा है तो मेरा एक बेटा मुम्बई की फिल्मी दुनिया में अपनी किस्मत आजमाते हुए आगे बढ़ने का प्रयास संघर्षो के साथ कर रहा है। यह बिंदू यहां रखने से मेरा आशय अपनी सफलता का गुणगान करना नही है मै सिर्फ उन बाल श्रम विरोधियों को इतना बताना चाहता हुं की बचपन में श्रम करने से ना तो किसी की कामयाबी रूकती है और ना ही उसका विकास ओर अगर इसका उदाहरण किसी को देखना हो तो विश्वभर में सर्वे कराया जाये मेरा मानना है की सफलता के सिरमोर कहे जाने वाले लोगो में काफी प्रतिशत वो होगे जिन्होने बचपन में बाल श्रम ही नही और भी कई कठिनाईयों का सामना करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया होगा।
कुल मिलाकर कहने का आशय यह है की बाल सदन का विरोध करने की बजाय परिस्थितियों में सुधार पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। मै स्पष्ट रूप से उन लोगो की निंदा करता हुं जो बाल श्रम का विरोध करते है क्योकि उनकी वजह से कई परिवारो को कई प्रकार की कठिनाईयां उठानी पढ़ती है।

इसे भी पढ़िए :  शीला दीक्षि‍त का निधन, PM मोदी ने जताया दुख, कहा-दिल्‍ली के विकास में उनका योगदान यादगार

– रवि कुमार बिश्नोई
संस्थापक – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समाज सेवी संगठन आरकेबी फांउडेशन
सम्पादक दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
आनलाईन न्यूज चैनल ताजाखबर.काॅम, मेरठरिपोर्ट.काॅम

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

four + five =