SC में धारा 377 के खिलाफ केस जीतने वाली वकील खुद भी हैं लेस्बियन कपल, दुनिया के सामने कुबूला अपना प्‍यार

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नई दिल्‍ली: पिछले साल सितंबर में SC ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए धारा 377 (Section 377) को निरस्‍त कर दिया था जिसकी वजह से सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था. हालांकि यह लड़ाई आसान नहीं थी. LGBTQ समुदाय के लिए बराबरी के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली वकील Menaka Guruswami और Arundhati Katju ने इसके लिए बहुत लंबी और मुश्किल जंग लड़ी. आखिरकार वह पांच जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच को इस बात के लिए मनाने में कामयाब रहीं कि समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं. लेकिन sc में मिली यह जीत सिर्फ उनके पेशे की जीत नहीं थी बल्‍कि यह पर्सनल कामयाबी भी थी.

मेनका और अरुंधति दोनों ही सफल वकील हैं. मेनका ने Howard School से एलएलएम और ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी से डीफिल किया है. वह बर्लिन के Institute of Advanced Studies की फेलो रह चुकी हैं. यही नहीं वह Columbia Law School, Yale Law School, New York University of Law जैसे विश्‍वप्रसिद्ध शिक्षण संस्‍थानों की विजिटिंग फैकल्‍टी भी हैं. वहीं अरुंधति ने Columbia University से एलएलएम की डिग्री हासिल की है.

सुप्रीम कोर्ट में मिली ऐतिहासिक जीत के लगभग एक साल बाद एडवोकेट मेनका और अरुंधति ने खुलासा किया है वह खुद भी लेस्बियन कपल हैं. सीएनएन को दिए एक इंटरव्‍यू में दोनों ने न सिर्फ धारा 377 के खिलाफ अपनी जीत के बारे में बताया बल्‍कि अपने रिश्‍ते को भी सार्वजनिक किया.

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सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जब धारा 377 को निरस्‍त कर दिया था उस दिन को याद करते हुए अरुंधति और मेनका ने कहा कि वह बहुत खुश हुईं थीं. अपनी बेटियों को देखने के लिए उनके परिवार के लोग भी कोर्ट आए थे और फैसला आने के बाद वह भी खुश हुए थे. तब सब ने साथ मिलकर जीत का जश्‍न मनाया था.

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अरुंधति ने हाल ही में #SareeTwitter ट्रेंड को फॉलो करते हुए अपनी पार्टनर मेनका के साथ वाली फोटो ट्विटर पर पोस्‍ट की थी:

बहरहाल, सीएनएन पर प्रसारित हुआ दोनों का Video social media पर Viral हो रहा है और लोग couple को शुभकामनाएं भी दे रहे हैं:

अब अगर इस पावर कपल की उपलब्‍धियों के बारे में बात करें तो Time Magazine ने साल 2019 के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में मेनका और अरुंधति को भी शामिल किया था.

गौरतलब है कि पिछले साल 6 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 के उस प्रावधान को रद्द कर दिया था, जिसमें आपसी सहमति से बनाए समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था. उस वक्त चीफ जस्टिस रहे दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने इसे निजता का मौलिक अधिकार बताते हुए खंडन किया था.

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