बड़ा कष्ट झेलना पड़ता है ल्यूकोड्रमा पीड़ितों को

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नई दिल्ली । भारत में सफेद दाग से पीड़ित लोगों को बड़ा कष्ट झेलना पड़ता है। शारीरिक, मानसिक और सामाजिक भी। अक्सर लोग इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को कुष्ठ रोगी समझ लेते हैं और पीड़ित को हेय दृष्टि से देखते हैं। इसी वजह से इससे पीड़ित रोगी कई बार डिप्रेशन में चले जाते हैं। इसके प्रति समाज में जागरूकता लाने के लिए ही 25 जून को दुनिया भर में विश्व विटिलिगो (सफेद रोग) दिवस मनाया जाता है।

लेकिन अब राहत देने वाली बात यह है यह है कि सरकारी संस्था रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को लंबे अनुसंधान के बाद इस रोग का इलाज मिल गया है। उसकी ल्यूकोस्किन दवा को इस रोग के इलाज के लिए सफल इलाज के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। यह दवा दो हिस्सों में बंटी हुई है।

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पहली है लगाने वाली मलहम और दूसरी है पीने वाला लिक्विड। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. नीतिका कोहली ने बताया कि मलहम में सात जड़ी-बूटियों का उपयोग किया गया है। इनमें स्किन फोटो सेंसिटाइजर, फोड़े-फूंसी रोधक, जलन और खुजली रोधक, रोगाणु रोधक, जख्म भरने वाले और कॉपर सप्लिमेंटिंग तत्व शामिल है। ओरल दवा को इस तरह विकसित किया गया है कि नए चकते (स्पॉट) ना बनें। विटिलिगो (सफेद दाग) के कई तरह के इलाज हैं, जिनमें एलोपैथिक दवाएं, ऑपरेशन और मूल उपचार के साथ दी जाने वाली अजंग्टिव थेरेपी शामिल है।

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सफेद दाग को लेकर लोगों को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हिमाचल की करीब एक दर्जन जड़ी बूटियों पर गहन अध्ययन के बाद ल्यूकोस्किन दवा का निर्माण हुआ। आयुर्वेद शोधों को लेकर ऐसा पहली बार है जब सरकार को सीएसआईआर के अध्ययन बीजीआर-34 और ल्यूकोस्किन के रूप में बड़ी कामयाबी मिली हो। एक लाख लोगों में सफल परिणाम मिलने के बाद अब इस दवा को ग्रामीण अंचल में ले जाने की तैयारी चल रही है।

बताया जा रहा है कि रक्षा वैज्ञानिकों के उन्नत अध्ययन सामने आने के बाद सरकार उनके साथ आयुष और स्वास्य को जोड़ते हुए संयुक्त रु प से अध्ययन करा सकती है। ताकि देश के ग्रामीण क्षेत्रों तक इनका सीधा लाभ पहुंचाया जा सके। आयुष को जिला स्तर तक ले जाने में सरकार को कामयाबी मिल चुकी है। अब कहा जा रहा है कि साढ़े 12 हजार हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के जरिए सरकार इसे किसानों तक पहुंचाने पर काम शुरू कर चुकी है। 2021 तक इसका लाभ भी मिलने लगेगा।

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