बूंदी शहर को ‘छोटी काशी’ के नाम से भी किया गया विभूषित

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dका प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत नजारा लिए है। यहाँ अनेक मंदिर होने से इसे ‘छोटी काशी’ के नाम से विभूषित किया गया है। यह खूबसूरत शहर बूंदी जिले का मुख्यालय है। प्राचीन बूंदी रियासत के समय महलों से जुड़ी मजबूत चार दिवारी (परकोटे) से घिरी थी। इसमें पश्चिम में भैरोपोल, दक्षिण में चौगान गेट, पूर्व में पाटन पोल एवं उत्तर में शुक्ल बावड़ी गेट बने हैं।

वर्षा एवं शरद ऋतु में विशेषकर बूंदी नगर का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है जब पर्वत हरियाली चादर ओढ लेते हैं, झील और तालाब पानी से लबालब भर जाते है, महल, छतरियों एवं मंदिरों का नया रूप नजर आने लगता है। बूंदी के आस पास के क्षेत्र में पहाडि़यों से गिरते झरनों पर पर्यटकों की चहल पहल बढ़ जाती है। नगर के मध्य स्थित आजाद पार्क एवं जैत सागर के किनारे बना रमणिक उद्यान की छंटा लुभावनी हो जाती है। रात्रि में बिजली की रोशनी में जगमगाते शहर की खूबसूरती तो कहना ही क्या। आज शहर ने परकोटे से बाहर निकल कर विस्तृत आकार लिया है। बूंदी में मोरड़ी की छतरी, छोटे महाराज की हवेली, कवि सूर्यमल्ल मिश्रण की हवेली, बडे महाराज की हवेली, मीरगेट स्कूल में बने पुराने चित्र एवं भालसिंह की बावड़ी भी दर्शनीय हैं। महाराव उम्मेदसिंह द्वारा 1770 ई. में निर्मित हनुमान जी की छतरी, चौथमाताजी का मंदिर, बाणगंगा में केदारेश्वर महादेव एवं अन्य देव मंदिर, हंसादेवी माता जी का मंदिर, कल्याण जी का मंदिर एवं लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं।

तारागढ़
बूंदी शहर के उत्तर में पहाड़ी पर बना तारागढ़ किला बूंदी के सिर पर ताज जैसा लगता है। यह किला बूंदी शहर से 600 फीट तथा समुद्रतल से 1400 फीट ऊँचाई पर है। राव रतन सिंह ने 1354 ईस्वी में इसका निर्माण करवाया था। दुर्ग की बाहरी दीवारों का निर्माण 18 वीं सदी के पूर्वाद्ध में जयपुर द्वारा नियुक्त गर्वनर दलेल सिंह ने करवाया था। तिहरे परकोटे में बना दुर्ग करीब साढे़ चार किलोमीटर परिधि में है।

यह दुर्ग कई बार अनेक शत्रुओं अल्लाउद्दीन खिलजी, मेवाड़ शासक क्षेत्रसिंह, मालवा के महमूद खिलजी, जयपुर शासक सवाई जयसिंह, कोटा नरेश भीमसिंह तथा दुर्जनशाल सिंह के अधिकार में चला गया परन्तु हर बार बूंदी के हाड़ा शासकों ने फिर से अपने अधिकार में ले लिया। दुर्ग में भीम बुर्ज, महल, पानी का तालाब, छतरी मंदिर आदि दर्शनीय हैं। जलाशयों में वर्षा जल संग्रहित होता था एवं वर्ष भर पेयजल के काम आता था। यही पर 120 फीट परिधि वाली 16 खंभों की सूरज छतरी दर्शनीय है।

राज प्रसाद
तारागढ़ दुर्ग के चरण पखारता बूंदी का राजमहल का अपना विशिष्ठ स्थान है। इसके निर्माण में अनेक शासकों का हाथ रहा। चौगान गेट से आगे चल कर महलों में जाते हैं तो महल की चढ़ाई शुरू होने से पहले राजा उम्मेद सिंह के घोड़े हंजा की प्रतिमा नजर आती है। समीप ही जरा सा आगे चलने पर शिव प्रसाद नामक हाथी की प्रतिमा बनी है। इसे महाराज छत्रसाल ने बनवाया था। यहाँ से आगे चलने पर एक के बाद दूसरा दो दरवाजे आते हैं। दूसरे दरवाजे पर 17 वीं शताब्दी में राजा रतनसिंह द्वारा बनवाया युग्म हाथियों के द्वार को हाथी पोल कहा जाता है। इस दरवाजे के दूसरी ओर रतन दौलत दरी खाना है। यहाँ बूंदी शासकों का राजतिलक किया जाता था। इसके आगे चलने पर छत्रमहल चौक के एक भवन में रामसिंह के समय के खगोल एवं ज्योतिष विधा के यंत्र रखे हैं। पास के कक्ष में बने सुन्दर भित्ती चित्र धुमिल हो गये हैं। छत्रमहल चौंक के एक ओर हस्थिशाला बनी है।

आगे दरीखाना और दूसरी तरफ रंग विलास है। यहीं सुन्दर उद्यान एवं चित्रशाला तथा अनिरूद्ध महल बने हैं। जिसे उन्होंने 1679 ई. में बनवाया था और आगे चल कर इसे जनाना महल बना दिया गया। चित्रशाला को कलादीर्घा कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां सम्पूर्ण दीवारों पर 18 वीं सदी पूर्वाद्ध के बूंदी शैली के चित्रों की ख्याति विश्व स्तर पर है। चित्रों को बचाये रखने के लिए सुरक्षित कर दिया गया है। दिन−रात पुरातत्व विभाग की निगरानी रहती है। गढ़ महल राजपूत शैली का दुर्लभ नमूना है।

जैत सागर
बूंदी में ही बस स्टेण्ड से करीब दो कि.मी. पर पहाडि़यों की गोद में बना जैत सागर अपनी लुभावनी छटा लिए है। पहाड़ी नदी पर बांध बनाकर इसका निर्माण किया गया है। इसके किनारे बना सुख महल एवं सुंदर उद्यान बने हैं। जैत सागर में सैलानियों के लिए बोटिंग की व्यवस्था है। बूंदी के अंतिम मीणा शासक जैता ने इसका निर्माण 14 वीं सदी में करवाया था। सुख महल का निर्माण राजा विष्णुसिंह ने 1773 ई. में करवाया था। सुख महल परिसर ने नया संग्रहालय स्थापित किया गया है। जैत सागर के एक किनारे पर नगर परिषद् द्वारा पहाड़ी पर आकर्षक उद्यान विकसित किया गया है। जैत सागर में जब कमल के फूल अपनी रंगत बिखरते हैं तो शोभा निराली हो जाती है। जैतसागर के समीप बने सुख महल में भूतल पर एक बड़ा और दो छोटे कक्ष है। प्रथम तल पर दो कमरे आमने सामने हैं। छत गुम्बद युक्त, शिखरनुमा हैं। दोनों कक्षों के मध्य जैत सागर की पाल की ओर एक आठ स्तंभों पर आधारित छतरी भी है।

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राजकीय संग्रहालय
संग्रह संबंधी गतिविधियां बूंदी में 20 वीं शती के मध्य से शुरू हुई जब स्थानीय लोगों ने बिखरी हुई कलात्मक सामग्री को इकटठा कर उन्हें सुरक्षित करने के उद्देश्य से विद्वत परिषद की स्थापना की। इसका नाम ‘नेशनल हेरिटेज प्रिजरवेशन सोसायटी’ बूंदी रखा गया।

इस सोसायटी ने एक संग्रहालय की शुरूआत की, जिसका उद्घाटन महाराजा बहादुर सिंह जी ने 1948 में किया, यह संग्रह सुखमहल में प्रदर्शित किया गया था। विद्वत परिषद इसकी प्रशासनिक व्यवस्था देखती थी, तब इसमें लगभग 100 प्रस्तर प्रतिमाएं और कुछ चित्र थे। संग्रहालय प्रातरू 8 से 10 तक और सांय 4 से 6 तक खुलता था, यहां एक संग्रहाध्यक्ष तथा अंशकालीन परिचारक थे। प्रतिदिन लगभग 100 दर्शक संग्रहालय देखते थे, जो उन दिनों के हिसाब से बहुत अच्छी संख्या थी। बून्दी का नया संग्रहालय इसी परिसर में बनाया गया है। संग्रहालय में क्षेत्र से प्राप्त मूर्तियां, अस्त्र−शस्त्र एवं चित्रों का प्रदर्शन किया गया है।

रानी जी की बावड़ी
बूंदी शहर की कलात्मक बावडि़यों एवं कुंडो में राव राजा अनिरूद्ध सिंह की विधवा रानी नाथावत द्वारा 1699 ई. में निर्मित शहर के मध्य स्थित रानी जी की बावड़ी सिरमौर है। बावड़ी में ऊपर से नीचे की ओर जाते हुए करीब 150 सीढि़यों के बाद जल कुण्ड आता है। स्थापत्य, मूर्ति, शिल्प बनावट सीढि़यां मध्य में बना हाथियों का तोरण द्वार, ऊपर बनी छतरियों तथा दीवारों में बने देवी देवताओं की मूर्तियां बावड़ी की विशेषताएं हैं। शहर की दूसरी महत्वपूर्ण बावड़ी गुल्ला जी की कुण्डली आकार की बावड़ी है। इसे गुलाब बावडी भी कहा जाता है। इसके आगे एल आकार की भिस्तियों की बावड़ी, श्याम बावड़ी तथा व्यास बावड़ी भी दर्शनीय हैं। शहर में और भी कई बावडि़यां बनी हैं।

नागर सागर कुण्ड
रानी जी की बावड़ी के समीप ही नागर−सागर नामक दो कुंड अपनी स्थापत्य एवं सीढि़यों की संरचना की दृष्टि से बेजोड़ हैं। यहां संगमरमर की प्राचीन छतरियां बनी हैं तथा आस−पास उद्यान बना है। कुड़ों में गजलक्ष्मी, सरस्वती एवं गणेश आदि धार्मिक मूर्तियां बनी हैं। रामसिंह की रानी चन्द्रभान कंवर ने इन्हें बनवाया था।

नवल सागर
करीब 400 वर्ष प्राचीन सुन्दर नवल सागर शहर के मध्य वार्ड सं. 2 में आकर्षण का केन्द्र है। महल के नीचे बने इस सरोवर से महल एवं तारागढ़ का संयुक्त दृश्य अत्यंत मनभावन लगता है। इससे शहर में जलापूर्ति भी की जाती है। सागर के किनारे बने मंदिर में गजलक्ष्मी की अद्वितीय मूर्ति स्थापित है। इसमें हाथी लक्ष्मी का घटाभिषेक करते नजर आते हैं। देवी के बालों से गिरते पानी को हंस अपनी चोंच में ले रहे हैं। देवी का नीचे का भाग श्रीयंत्र के रूप में है। बताया जाता है कि पुराने समय में तांत्रिकों द्वारा इसकी पूजा की जाती थी। नवल सागर के किनारे पर राजा विष्णु सिंह की रक्षिता सुंदर शोभराज जी ने 18 वीं सदी के उत्तर्राध में सुंदर घाट एवं महलों का निर्माण कराया था। प्रथम मंजिल पर खड़ी मुद्रा में हनुमान जी की प्रतिमा है।

शिकार बुर्ज
बूंदी में बनी शिकार बुर्ज राजाओं के शिकार के लिए बना सुंदर भवन है। इसे 1770 ई. में महाराव उम्मेद सिंह ने रहने के लिए बनवाया था और वे प्रायः यहाँ विश्राम करने आते थे। बाद में इस भवन को शिकारगाह के रूप में उपयोग में लिया जाने लगा। इसी के पास हनुमान छतरी बनी है। यह कभी खूबसूरत पिकनिक स्थल रहा।

खूबसूरत झरने
बूंदी से 9 कि.मी. दूरी पर प्रकृति की गोद में रामेश्वरम् खूबसूरत जगह है। यहां 200 फीट से ऊँचाई से गिरता झरना देखना रोमांचक लगता है। यह झरना जहाँ गिरता है वहां शिंवलिंग स्थापित है। यहीं एक गुफा में पांच सौ वर्ष पुराने शिवलिंग की पूजा की जाती है। चट्टान की प्राकृतिक सुंदरता को मध्य गुफा से बाहर यहाँ शिवरात्रि पर मेला भरता है।

बूंदी से 15 कि.मी. दूर भीमलत नामक सुंदर झरना अद्वितीय है। बताया जाता है बनवास के दौरान पाण्डव यहाँ आये थे। इस स्थल पर बना शिव मंदिर पूज्य है। बरसात के दिनों में इन दोनों जलप्रपातों पर सैलानियों का जमघट लगा रहता है।

फूल सागर
बूंदी शहर के उत्तर पश्चिम में करीब 5 कि.मी. दूरी पर फूलसागर दर्शनीय स्थल है। इसके किनारे एक बड़ा पानी का कुण्ड, मध्य में छतरी तथा दो छोटे महल बने है। इस सागर का निर्माण राजा भोज सिंह की उप रानी फूललता द्वारा 17 वीं सदी के पूर्वाद्ध में कराने से उनके नाम पर फूल सागर रख दिया गया। महल रायल परिवार की निजी सम्पत्ति है। सरोवर निर्माण के 70 साल बाद उद्यान एवं झरना बनाया गया।

केशरबाग
बूंदी से करीब साढ़े चार कि.मी. दूर शिकार बुर्ज के समीप ऊँची दिवारों से घिरी 66 छतरियां (जो राजाओं, रानियों, राजकुमारों की समाधि स्वरूप बनाई गई) स्थान को केशरबाग कहा जाता है। इनमें कतिपय छतरियां अपनी स्थापत्य एवं मूर्ति शिल्प कला में अद्वितीय हैं। सबसे पुरानी छतरी राव सुरजन के पुत्र महाराज कुमार दूधा की है। वह 1581 ई. में मुगलों से युद्ध करता हुआ मारा गया था। आखरी छतरी महाराव विष्णु सिंह की है जिसकी 1821 ई. में मृत्यु हो गई थी। यह स्थल उपेक्षित स्थिती में है।

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चौरासी खंबो की छतरी
बूंदी के पर्यटक स्थलों में चौरासी खम्बों की छतरी स्मारक दर्शनीय है। बूंदी में ही देवपुरा के समीप स्थित कलात्मक छतरी का निर्माण1684 ईस्वीं में धाबाई देवा की समृति में करवाया गया था। देवा राव राजा अनिरुद्ध Çसह का धाबाई था। तीन मंजि़ल की छतरी चौरासी ख़बो पर बनी है एवम् स्थापत्य कला दर्शनीय है।

केशवराय पाटन
धार्मिक पर्यटन स्थल की छंटा चम्बल नदी के उत्तरी किनारे होने से लुभावनी है। यह स्थल जिला मुख्यालय बूंदी से 38 कि.मी. है परन्तु कोटा से 20 कि.मी. है। सदानीरा चम्बल नदी के किनारे बून्दी जिले के केशवराय पाटन कस्बे में स्थित केशवराय (भगवान विष्णु) को समर्पित मंदिर न केवल हाड़ौती क्षेत्र वरन् राजस्थान में विख्यात है। यह मंदिर एक ऊंची जगती पर स्थित है तथा कला−शिल्प का बेहतरीन नमूना है। करीब 60 फीट ऊंचा शिखरबंद इस मंदिर के चारों ओर देवी−देवताओं, अप्सराओं, पशु−पक्षियों आदि की सुंदर प्रतिमाएं बनाई गई हैं। मंदिर में कुछ सीढि़यां चढ़कर सभागृह (अंतराल) कारीगरीपूर्ण खंभों पर स्थित है। सभागृह से गर्भगृह जुड़ा है, जहां एक चबूतरे पर केशवराय जी की खड़ी मुद्रा में प्रतिमा विराजित है। प्रतिमा की सुंदरता और कारीगरी देखते ही बनती है। मंदिर के सामने ऊंचाई लिए एक जगती पर गरूड़ जी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में महत्वपूर्ण मृत्युंजय महादेव का मंदिर भी दर्शनीय है।

केशवराय जी का यह मंदिर अत्यन्त प्राचीन बताया जाता है। इस क्षेत्र को किसी समय जम्बू मार्ग और कस्बे को रंतिदेव पाटन कहा जाता था। बताया जाता है कि यहां चम्बल के तट पर रंतिदेव ने तपस्या की थी। यहां सती स्मारक के शिलालेख से मंदिर के बारे में इसके प्राचीन होने की जानकारी मिलती है। कहा जाता है कि परशुराम ने जम्बू मार्गेश्वर अथवा केशवेश्वर मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर का पुनरू निर्माण राव राजा छत्रसाल के समय किया गया। सम्पूर्ण मंदिर परिसर एक किलेनुमा रचना की तरह दूर से नजर आता है। यहां एक मुक्त आकाशीय स्टेडियम भी बनाया गया है। यह मंदिर विशेष रूप से हाड़ौती क्षेत्र के श्रद्धालुओं का प्रमुख आस्था स्थल है। केशवराय जी के मंदिर पर यूं तो वर्षभर दर्शनार्थी आते हैं, परंतु कार्तिक पूर्णिमा के अवसर यहां श्रद्धालु चम्बल में स्थान कर दर्शन करते हैं। इस अवसर पर एक बड़े मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें पर्यटन विभाग भी अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाता है।

मुनिसुव्रतनाथ जैन मंदिर
श्री मुनि सुव्रतनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, केशवरायपाटन, जिला बून्दी में जिला मुख्यालय से 38 किमी पर स्थित चम्बल नदी के किनारे स्थित है। केशवराय पाटन अतिशय क्षेत्र प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ भी है। यहां मंदिर के तलघर में भगवान मुनि सुव्रतनाथ की प्रतिमा पदमासन मुद्रा में स्थापित की गई है। यह प्रतिमा गहरे हरे पाषाण से निर्मित है तथा इसकी ऊंचाई 4.5 फीट है। यह तलघर 16 कारीगरी पूर्ण स्तम्भों पर बना है तथा मूल वेदी पर शिखर बनाया गया है। यहीं पर 13वीं शताब्दी की 6 अन्य प्रतिमाएं भी स्थापित की गई हैं। इनमें भगवान पदमप्रभु की सुंदर प्रतिमा भी है।

कहा जाता है कि मोहम्मद गौरी ने इस मंदिर को भी तोडऩे का प्रयास किया तथा जब प्रतिमा के पैरों पर हथौड़ी व छैनी से प्रहार किया गया तो दूध की धारा बह निकली। इससे वे वापस लौटने को मजबूर हो गए। बहती हुई चम्बल नदी का प्राकृतिक दृश्य मंदिर से अत्यन्त मनोरम प्रतीत होता है। श्री मुनी सुव्रतनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र प्रबंधन समिति द्वारा यहां की व्यवस्थाओं का संचालन किया जाता है। यहां धर्मशाला में ठहरने व भोजन की व्यवस्था है। यह क्षेत्र कोटा से रंगपुर होते हुए नदी र्माग से 10 किमी तथा सड़क र्माग से 20 किमी है।

बीजासन माता जी, इन्द्रगढ़ (70 कि.मी.)
राजस्थान में देवी माँ के अनेक मंदिरों में इन्द्रगढ़ में पर्वत के शिखर पर विराजित बीजासन माता का पूरे हाड़ौती क्षेत्र में धार्मिक दृष्टि से अपना विशेष स्थान है। बीजासन माता जनमानस में लोकप्रिय है। बीजासन माता के करीब 2000 साल प्राचीन मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 1003 में देवी दुर्गा भक्त कमलनाथ द्वारा करवाया गया था। गर्भगृह में बीजासन माता दानव रक्तबीज की मूर्ति पर बैठी नजर आती है। दुर्गा सप्तसती के अनुसार दुर्गा अपना आकार बढ़ाकर दानव रक्तबीज के विरूद्ध संघर्ष किया था। दानव को वरदान मिला था कि उसके शरीर से गिरी हर बून्द से एक रक्तबीज बन जायेगा। देवी ने रक्तबीज राक्षसों का रक्त पृथ्वी पर नहीं गिरने का फैसला लिया। उसने जलती मशालों से या ता घावों का जला दिया या रक्त की बून्दों को एक कटोरी में एकत्रित कर पी लिया और उसने दानव पर काबू पाया। इसलिए देवी को बीजासन माता का नाम दिया गया। वे तब से इस पर्वत पर पूजनीय है।

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पहाड़ी पर स्थल तक पहुंचने के लिए 750 सीढि़यों का रास्ता पार करना होता है। देवी की मूर्ति पत्थर में खुदाई कर बनाई गई है। मंदिर नागर वास्तुशैली में तथा चौकोर आकार में निर्मित है। मंदिर के दक्षिण में एक रसोई बनी है। मंदिर प्रातरू 5 बजे से सायं 7 बजे तक दर्शनार्थियों के खुला रहता है। यहां दुर्गा पूजा विस्तार से की जाती है तथा सप्तसती का पाठ होता है। दिन में चार बार मंगला, भोग, संध्या एवं शयन आरती की जाती है। नव विवाहित जोड़ों को जात दिलवाने, पुत्र जन्म, बच्चों के उपनयन संस्कार तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर लोग देवी को शीश नवाने आते हैं। बैसाख शुक्ला पूर्णिमा विशेषकर आश्विन तथा चैत्र के नवरात्रा अवसर पर यहां भक्तों का भारी जमावड़ा रहता है और मेले जैसा दृश्य उपस्थित होकर सारा वातावरण धार्मिक हो जाता है। इन्द्रगढ़ तहसील मुख्यालय होने के साथ ऐतिहासिक महत्व का कस्बा है। कोटा−दिल्ली रेलमार्ग पर इन्द्रगढ़ स्टेशन आता है, यहां से पश्चिम दिशा में इन्द्रगढ़ कस्बा स्थित है जिसकी पहाड़ी पर स्थित बीजासन माता का मंदिर दूर से ही नजर आता है। इन्द्रगढ़ में एक दुर्ग भी बना है, जिसे 1662 वि.सं. में राजा इन्द्रसाल सिंह ने बनवाया था। गढ़ के महलों में भित्ति चित्र बने हैं। यहां बिहारी जी का मंदिर, जालेश्वर मंदिर, चन्द्र बिहारी मंदिर, राईजी की बावड़ी, एवं बड़ा जैन मंदिर भी दर्शनीय हैं।

कमलेश्वर महादेव (90 कि.मी.)
बून्दी से करीब 90 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक इन्द्रगढ़ कस्बे के समीप कमलेश्वर (क्वांलजी) का प्राचीन शिवमंदिर दर्शनीय है। मंदिर एक जगती पर 40 फीट ऊंचा है। मंदिर के अन्दर और शिखर पर मूर्तियां खुदी हैं। शिखर का आकार पिरामिड की तरह है जो ऊपर की ओर गोलाकार हो जाता है। मंदिर में लाल रंग के पत्थर का शिवलिंग विराजित है। जिसके सामने एक नंदी प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर में दैनिक पूजा और अनुष्ठान पूजा नाथ पंथ के नागा साधुओं द्वारा की जाती है। पश्चिम की दिशा में एक ओर मंदिर बना है।

मंदिर का निर्माण सातवीं एवं नवमी सदी के मध्य का माना जाता है। बताया जाता है कि पाण्डवों ने यहां अज्ञातवास बिताया था और उन्होंने ही इस मंदिर का निर्माण कराया। आगे चलकर बून्दी के राजा जैतसिंह ने 1345 ईस्वी में इसकी मरम्मत व पुनर्निमाण कराया। यहां दो पवित्र कुण्ड भी बने हैं। मान्यता है कि इन कुण्डों में स्नान करने से चर्म व कुष्ठ रोग दूर हो जाते हैं। यह मंदिर दर्शनों के लिए प्रातः 5 बजे सायं 8.30 बजे तक खुला रहता है। यहां महाशिवरात्रि मुख्य पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर महाशिवरात्रि का मेला भी भरता है। इसके अतिरिक्त कार्तिक पूर्णिमा, बसन्त पंचमी, गुरूपूर्णिमा एंव नवरात्रा पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।

परिंदों का स्वर्ग
बूंदी जिला आज प्रवासी व स्थानीय पक्षियों की पसंदीदा सैरगाह के रूप में प्रसिद्ध रहा है! अरावली की पर्वत श्रृंखलाएं बूंदी को और भी मनोरम बनाती है । वन एवं वन्य जीवों से बूंदी समृद्ध व इनके लिए प्रसिद्ध है! नैसर्गिक सुषमा से समृद्ध इस अंचल में जलाशयों के तटों व वृक्षों पर विचरण करते देशी विदेशी पक्षी और सघन वनाच्छादित क्षेत्रों में उन्मुक्त घूमते वन्यजीवों से बूंदी जिले की अपनी अलग ही पहचान बनती है। बूंदी जिले में रणथंभौर बाघ परियोजना, मुकुंदरा टाइगर रिजर्व, रामगढ़ विषधारी अभ्यारण, चंबल घडि़याल अभ्यारण व जवाहर सागर अभ्यारण का भाग सम्मिलति है । जिले में वर्तमान में 1542.42 वर्ग किलोमीटर वन भूमि है जो कि जिले के भौगोलिक क्षेत्रफल का 26.70 प्रतिशत है।

जिला मुख्यालय बूंदी सहित जिले के 9 विभिन्न जलाशयों में शीतकाल के आरंभ होते ही देश−विदेश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं। इस दौरान इन जलाशयों में विचरते पक्षियों की चहचाहट यहां की आबोहवा में जीवंतता पैदा करती है। बूंदी जिले में मुख्य रूप से 9 बर्ड वाचिंग प्वाइंट है।

जेत सागर, अभय पुरा बांध, बरधा बांध, गुढा बांध, इंद्राणी बांध, कनक सागर बांध, नारायणपुर बांध, राम सागर बांध एवम रतन सागर झील जलाशयों के साथ ही चंबल में जलभराव क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पक्षियों को विचरण करते हुए देखा जा सकता है!

इन जलाशयों में बार हेडेड गीज, कॉमन टील, पेलिकन, नार्दन पिनटेल, इंडियन स्कीमर, रिवर टर्न, पर्पल हेरोन ,पोण्ड हेरोन, कोम्ब डक, पेंटेड स्टोर्क, वूली नेकेड स्टार्क, डार्टर कॉरमाण्ट, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, नॉर्दन शावलेवर, स्पॉट बिल डक एवम अन्य विभिन्न प्रजाति के एग्रेट्स भी दिखाई देते हैं। स्थानीय पक्षियों में कबूतर, तोता, मोर पक्षी, सारस क्रेन आदि दिखाई देते हैं।

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