जानिए सूर्य नमस्कार के 12 चरण और उनके लाभ

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नई दिल्ली। सूर्य नमस्कार के अभ्यास से बुध्दि, धैर्य, शौर्य और बल की प्राप्ति होती है तथा मानिसक एकाग्रता, आत्मविास एवं मेघा भी बढ़ती है । यह संजीवनी की तरह दिव्य औषधि है जो मनुष्य के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाती है। उत्साह व स्फूर्ति उत्पन्न करते हुए उसकी कार्यक्षमताओं में वृद्धि करती है। सूर्य नमस्कार के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि यह मन व शरीर को ऊर्जान्वित कर तरो ताजा कर देता है और दिनभर के कामों के लिए तैयार कर देता है। यदि यह दोपहर में किया जाता है तो यह शरीर को तत्काल ऊर्जा से भर देता है, वहीं शाम को करने पर तनाव को कम करने में मदद करता है। यदि सूर्य नमस्कार तेज गति के साथ किया जाए तो बहुत अच्छा व्यायाम साबित हो सकता है और वजन कम करने में मदद कर सकता है।

सूर्य नमस्कार करने की विधि

पण्राम आसन
अपने आसन (मैट) के किनारे पर खड़े हो जाएं, अपने दोनों पंजे एक साथ जोड़ कर रखें और पूरा वजन दोनों पैरों पर समान रूप से डालें। अपनी छाती फुलाएं और कंधे ढीले रखें। श्वास लेते हुए दोनों हाथ बगल से ऊपर उठाएं और श्वास छोड़ते हुए हथेलियों को जोड़ते हुए छाती के सामने पण्राम मुद्रा में ले आएं।

हस्तपाद आसन
दश्वास छोड़ते हुए व रीढ़ की हड्डी सीधी रखते हुए कमर से आगे झुकें। पूरी तरह श्वास छोड़ते हुए दोनों हाथों को पंजो के समीप जमीन पर रखें।

अश्व संचालन आसन
दश्वास लेते हुए जितना संभव हो दाहिना पैर पीछे ले जाएं, दाहिने घुटने को जमीन पर रख सकते हैं, दृष्टि को ऊपर की ओर ले जाएं।

अष्टांग नमस्कार
आराम से दोनों घुटने जमीन पर लाएं और श्वास छोडें़। अपने कूल्हों को पीछे उपर की ओर उठाएं। पूरे शरीर को आगे की ओर खिसकाएं। अपनी छाती और ठुड्डी को जमीन से छुएं। अपने कुल्हों को थोड़ा उठा कर ही रखें अब दो हाथ, दो पैर, दो घुटने, छाती और ठुड्डी (शरीर के आठ अंग) ज़मीन को छूते हुए होंगे।

भुजंग आसन

आगे की ओर सरकते हुए, भुजंगासन में छाती को उठाएं कुहनियां मुड़ी रह सकती हैं। कंधे कानों से दूर और दृष्टि ऊपर की ओर रखें।

पर्वत आसन
श्वास छोड़ते हुए कूल्हों और रीढ़ की हड्डी के निचले भाग को ऊपर उठाएं, छाती को नीचे झुकाकर एक उल्टे वी (ट्ट) के आकार में आ जाएं।

पृवी पर सूर्य के बिना जीवन संभव नहीं है। सूर्य नमस्कार, सूर्य के प्रति सम्मान व आभार प्रकट करने की एक प्राचीन विधि है, जो कि पृवी पर जीवन के सभी रूपों का स्रेत है।

अश्वसंचालन आसन

श्वास लेते हुए दाहिना पैर दोनों हाथों के बीच ले जाएं, बाएं घुटने को जमीन पर रख सकते हैं। दृष्टि ऊपर की ओर रखें।

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