राहुल गांधी को चुनाव परिणाम आने से पूर्व ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार करे घोषित

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किंग मेकर बनने की बजाय अपने प्रदेश के विकास ओर जनता के हित में क्षेत्रीय दल

अपने देश में लोकसभा सदस्यों के कम साथ होने के बावजूद विपक्षी दलो के सहयोग से चंद्र शेखर एचडी देव गौड़ा, चौधरी चरण सिंह आदि कई प्रधानमंत्री बने और उन्होने सरकार भी अच्छी प्रकार से चलायी इसलिए राजनीति में कब क्या जाये कौन किसका दोस्त और दुश्मन बन जाये कब जमीन से आदमी आर्श पर पहुंच जाये और आसमान से जमीन पर पहुंच जाये कहा नही जा सकता।
देश में ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते है की जनप्रतिनिधियों के लिए निधारित पदों पर अकेला व्यक्ति भी अपनी होशियारी और समझदारी तथा निर्णय लेने की ताकत के दम पर महत्वपूर्ण पद सम्भालते रहे है।
मगर 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव में क्षेत्रीय दलों द्वारा जो अभी से बयान बाजी की जा रही है उसका फायदा तो शायद उन्हे पूरा ना मिल पाये मगर नुकसान होना अनिवार्य सा लगता है कहा भी जाता है की एक चुप सौ को हराये लेकिन यहां तो नेता जी है की राष्ट्रीय दलों, भाजपा और कांग्रेस आदि के नेताओ को सरकार बनाने को लेकर कुछ भी कहने से नही चुक रहे है। जबकी यह किसी से छुपा नही है की सबसे ज्यादा सांसद इन्ही दलों के चुनकर आने है। लेकिन हां यह जरूर है की अगर पूरे देश के क्षेत्रीय दल आपस मे मिल जाये तो उनके सांसदों की संख्या ज्यादा हो सकती है लेकिन यहां भी एक पेंच फंसता है की जो क्षेत्रीय दल कांग्रेस ओर भाजपा से मिलकर चुनाव लड़ रहे है या पूर्व में उनके साथी बने रहे है वो शायद इन दलो का साथ छोड़कर क्षेत्रीय दलों की नेताओं की हां में हां नही मिलायेगे।
मेरा मानना है की सभी क्षेत्रीय दल अपनी अपनी पंसद की पार्टीयों, कांग्रेस और भाजपा की सरकार बनवाने और उनके नेताओं का प्रधानमंत्री बनने का रास्ता तलाश करे तो उनके लिए वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर कहा जा सकता है की अच्छा है क्योकि ऐसी परिस्थितियों में कभी कभी ज्यादा समर्थन वाले अपने इरादों की कुर्बानी देकर अपने सहयोगियों का समर्थन भी कर देते है।
लेकिन जो दल अभी से किंग मेकर बनने की सोच रहे है मुझे लगता है की वो भूल कर रहे है क्योकि किसी बुद्धि जीवी ने कहा है की पढ़े लिखे सब लोग जिनकी विचार धाराएं अलग हो वो ज्यादा समय तक एक साथ नही टीक सकते ऐसे में प्रधानमंत्री चुनाव के अंतिम समय तक यह सब एक रह पायेगे ऐसा भी सम्भव नही लगता है।
होने को तो कुछ भी हो लेकिन टीआरएस गफलत में नजर आते है की वो संघीय मोर्चा बनायेगे और कांग्रेस या भाजपा उन्हे या उनके किसी पसंद के नेता को समर्थन देकर प्रधानमंत्री बना देगी तो उनका फायदा है।
वो अपने प्रदेश के हित की कुछ मांगों को मनवाने का वायदा लेकर केन्द्र सरकार बनाने के मामले में राहुल गांधी को ड्राईवर की सीट सौंप दें।
मेरा मानना है की मुनेत्र कषगम द्रमुक अध्यक्ष एम के स्टालिन के विचारो ओर भावनाओं को महत्व देते हुए 23 मई को लोकसभा चुनाव के परिणाम आने से पूर्व ही कांग्रेस और राहुल गांधी के प्रति नरम रूख अपनाने वाले राजनीतिक क्षेत्रीय दलों को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार राहुल गांधी को घोषित करना चाहिए क्योकि उनके प्रदेशों के जो हित बीते 5 साल में पूरे नही हो पाये वो भविश्य में पूरे हो सकते है।
– रवि कुमार बिश्नोई
संस्थापक – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समाज सेवी संगठन आरकेबी फांउडेशन के संस्थापक
सम्पादक दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
आनलाईन न्यूज चैनल ताजाखबर.काॅम, मेरठरिपोर्ट.काॅम

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