तीन जजों की टीम करेगी आरोपों की जांच, पुरूषों को ऐसे झूठे मामलों में प्रताड़ना से बचाने के लिए गठित हो जिला स्तर पर कमेटियां

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यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ के आरोपों पर कार्यवाही?
कुछ तो मीडिया की सुर्खियों में ऐसी घटनाओं को मिलने वाले स्थान ओर कुछ सरकार द्वारा इस संदर्भ में अब तक बनाये गये और बनाये जा रहे नियमों तथा कुछ मी टू जैसे अभियानों और बिना किसी जांच पड़ताल या सोचे समझे की आरोप सही होगे या गलत पुरूषों को दोषी ठहरा देने और फिर एक तरफा छेड़छाड़ अथवा ऐसे ही अन्य आरोपों में कार्यवाही कर दिये जाने का परिणाम अब यह हो गया है की रोज ही समाचार पत्रों की छेड़छाड़ दुष्कर्म जैसी खबरें मुख्य सुर्खियां बनने लगी है। मै यह तो नही कहता की सब झूठ होगी या मनघडंत अथवा प्रयोजित लेकिन ऐसे मामलों में आरोप लगने के जो परिणाम सामने आ रहे है वो कई परिवारों को बर्बाद करने और कितनी ही जिदंगियों को अकाल मौत का कारण भी बनने लगे है और क्योकि अभी तक कही भी ऐसे मामलों की सुनवाई आरोपी के पक्ष में नही होती थी और उसे हीन भावना से देख जाने और एक प्रकार से समाज से बहिष्कृत किये जाने की खबरें अनेको मौकों पर सुनने को मिलती थी और सही कहुं तो सरकार महिलाओं को बराबर का दर्जा दे रही है हमारे समाज में भी मातृ शक्ति का बड़ा पूजनीय स्थान है ओर महिला पुरूष के विभिन्न रिश्तों में जो प्यार और अपनेपन की गरिमा होती है उसका आसानी से बखान भी शब्दों में किया जाना सम्भव नही है।

लेकिन सबकुछ होते हुए भी अब जब कही भी महिलाओं से बात करने का मौका होता है या उनके साथ काम करने का हमेशा एक डर सा बना रहता है की कही कोई साथी आरोप ना लगा दें।

मगर अब सुप्रीम कोर्ट में जूनियर सहायक रही एक महिला द्वारा 19 अप्रैल 2019 को शीर्ष अदालत के 22 जजों को हल्फनामा भेजकर मुख्य न्यायाधीश जी पर जोे आरोप लगाये गये और उसके बाद साॅलिसीटर जनरल तुषार मेहता के हवाले से छपीं खबर की यह ब्लैकमेल की नई तकनीकी है। तथा कोर्ट के महासचिव कार्यालय ने जो जवाब दिया की सबंधित आरोप जो लगाये गये है दुर्भावना पूर्ण निराधार और पूर्ण रू‎प से झूठे है उन्हे नकारा जाता है।

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तथा इसके साथ ही बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार का कथन की यह सब झूठा गढ़ा हुआ आरोप है हम इस तरह के कृत्यो की निंदा करते है ऐसे कृत्यों को प्रोत्साहित नही किया जाना चाहिए।

और इस मामले में पूर्ण आत्मविश्वास तथा निर्भीक तरिकें से माननीय मुख्य न्यायाधीश जी द्वारा जो निर्णय लिया गया उसके बाद इस प्रकरण में तो मुझे कुछ नही कहना लेकिन उससे अब यह बात स्पष्ट होकर सामने आ रही है की ऐसे आरोप झूठे और प्रायोजित भी हो सकते है और यह बात इस प्रकार के आरोप लगाये जाने के बाद जो कार्यवाही करने वाली संस्थाएं है उनकी समझ में भी शायद आने लगेगी और भविष्य में आम आदमी को भी ऐसे प्रकरणों में जहां तक मुझे लगता है न्याय मिलने लगेगा और जांच से पहले शायद कोई कार्यवाही नही हुआ करेगी।

मेरा मानना है की समाचार पोर्टल चाहे किसी के भी हो ओर किसी भी माध्यम से उनका संचालन हो रहा हो मगर ऐसी खबर पूर्ण जांच के बाद ही उन्हे प्रकाशन की सोचना चाहिए मीडिया रिपोटिंग पर रोक ना लगाना माननीय न्यायालय की रचनात्मक सोच का संकेत है।

सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की दो शीर्ष संस्थाओं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) तथा सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट आॅन रिकार्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) द्वारा इस प्रकरण में फुल बंेच से आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया है।

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मेरा भी कुछ ऐसा ही मानना है की जब ऐसे आरोप देश में किसी भी व्यक्ति पर लगाये जाये और उसके पुख्ता सबूत मौजूद ना हो या रंगे हाथों व्यक्ति ना पकड़ा जाये तब तक आरोपों की जांच से पहले ना तो कानुनी कार्यवाही हो और ना ही विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्ति के खिलाफ समाज में अपनी छवीं बनाने के लिए कुछ लोगो द्वारा जो निर्णय लिये जाते है आरोपी के खिलाफ उन पर रोक लगायी जाये।

बताते चले की पूर्व में विभिन्न अदालतों में इस प्रकार के अनेक आरोप असत्य और प्रायोजित पाये जा चुके है और ऐसे मामलों में आरोपी को मानसिक और समाजिक रूप से जो प्रताड़ना झेलनी पड़ी और समाज मे उसकी छवीं खराब हुई वो वापस नही आ सकती। इस बात को ध्यान में रखते हुए केन्द्र और प्रदेशो की सरकारे और कानून व गृह मंत्रालय केन्द्र व प्रदेशों सहित देश के हर जिले में एक 5 सदस्य कमेटी गठित करे जिसमें पुलिस प्रशासन, अधिवक्ता, समाजसेवी व एक पत्रकार हर स्तर की कमेटी में शामिल हो और ऐसे आरोपों की जब तो वो हर दृष्टिकोण से जांचकर अपनी रिपोर्ट ना दे दे तब तक मेरे को लगता है की आरोपी को दोषी मानकर ना तो समाजको ही कोई कार्यवाही करनी चाहिए और ना ही सरकार को। हां अगर आरोपी का चरित्र ओर गतिविधियां सदिग्ध हो तो उस पर नजर रखने के साथ साथ उसे कुछ नियमों में प्रतिबंधित जरूर किया जा सकता है लेकिन सामुहिक रूप से आरोप लगते ही पुरूष को दोषी मान लेना किसी भी रूप में मै समझता हुं उचित नही है। इसलिए ऐसे प्रकरणों के निस्तारण के लिए नियम कानुन बने है उनमें यह नियम भी शामिल किया जाये की अगर लगाया गया आरोप असत्य, मनघडंत अथवा प्रायोजित निकले तो आरोप लगाने वाली महिला के खिलाफ भी उसी दृष्टिकोण से कार्यवाही की जाये। जिससे पुरूष के खिलाफ की जाती है।

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मेरे कहने का आश्रय सिर्फ यह है की किसी भी गलत आरोप और उसे लगाने वाले को संरक्षण नही दिया जाना चाहिए सम्मान से जीने का अधिकार जब लोकतंत्र में सबकों है तो एक मात्र पुरूष ही झुठे आरोपो की प्रताड़ना का शिकार क्यो बने।
मुझे लगता है की ऐसे मामलों मे बिना सत्यता पता करे मीडिया की सुर्खियों में आने और नाम कमाने के चक्कर में जो कुछ संस्थाएं औरउनके पदाधिकारी हंगामा करते है उस पर भी रोक लगायी जाये क्योकि इनकी वजह से एक तो कानून व्यवस्था प्रभावित होती है और सड़को पर लगने वाले जाम से समय और काम दोनो खराब होते है तथा जिस व्यक्ति पर आरोप लगते है वो पहले सही परेशान होता है इन धरने प्रदर्शनों से डिप्रेशन में भी चला जाता है और यह स्थिति बिल्कुल भी समाज हित में नही कही जा सकती है। रही बात चीफ जस्टिस प्रकरण की तो जस्टिस एसए बोबडे को इन हाउस इनक्वारी के लिए नियुक्त किया गया है। उनके साथ जस्टिस एनवी रमन्ना व जस्टिस इंद्रा बनर्जी भी इसमें शामिल है जांच के लिए।

– रवि कुमार बिश्नोई
संस्थापक – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समाज सेवी संगठन आरकेबी फांउडेशन के संस्थापक
सम्पादक दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
आनलाईन न्यूज चैनल ताजाखबर.काॅम, मेरठरिपोर्ट.काॅम

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