सेल्फी के दौर में ब्लैक इन व्हाइट फोटोग्राफ कौन क्लिक करता है

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बॉलीवुड में आर्ट फिल्मों का दौर चल रहा है जहा एक तरफ भरपूर Action, Comedy, Love Story से जुड़ी फिल्में आती है तो दूसरी तरफ आर्ट फिल्में समाज की सच्चाई का आइना होती हैं। इरफान खान के साथ फिल्म निर्देशक रितेश बत्रा ने फिल्म लंच बॉक्स बनाई थी जिसके बाद उनसे और बेहतर फिल्मों की उम्मीद होने लगी। क्योंकि जो लोग आर्ट फिल्में देखते हैं उनको फिल्म लंचबॉक्स अच्छी लगी थी, क्रिटिक्स ने भी तरीफ की थी। इस बार निर्देशक रितेश बत्रा फिल्म फोटोग्राफ लेकर आये है-

फिल्म फोटोग्राफ की कहानी-

फिल्म की कहानी तीन लोगों के बीच की है फिल्म में रफीक (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के आसपास लोगों की फोटो खींचकर अपना घर चलाता है। दूसरे अहम किरदार में मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) है। मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) मुंबई में सीए की पढ़ाई कर रही हैं। लेकिन वो शुरू से एक्ट्रेस बनना चाहती थी। मां-बाप के दबाव में वो पढ़ाई करने लगी। अधूरे सपने और अधूरेपन को लेकर मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) की मुलाकात रफीक (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) से होती है। दोनों के बीच की मुलाकात पर और उनके बीच होने वाली तार्किक बाते काफी दिलचस्प है। ये सिलसिला चलता रहता है आगे तक लेकिन एक दिन रफीक (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) की दादी (फारूख जफर) की एंट्री होती है। दादी का तीसरा अहम रोल है। दादी के आने के बाद फिल्म में नया मोड़ आता है। रफीक उन्हें मिलोनी की फोटो दिखाकर कहता है, लड़की मिल गई है। अब दादी हैं। रफीक है। मिलोनी है। और है एक अनोखा तरह का प्यार, जो कहता है कि प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो। दोनों के बीच प्यार का दीया धीरे धीरे जलता तो है, लेकिन उसकी रोशनी इस प्यार को उजागर करने में थोड़ा समय लेती है। और, सेल्फी के दौर में फोटोग्राफ के लिए समय किसके पास है।

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फोटोग्राफ रिव्यू

निर्देशन
जिस तरह आज सेल्फी का दौर है उसमें फोटोग्राफ की जगह सिमट सी गई है। वही हाल हुआ है निर्देशक रितेश बत्रा की फिल्म फोटोग्राफ का। आर्ट फिल्में देखने वालों के पास सब्र और समझ होनो जरूरी होता हैं लेकिन ये फिल्म काफी उबाउ है। क्योंकि आज फिल्में सबजेक्ट के आधार पर बनती है लेकिन निर्देशक उसे इस ढ़ंग से दर्शकों के सामने पेश करते है ताकि वो उनको आसानी से समझ आ जाये। ऐसे में इस बार निर्देशक रितेश बत्रा फिल्म फोटोग्राफ की थीम और उसकी कहानी दर्शकों को समझाने में नाकाम रहे। फिल्म को काफी उबाऊ बना दिया है।

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कलाकार
फिल्म के किरदारों की बात की जाए तो नवाजुद्दीन सिद्दीकी और सान्या मल्होत्रा फिल्म के अहम किरदार है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ऐसे एक्टर है जो किरदार को पर्दे पर जिंदा कर देता हैं। फिल्म मिंटो और ठाकरे में जो रोल उन्होंने निभाया था वो वाकई यादगार है। लेकिन इस फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी अपने किरदार से इंसाफ करते नजर नहीं आये। शायद उनके सामने उन्हें चुनौती देने के लिए कोई और था नहीं इस लिए उन्होंने किरदार और फिल्म को हल्के में ले लिया। बात सान्या मल्होत्रा की हो तो इस फिल्म से ये साबित हो गया है कि सान्या को एक्टिंग के लिए अभी और क्लास की जरूरत हैं क्योंकि वो अपने रोल में बिलकुल फीट नहीं बैठ रही। फिल्म में ऐसा लग रहा है कि बस सान्या मल्होत्रा कैमरे पर एहसान करती नजर आ रही है।

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म्यूजिक
फिल्म को थोड़ा मनोरंजक बनाने के लिए म्यूजिक में एक्पेरिमेंट करने की कोशिश हुई है। निर्देशक रितेश बत्रा ने पुराने गानो का सहारा लिया है, लेकिन ये गाने यहां फिल्म को सहारा इसलिए नहीं दे पाते क्योंकि न तो नवाजुद्दीन और ना ही सान्या में इन गानों के दौर के कलाकारों सा लार्जर दैन लाइफ आकर्षण है। फिल्म तकनीकी रुप से भी उतनी परफेक्ट नहीं है जितनी कि लंचबॉक्स थी।

फिल्म-फोटोग्राफ

निर्देशक: रितेश बत्रा

कास्ट: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सान्या मल्होत्रा

रेटिंग: 3/5 .

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