ठंड और प्रदूषण से बढ़ रहा एलर्जी खांसी का खतरा, ये हैं लक्षण

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भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के वैज्ञानिकों ने वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने में जुटी एजेंसियों को अपने कामकाज में तेजी लाने की नसीहत देते हुए केंद्रीय स्वास्य मंत्रालय को आगाह किया है कि वायु प्रदूषण में रोकथाम मामले में किसी भी प्रकार से समझौतावादी रूख न अपनाएं। परिषद में अतिरिक्त उप निदेशक डा. एसएन जसवाल ने इंडिया स्टेट लेवल डिसीज र्बडन इनियशिएटिव की ताजा रिपोर्ट के हवाले से कहा कि हर दिन प्रदूषित हवा में सांस लेना भारी धूम्रपान करने जैसा है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि आखिर क्यों शहरी भारत में कई लोगों को लगातार सूखी और परेशान करने वाली खांसी होती है, भले ही उन्हें अस्थमा न हो या उन्होंने कभी धूम्रपान न किया हो। इस मुद्दे पर स्वास्य सचिव प्रीति सुदॉन ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंतण्रबोर्ड (सीपीसीबी) इस मुद्दे पर जल्द ही सभी राज्यों के स्वास्य सचिव के एक आपात बैठक बुलाने की तैयारी कर रहा है। इस मामले में सभी पत्र भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

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सर्दी में एलर्जी ज्यादा: सर्दी के महीनों में एलर्जी जनित खांसी अधिक होती है, जब तापमान में गिरावट के कारण प्रदूषक और एलर्जी कारक तत्व वायुमंडल से हट नहीं पाते हैं, जिससे अस्थमा, एलर्जी राइनाइटिस और अन्य एलर्जी विकार ट्रिगर हो जाते हैं। तापमान और ठंड में अचानक परिवर्तन के चलते, शुष्क हवा भी वायुमार्ग को संकुचित करती है, जिससे कष्टप्रद खांसी शुरु हो जाती है।

विशेषज्ञों की नजर में: पद्मश्री अवार्डी, एचसीएफआई के अध्यक्ष डा. के के अग्रवाल ने कहा, दिल्ली जैसे शहरों में आबादी का अधिकांश हिस्सा ओजोन और नाइट्रोजन डाइअक्साइड जैसी प्रदूषक गैसों के कारण एलर्जी जनित खांसी से परेशान होता रहता है। अन्य कारकों में सड़क और निर्माण स्थलों से उठने वाली धूल, पराग कण, धुआं, नमी, और तापमान में अचानक परिवर्तन शामिल हैं। गले में जलन और खुजली हफ्तों से महीनों तक बनी रह सकती है और यह तीव्रता में भिन्न हो सकती है। मौसमी एलर्जी के कुछ अन्य लक्षणों में नाक बहना, छींकना, आंखों में पानी और खुजली तथा आंखों के नीचे काले घेरे शामिल हैं। ये काले घेरे या एलर्जिक शाइनर्स नाक की गुहाओं में सूजे हुए ऊतकों और आंखों के नीचे रक्त के जमाव के कारण होते हैं। एलर्जी जनित खांसी आमतौर पर रात में तीव्र हो जाती है।

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ये अंग ज्यादा होते हैं प्रभावित: दिल्ली विश्व विद्यालय से संबंद्ध वीपी पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक डा. राजकुमार के अनुसार वायरल और बैक्टीरियल दोनों तरह के संक्रमण, अंतर्निहित स्वास्य स्थितियों जैसे फेफड़े या गुर्दे की बीमारी, दिल की विफलता, फेफड़े की पुरानी प्रतिरोधी बीमारी या अस्थमा वाले लोगों में जटिलताओं का कारण बन सकते हैं। यदि तेज बुखार दो दिन से अधिक समय तक बना रहे तो डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए। कई वायरस के साथ, इसका कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। आपका डाक्टर आपकी हालत की निगरानी करते हुए आपके लक्षणों का प्रबंधन करने के मकसद से दवाएं लिख सकता है। यदि डाक्टर को जीवाणु संक्रमण का संदेह हो, तो वो एंटीबायोटिक्स लिख सकता है। एमएमआर और पटरुसिस वैक्सीन का उपयोग करने से श्वसन संक्रमण होने का खतरा काफी कम हो सकता है। इसके अलावा, सभी को खान पान में स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए।

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सुझाव
*अपने हाथों को बार-बार धोएं, खासकर तब जब आप किसी सार्वजनिक स्थान पर हों।
*हमेशा अपनी शर्ट की बांह में या टिश्यू पेपर में छींकें। हालांकि इससे आपके स्वयं के लक्षण कम नहीं हो सकते, लेकिन यह आपके संक्रामक रोग को फैलने से रोकेगा।
*अपने शारीरिक सिस्टम में कीटाणुओं के प्रवेश को रोकने के लिए अपने चेहरे, खासकर अपनी आंखों और मुंह को छूने से बचें।

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