आंदोलन के लिये क्यों मजबूर है अन्नदाता व करदाता

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देश में व्यापारी ओर किसान दो वर्ग ऐसे हैं जिनसे जुडे लोग सबसे जयादा मेहनत और काम करने के साथ ही किसी की भी सरकार हो उसके संचालन में अपना योगदान पूर्ण ईमानदारी के साथ देते हैं। व्यापारी किसान का माल सही दामों में खरीदकर उसे आगे बेचकर आये धन में कर के रूप में सरकार को काफी पैसा अदा करता है तो किसान रात दिन खेतों में मेहनत कर जो अन्न उगाता है चाहे वो किसी भी रूप में हो उसमे नागरिकों की भूख शांत होती है और वो हर कार्य में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं। मगर यह कितने ताज्जुब की बात है कि उत्पीड़न किसी की भी सरकार रही हो कम या ज्यादा इन दोनों वर्गाें का होता है। वर्तमान समय में कुछ तथा कथित जागरूकों द्वारा कुराली से प्रदूषण फैलने की बात खूब उजागर की जा रही है ओर सरकार भी लिखित गई चार लाईनों को ध्यान में रखकर तमाम तरह के कानून और नियम किसानों पर लाद रही हैं। उनके दस साल पूराने टैक्टर सड़कों पर नहीं चलेंगे। लेकिन पुरानी सरकारी गाड़ियां अथवा पैसे वालों के वाहन सडकों पर जहरीला धुंआ छोड़ते टैंपू घूमते रहेंगे ना आरटीओ ध्यान देगा ना पुलिस।
मगर किसान के खिलाफ सब एक जुट होकर कार्यवाही करने लगते हैं शायद इसी का परिणाम है कि यूपी के मुजफ्फनगर में किसानों ने सरकारी वाहन और कई रेलों के इंजनों पर कब्जा किया। तो आज अपनी मांगों के समर्थनों में 207 किसान संगठनों के सदस्यों ने रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक मार्च किया। इनकी मांगें कितनी सक्षम होंगी कितनी नहीं यह तो एक अलग बात है।
लेकिन जिस प्रकार नेशनल साउथ इंडियन रीवल इंटरलिंकिंग एग्रीकल्चर एसोसिएशन के करीब 1200 सदस्य जो अभी तक खुदकुशी कर चुके है। उनमे से दो साथियों के कंकाल लेकर दिल्ली पहुंचे और यह धमकी देने के लिये इन्हे मजबूर होना पड़ा कि अगर संसद मार्ग तक जाने से रोका गया तो नंगन होकर प्रदर्शन करंेंगे।
मुजफ्फनगर प्रदर्शन में भाकियू नेता धर्मेंद्र मलिक के नेतृत्व में प्रदर्शन हो रहा है तो दिल्ली में आयोजित किसान आंदोलन में भाकियू शामिल नहीं बताई गई मगर अनेको स्थानों से चलकर किसान रामलीला मैदान पहुंचे और मार्च में शामिल हुए।

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मैं हमेशा हर प्रकार से सरकार द्वारा लागू किये गए नियमों और शांति बनाए रखने का पक्षधर रा हूं। और मुझे लगता है कि देश और विकास के हित में किसी को भी किसी भी प्रकार की हिंसा की कार्रवाई में भाग नहीं लेना चाहिये। और न ही किसी को करनी देनी चाहिये। और कहीं अगर ऐसा होता मिले तो अच्छे नागरिक की भांति उसे रोकने का प्रयास किया जाए मगर मुझे लगता है कि बात भले ही सरकार किसान और व्यापारी की कितनी ही कर लें मगर सही मायनों में उसकी समस्याओं के समाधान की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

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परिणाम स्वरूप उत्पादन का सही दाम न मिलने और किसान के बेटों को नए नए रोजगार के साधन उपलब्ध न कराए जाने के परिणाम स्वरूप बढ रहा असंतोष ही शायद इन आंदोलन और प्रदर्शनों का मुख्य कारण कहा जा सकता है। एनजीटी प्रदूषण रोकने के लिये सख्त कदम उठा रही है यह अच्छी बात है। लेकिन ग्रामीण कहावत अगर कोई काम पूर्ण रूप से कहना है तो पहले उसकी शुरूआत राजा द्वारा की जाए े और फिर जनता से कहा जाए तो वो काम हो जाता है और नियम भी लागू होते हैं
मगर यहां जैसा किसानों का आरोप है सरकारी वाहन और टैंपू प्रदूषण फैलाते घूम रहे हैं उनके खिलाफ तो कोई कार्रवाई की नहीं जा रही । मगर किसान और आम आदमी को इस नाम पर परेशान किया जा रहा है। जो पूरी तौर पर गलत है इस व्यवस्था में सुधार करने के साथ साथ अनदाता किसान और टैक्स देकर सरकार को प्रगति की ओर ले जाने वाले व्यापारी की जायज मांगों को सरकार द्वारा तुरंत माना जाना चाहिये। क्योंकि एक तो अगर यह दोनों खुशहाल नहीं है तो कोई भी खुश नहीं रह सकता।

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दूसरी तरफ ऐसा न होने से जो आंदोलन धरना प्रदर्शन हो रहे हैं उनसे देश का विकास प्रभावित हो रहा है। और कानून व्यवस्था भी लचर हो सकती है जाम लगने से और भी प्रदूषण फैल सकता है। इसलिये किसान और व्यापारी की मांगें सरकार को तुरंत माननी चाहिये जनहित में।

– रवि कुमार बिश्नोई
संस्थापक – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समाज सेवी संगठन आरकेबी फांउडेशन के संस्थापक
सम्पादक दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
आॅनलाईन न्यूज चैनल ताजाखबर.काॅम, मेरठरिपोर्ट.काॅम

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