भगवान राम और महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी की भांति ऐसे कार्य करे कि हमें भी याद करें समाज

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अपनों के साथ मिलकर मनाए दीपावली

हर दुख भूल हम जिस स्थिति में भी है उसी में खुशियों और उत्साह के साथ दिपावली मनाने और अपनों चाहे वो कोई भी कोई भी हो उस की हर तरह से मदद करने का त्यौहार है। दीपों की जगमग रोशनी से युक्त दिपावली भगवान राम द्वारा रावण का वध कर उस पर विजय प्राप्त करने के उपरांत अयोध्या लौटने पर प्रज्जवलित किये गए दीप और मनायी गई खुशियों को दिपावली के रूप में ही वर्तमान में हम मनाते हैं ऐसा बताया जाता है। गरीब अमीर के समान रूप से अपना त्यौहार समझे जानेे वाला यह पर्व अब पिछले कुछ दशकों से शान शौकत और पैसे की चमक धमक दिखाने का माध्यम भी बन गया है। घरों पर रोशनी भी की जाए पटाखे भी छोड़े जाए लेकिन उन्हे अपने पड़ोसी को यह दिखाने का माध्यम ना बनाया जाए कि हम कितने समर्थ हैं। और तुम कितने असहाय। अगर हम दीपों से झिलमिलाते इस अनुकरणीय पर्व को भाईचारे आपसी सदभाव और प्रेम की भावना के साथ सबकुछ भूलकर मिलजुलकर मनाए तो पूरे साल के लिये यह एक यादगार बन जाता है। ।अगर हम अपनों के यहां मिठाई खेल खिलौने और जरूरत अनुसार पटाखे आदि पहुंचाकर उन्हे भी खुशिया मनाने का पूर्ण मौका दें तो।
इस बार सात नवंबर को कल हम दिपावली का त्यौहार मनाने की तैयारियां जोरों पर कर रहे हैं। इसी दिन महान विद्वान और हम सबके प्रेरणा स्त्रोत ऐसे महान पुरूष महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी महाराज का जन्म दिन भी मनाया जाता है जिनके सिद्धांतों को विरोधी विचार धारा वाले भी आत्मसार कर चलते हैं। यह भी इत्तेफाक कहा जाएगा जब अध्योध्या में भगवान राम के आगमन पर दीपावली मनाए जाने की तैयारियां चल रही होगी उसी दिन स्वामी दयानंद सरस्वती जी के रूप में एक ऐसे महान विद्वान ने जन्म लिया जो आगे चलकर मूर्ति पूजा के विरोधी हुए। लेकिन यह कितने आश्चार्य की बात है कि मूर्ति पूजक भी उनके सिद्धांतों को मानते हैं और बड़ी संख्या में तो लोग पूजा अर्चना करने के साथ साथ गायत्री मंत्र का जाप और हवन भी करते हैं। और स्वामी जी को भी दिपावली पर्व पर याद किया जाता है।
हर क्षेत्र में अपनी बुद्धिमानिता बात चतुर्थीय और समझदारी का परिचय देते हुए गरीब और जरूरतमंदों के उत्थान और देश का मान बढ़ाने के कारण आज दुनिया भले ही अलग अलग रूपों में इन्ही पूजती है मगर भगवान राम के साथ साथ स्वामी दयानंद जी को भी याद किया जाता है। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि जब दो अलग विचारधारा के महान स्वामियों को हम याद करते हैं तो यह हमे एक सबक देता है कि हम भी मिलकर कुछ ऐसा करें जिससे हमारी विचारधारा भले ही कुछ भी हो लेकिन हमारे बाद उनको कम या ज्यादा याद किया जाए।
मेरा तो यह ही कहना है कि आओ मिल जुलकर दियो की रोशनी की जगमगाहट में अपने गरीब और असहाय भाईयों के साथ मिलकर उनके सुख दुख बांटकर दिपाली पर्व मनाए।
वैसे तो हमेशा से ही खुशी का कोई भी पर्व क्यों न हों। हम लोग शस्त्र या पटाखे आतिशबाजी छोड़कर अपनी खुशियां हमेशा ही मनाते चले आ रहे है। लेकिन जैसे जैसे समाज ने तरक्की की और विज्ञान में नए नए अविष्कार हुए वैसे वैसे आतिशबाजी भी नए नए रूपों में आने लगी। और आजकल अनेकों कंपनियों द्वारा बड़ी आवाज वाली महंगी आतिशबाजी जो बनाई जाती थी वो खूब छुटती थी जिससे वायु सहित कई प्रकार का प्रदूषण माहौल और समाज में फैलता था तो कितने ही लोग घायल भी होते थे। मगर प्रथा और खुशी सबकुछ भुलाती रही। अब बढ़ते प्रदूषण को रोकने और हर व्यक्ति को स्वच्छ वातावरण में सांस लेने का मौका उपलबध कराने की भावना से माननीय न्यायालय द्वारा ग्रीन पटाखे और आतिशबाजी रात आठ बजे से दस बजे तक छोडने की अनुमति दी गई है लेकिन अभी नहीं तो ग्रीन पटाखे पूरी तौर पर मार्केट में आए और न ही इनकी सही जानकारी किसी को है माननीय न्यायालय का आदेश हुआ प्रशासन और पुलिस तथा शासन तथा उनका पालन कराने के लिये कटिबद्ध है लेकिन पूर्व में ऐसे मामलों में जो देखने को मिला उससे यह पता चलता है कि आतिशबाजी तो होगी भले ही छुप छुपकर छोड़ी जाए।
मेरा कहना है कि अगर ग्रीन पटाखे मिल जाए तो सोने पर सुहागा होगा वरना त्यौहार को शुभ बनाने के लिये कम प्रदूषण फैलाने वाले कम संख्या में पटाखे छोडे जाए तो वो देश व समाजहित के साथ साथ हमारे और हमारे बच्चों के लिये भी बहुत लाभदायक होगा। दूसरी ओर पूर्व में एक दूसरे के घर जब हम मिठाईयां भेजते थे वो वो शुभ का प्रतीक हुआ करती थी वर्तमान समय में बच्चे बूढ़े बीमारी के कारण या कुछ हानि न हो जाए इसलिये मिठाई का सेवन करने से बचते है लेकिन कई मौके पर नकली मिष्ठान होने की सभावना से लोग इससे दूर हटते है इसलिये मिठाईयों के स्थान पर अब चाकलेट, बिस्टकुट, काजू, बादाम मेवा, फल फूल महंगे घरेलू सामान आदि गिफ्ट में दिये जाने लगे। कुल मिलाकर देखा जाए तो यह अच्छा भी है।
मगर मैं तो सिर्फ यह ही कह सकता हूं कि दिपावली हमारे मन की भावना से जुड़ा त्यौहार है। पटाखे भी छुड़ाए जाए मिठाई भी बांटी जाए जिसकी जैसी स्थिति गिफ्ट भी प्रदान किये जाए लेकिन ऐसा काम हमे नहीं करना चाहिये जिससे हमारे आर्थिक या किसी रूप से कमजोर भाईयों की भावनाओं को ठेस पहुंचे। हां ग्रामीण कहावत हैे भगवान इतना जरूर दें मैं भी भूखा न रहू पड़ोसी भी भूखा न सोय की बात को आत्मसार कर हम सब मिलकर अपनों के साथ यह त्यौहार मनाए यही इसकी सार्थकता है और यही इसका मूल उददेश्य भी कहा जा सकता है।

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– रवि कुमार बिश्नोई
संस्थापक – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समाज सेवी संगठन आरकेबी फांउडेशन के संस्थापक
सम्पादक दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
आॅनलाईन न्यूज चैनल ताजाखबर.काॅम, मेरठरिपोर्ट.काॅम

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