सबरीमाला मंदिर में सभी महिलाओं का प्रवेश है एतिहासिक निर्णय

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इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन की तरह ऐसे महत्वपूर्ण मामलों को अन्य एनजीओ व सूचना का आधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा भी न्यायालयों में ले जाना चाहिये

मुस्लिम समाज में प्रचलित एक साथ तीन तलाक की प्रथा को समाप्त कर सेना में महिलाओं को स्थायी कमिशन देने का रास्ता खोलने अपनी मर्जी से किसी भी व्यक्ति से शादी करने का अधिकार देने मंुबई स्थित धार्मिक स्थल हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश दिलवाने तथा व्याभिचार की धारा 497 समाप्त करने के साथ ही महिलाओं को अधिकार दिलाने के बाद अपने देश में अब केरल की राजधानी तिरूअंनतपुरम से 175 किलो मीटर दूर पहाड़ियों में स्थित साल में सिर्फ तीन माह नवंबर से जनवरी तक खुलने वाले सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाएं भी दर्शन कर सकेंगी। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्य पीठ ने बहुमत के आधार पर फैसला देते हुए कहा कि भगवान आयप्पा के भक्त हिंदू हैं ऐसे में एक अलग धार्मिक संप्रदाय न बनाए। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 26 के तहत प्रवेश पर बैन सही नहीं है क्योंकि संविधान पूजा में भेदभाव नहीं करता है। केरल में जब शैव और वैष्णवों वैमनस्य के कारण एक मध्यम मार्ग की स्थापना की गई थी जिसके तहत आयप्पा स्वामी का सबरीमाला मंदिर बनाया गया था। इसमे सभी पंत के लोग आ सकते थे। मगर 800 साल पुराने इस मंदिर में महिलाओं के आने पर रोक थी। कुछ वर्ष पहले शायद इसमे कुछ छूट दी गई थी। लेकिन अब माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के उपरांत हर उम्र की महिलाए मंदिर में प्रवेश कर भगवान के दर्शन कर सकती हैं। यह भी बताया जाता है कि आयप्पा स्वामी को ब्रहमाचारी माना गया है। इसलिये मंदिर में उन महिलाओं का प्रवेश वर्जित था जो राजस्वला हो सकती है। इंडियन यंग लायर्स द्वारा 2006 में याचिका दायर कर इस प्रतिबंद को खत्म करने की मांग की थी। इसके बाद मामला संविधान पीठ को सौंपा गया। केरल सरकार ने भी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया हैं। दूसरी ओर सबरीमाला मंदिर का प्रबंध करने वाले त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करने की बात कहते हुए कहा है कि इसके लिये हम बाध्य हैं। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूूड़, इंदु मल्होत्रा की पांच संविधान पीठ की एक सदस्य ने अपने अलग फैसले में कहा कि सती जैसी सामाजिक बुराइयों को छोड़कर अदालतें यह तय नहीं कर सकतीं कि कौन सी प्रथा खत्म होना चाहिए। देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल बनाए रखने के लिए गहरे धार्मिक मामलों से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। भारत में विविध धार्मिक प्रथाएं हैं। संविधान सभी को अपने धर्म के प्रचार करने और अभ्यास करने की अनुमति देता है। ऐसे में अदालतों को धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए भले ही यह भेदभावपूर्ण क्यों न हो। आयप्पा को एक अलग धार्मिक पंथ माना जाएगा और उसे अनुच्छेद 26 में संरक्षण प्राप्त है। रोक लगाने वाला नियम 3 (बी) असंवैधानिक नहीं है।
मेरा माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिये गए एतिहासिक फैसले से संबंध किसी भी माननीय न्यायाधीश के निर्णय पर टिप्पणी करने का कोई मकसद नहीं है। मगर यह जरूर कह सकता हंूं कि मात्र शक्ति को अब रूढ़ीवादी परम्पराओं की बेढ़ियों में जकड़ी प्रथाओं से छुटकारा हर क्षेत्र में मिलना ही चाहिये। और इससे पूर्व केंद्र सरकार महिलाओं मुस्लिम समाज में प्रचलित एक साथ तीन तलाक की प्रथा को समाप्त करने सेना में महिलाओं को स्थायी कमिशन देने का रास्ता खोलने अपनी मर्जी से व्यक्ति से शादी करने का अधिकार देने मंुबई स्थित धार्मिक स्थल हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश दिलवाने तथा व्याभिचार की धारा 497 समाप्त कर महिलाओं को अधिकार मिलने के बाद अब सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं का प्रवेश दिये जाने का फैसला एतिहासिक है और मैं समझता हूं कि समाज में मां और बहन आदि के रूप में नारी का सम्मान तो किया ही जाता है विभिन्न देवियों के रूप में मात्र शक्ति को पूजा भी जाता है और यह व्यवस्था भी आदिकाल से चली आ रही है। मगर अब कुछ गलत कहीं जाने वाली परम्पराताओं को समाप्त कर महिलाओं के लिये जो नए दौर की शुरूआत हुई है वो देश के सर्विणम विकास और उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ साथ राष्ट्र की एकता और अंखडता में भी अपना योगदान देंगी। यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं कि समाज को सही राह दिखाने और सबको मुख्यधारा से जोडे रखने में बच्चे के जन्म के बाद पहली गुरू माताओं का बडा योगदान होता है।
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए मेरा मानना है कि और जिन क्षेत्रों में ऐसी प्रथाएं चली आ रही है जो महिलाओं की गरिमा के विपरीत कहीं जा सकती है। उन्हे भी समाप्त किया जाना चाहिये। इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन के सदस्य जिनके द्वारा 2006 में यह मामला न्यायालय में ले जाया गया उन्हे भी बधाई दी जानी चाहिये और मुझे लगता है कि देशभर में विभिन्न क्षेत्रों में जो एनजीओ व सूचना का अधिकार कार्यकर्ता सक्रिय है उन्हे देश को जोड़ने और सबको सम्मान दिलाने गरीब व मजबूरों को न्याय दिलाने के लिये ऐसे मामले लेकर माननीय न्यायालय तक जरूर जाना चाहिये। क्योंकि उनके कुछ प्रयासों से समाज का अत्यंत महत्वपूर्ण हित हो सकता है।

-निवेदक
रवि कुमार बिश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष
आॅल इंडिया न्यूज पेपस एसोसिएशन आईना

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