अरे यार! अपनों को आगे बढ़ाकर तो देखिए…

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सबको बोलने और अपनी बात कहने का पूर्ण अधिकार अपने देश में मिला हुआ है और वो अंहिसक रूप से किसी भी तरीके से अपनी भावनाएं जाहिर करने के लिये स्वतंत्र हैं। शायद यही कारण है कि हमारे देश में गली मोहल्लों गांव देहातों शहर कस्बों जनपद व महानगरों में आये दिन किसी न किसी मुददे को लेकर आंदोलन धरने व प्रदर्शन करने और संबंधित को ज्ञापन देने का सिलसिला नजर आता ही रहता हैं । प्रदर्शन चाहे किसी भी प्रकार से किया जा रहा हों उसमे जितने ज्यादा नेता व कार्यकर्ताओं की भीड़ होगी वो वर्तमान में बन गई सरकारी सोच के कारण उतना ही वो सफल कहलाता है क्योंकि आजकल कुछ ऐसा रिवाज हो गया है कि अगर आप अपनी बात को शांतिपूर्ण तरीके से कहेंगे तो उस ओर कोई ध्यान नहीं देता ओर उसी विषय पर जवाब जनमानस के साथ अपनी बात कहते हैं तो उस पर सुनवाई तुरंत शुरू हो जाती है। इसलिये अब हर धरना प्रदर्शन में आयोजकों द्वारा ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने की कोशिश की जाने लगी हैं। और इसमे कोई बुराई भी नहीं है अगर आयोजन शांतिप्रिय हो तो। ऐसे मौकों पर हमें जब भी कहीं कुछ होता है तो उच्च स्तर से लेकर नीचले स्तर तक सक्रिय जनप्रतिनिधि और सगठनों के नेता यह कहते सुने जा सकते हैं कि यार कोई आता तो है नहीं। भीड़ जुटती नहीं। आयोजन असफल हो जाता है आखिर हम भी क्या करें। मगर ऐसा कहने वाले आयोजक और उसके चमचे यह भूल जाते हैं कि भैया आज के समय में तो किसी पर है नहीं और फिर दूध पीता बच्चा भी अपने अधिकार और सम्मान की बात पूरी तौर पर जानता है। ऐसे में जब धरना प्रदर्शनों और आंदोलनों में आने वाले कार्यकर्ता और नगर स्तर के नेताओं को आयोजक प्राथमिकता नहीं देंगे तो भला वो क्यो तो खुद आएगा और साथ में 20 आदमी क्यों लाएगा?
मेरा मानना है कि सम्मान आपको जब ही मिलेगा जब आप दूसरों को देंगें। आप आगे बढ़कर तभी सफलता की ओर अग्रसर होंगे जब दूसरों को आगे बढ़ाने की चाहत आपमें होगी। वर्तमान में तो यह हो रहा है कि अपने मीया मिठठू बने रहने और स्वयं की इज्जत कराने में लगे उनमे कुछ नेता संगठनों के तो कुछ राजनीतिक दलों के भी। जो आंदोलन वो खुद करते हैं भले ही वो असफल हो जाए लेकिन उनके द्वारा अपने समक्षक और बड़ों को मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि को छोड़कर इसलिये सूचित नहीं किया जाता की कहीं वो समारोह में आकर ना छा जाए। मुझे लगता है कि मामला कोई भी हो अपनी बात सुनाने के लिये तरीका कोई सा भी अपनाया गया हो लेकिन उसमे अपने और पराए जितने भी हो सकें। सबको आमंत्रित किसी भी तरीके से जरूर किया जाना चाहिये। क्योंकि कोई तारीक उसकी होगी और उसे सफलता मिलेगी जो सबसे को साथ लेकर चलेगा। क्योंकि आपके माध्यम से ही यह सब आखाड़ा जमा होता है। इसलिये मेरा सभी आंदोलन व प्रदर्शन और धरने किसी भी मुददे पर करने तथा कराने और उनमे शामिल होने वालों से आग्रह है कि अगरउनमे सफलता प्राप्त करनी है तो अपने लोगों को साथ में बांधे रखना है तो भैया क्षेत्र के नवंबर वन या दो के सक्रिय नेताओं कों बढ़ावा देना ही होगा जिससे वो आपके सम्मेलन व जलसे में अपने साथ अपना प्रभाव दिखाने के लिये पांच पांच दस दस आदमी लेकर लाएं।
यारों अगर हम आयोजक जो विज्ञप्ति बनाते हैं उसमे अपना अपना नाम डालने के साथ साथ अगरआने वाले और मौजूद 10 या 20 सक्रिय और लोकप्रिय कार्यकर्ता व नेताआंे के नाम भी लिख दिया करे और जब फोटो खिचवाने का नंबर आए तो ऐसा एक्शन बना लिया जाए जिसमे सबके ही चेहरे कम या ज्यादा चमकें अगर हम ऐसा करने में सफल होते हैं तो मेरा मत है कि हर धरना प्रदर्शन सफल रहेगा। और उसकी चर्चा होगी। तथा ज्ञापन पर कार्रवाई जल्द शुरू होगी।
क्योंकि जो दिखता है वो बिकता है। की बात अब हर कोई मान रहा इन सभी तथ्याों को ध्यान में रखकर यार कम से कम अपनों को सम्मान देना तो सीखें आप नेता बनते ही चले जाएंगे। आपकी टांग कोई नहीं खींच पाएगा और उूंचे से उंूचे जनप्रतिनिधि बनने के लिये आपको कोई नहीं रोक पाएगा चाहे कोई कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें आप अपनों को साथ लेकर खुद चार सीढ़ी चढ़ रहे हैं तो दो दूसरों को चढ़ने दें। खुद हम रसमलाई खा रहे हैं तो कुछ को हम लडडू खाने का भी मौका दीजिए। आपमे अगर कोई काबलियत है तो आपका कोई पीछा नहीं कर पाएगा। अगर आपके अपने सक्रिय होकर आपको मजबूत होगा। यह बात घर हो या उद्योग व्यापार हो या मित्रता हर क्षेत्र में लागू होती है।

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-निवेदक
रवि कुमार बिश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष
आॅल इंडिया न्यूज पेपस एसोसिएशन आईना

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