अब बेटा नहीं बेटी होने की कामना की जाए तो अच्छा है , हाथ पीले व कन्यादान कर पिया संग बेटियों ने मां को किया विदा

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बेटों की चाह रखने वाले मां बाप के लिये यह घटना है एक सबक जो हमे यह सिखाती है कि अब पुत्र की बजाए पुत्री होने की कामना करना ज्यादा उचित है। वैसे भी आये दिन देशभर में कहीं न कहीं की बेटो द्वारा मां-बाप को परेशान करने, सम्पत्ति पर कब्जा कर घर से निकाल देने जैसी खबरे पढ़ने को मिलती है जिससे हमे यह सीख मिलती है कि बेटियां बेटों से ज्यादा मां बाप का ध्यान रख सकती है इसलिये हमें भगवान जो भी दे बेटा या बेटी उसे ईश्वर की देन मानकर उनका लालन पालन करे तो हमारा जीवन सुखी हो सकता है। बीते दिवस जागृति विहार निवासी एक 50 वर्षीय महिला जिसने पति की मौत के बाद 15 साल तक कठिन संघर्ष कर अपने बच्चों को पाला और पढ़ाया लिखाया और फिर उनकी शादियां कर दी। को उसके पुत्र ने घर से निकाल कर बाहर खड़ा कर दिया। और वैसे भी आए दिन उसके द्वारा किये जाने वाले दुव्यवहार और मां के अपमान से दुखी पुत्रियों ने मां को संरक्षण ही नहीं दिया उसकी विदाई भी एक संरक्षक की भंाति की।
हमें हमेशा शादी समारोह में एक गाना ज्यादातर विशेष रूप से सुनने को मिलता है कि बाबुल की दुआएं लेती जा जा तुझको सुखी संसार मिलें… यह गाना बेटी की खुशी की कामना करने वाले मां बाप की तरफ से एक पुत्री को समझा जाता है।
लेकिन यहां तो दो बेटियों ने रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद परेशान अपनी मां के हाथ पीले करने की सोची ओर कुछ कठिनाईयों के बाद सहारनपुर का एक व्यक्ति ऐसा मिला जिसकी पत्नी की कुछ समय पहले मौत हो चुकी थी। उससे बेटियों ने बात चलाई तो रिश्ता पक्का हो गया तब दोनों ने अपनी मां को भी समझा बुझाकर इसके लिये तेैयार किया और फिर बीते दिनों बेटियों ने अपनी मां के हाथ पीले व शादी कराकर उसे धूमधाम से विदाई ही नहीं किया बल्कि अपनी मां का कन्यादान भी पुत्रियों द्वारा किया गया बताया जाता है।
पढ़ने और सुनने में तो यह अजीब सी बात लगती है मगर समाजिक परिवेश और मां बाप की सोच को ध्यान में रखकर विचार किया जाए तो भले ही समाज में कितनी ही जागरूकता आ गई हो लेकिन जब किसी की शादी होती है तो वो और उसके अभिभावक चाहे लडकी के मां बाप हो या लड़के के। हमेशा यह चाहते हैं कि आगे कुछ भी हो जाए मगर पहली संतान बेटा ही हो। और इसके समर्थन में उनके द्वारा यह बात कहीं जाती है कि बेटा हो जाने से परिवार पूरा हो जाता है बाद में बेटी भी हो तो कोई परेशानी भी नहीं है।
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि तमाम तरह से सुधार आने और दहेज प्रथा धीरे धीरे समाप्त होने के बाद भी बेटी की शादी को लेकर अभिभावक हमेशा चिंतित रहते हैं एक तो अनकहे रूप से दिया जाने वाला दहेज और दूसरे जहां पुत्री ब्याहकर जाएगी वो लोग कैसे होंगे ? उसे सही प्रकार से रखेंगे या नहीं को लेकर चिंता बनी रहती है।
मगर मुझे लगता है कि बेटियों से ज्यादा अब बेटे कितने मामलों में देखने को मिला है कि मां बाप की जान का बवाल तो बनते हीं है तो कुछ तो इतना गिर जाते हैं कि माता पिता की बेइज्जती करना, समय समय पर ताने देना और मौका लगे तो संपत्ति को जब्त कर उन्हे घर से निकाल देना जैसी घटनाएं अब काफी होने लगी है जिन्हे देखकर मेरा मानना है कि अब नव दंपत्ति और उसके मां बाप को भी बेटो की जगह बेटी होने की कामना करनी चाहिये। क्योंकि जिस घर में वो जाती है उसे तो संभालती ही है अपने मां बाप को भी उनके द्वारा अनेक प्रकार से सहायता कर या कठनाईयों में उनके साथ खडे़े होकर उन्हे भी संभाला जाता है।
यहां मैं नाम तो नहंीं खोलना चाहता लेकिन मेरे मिलने वाले एक बहुत बड़े व्यक्ति जिनका एक समय पूरे हिंदूस्तान में अपने व्यवसाय के कारण डंका पूजता था उन्होंने अच्छे समय में अपने भाईयों को भी साथ लगाया ओर हर समय से उनकी मदद कर उन्हे कामयाब बनाया। और पुत्र को भी पूरे मौके दिये। लेकिन जब भगवान की नजर हटी और काम हल्का हो गया तो भाईयों ने भी नजर फेर ली और पुत्र भी ताने देने लगा तब उनकी बेटी ने हाथ बढ़ाया और मरते दम तक अपने पिता की सेवा की। और वर्तमान में मां को भी संभाल रही हैं
यह तो एक घटना है लेकिन अगर निगाह दौड़ाई जाए तो समाज में ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे जिनमे बेटियां अपने परिवार को उन्नति के शिखर पर ले जाने के साथ साथ अपने पीहर लोगों को भी संभाले हुए हैं।
मैं कोई आदर्श पुरूष तो हूं नहीं और न हीं मेरी ऐसी हैसियत है कि किसी को सीख दे सकूं, लेकिन बेटियों द्वारा मां की विदाई और कन्यादान से यह प्रेरणा जरूर मिलती है कि अब बेटियों को बोझ नहीं बल्कि लक्ष्मी के रूप में अपनाए जीवन हमेशा सुखी रहेगा। रही बात पुत्र की हो तो अच्छा न हो तो अच्छा।

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-निवेदक
रवि कुमार बिश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष
आॅल इंडिया न्यूज पेपस एसोसिएशन आईना

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