नवाबों के शहर लखनऊ में इन पर्यटक स्थलों पर घूमना नहीं भूलें

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गोमती नदी के किनारे बसा लखनऊ शहर अपने बगीचों, उद्यानों और अनोखी वास्तुकला की इमारतों के लिए अपनी पहचान बनाता है। लखनऊ का उद्भव सूर्यवंशी राजाओं के समय हुआ। बताया जाता है कि लक्ष्मण के नाम पर पहले इस स्थान का नाम लक्ष्मणपुर था। कालान्तर में यह नाम खनपुर, लखनावती और फिर Lucknow हो गया। यहां की खूबसूरत लगने वाली इमारतों में राजपूत, मुगल, ईरानी−अरबी तथा आम उत्तर शैली निर्माण कला के दर्शन होते हैं।

उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी लखनऊ में निर्मित नवाब आसफ−उद बड़ा इमामबाड़ा भारत की सबसे बड़ी निर्मित रचना मानी जाती है। इसका वास्तु चमत्कार तथा इन्जीनियरिंग आश्चर्यजनक है। इस चमत्कृत धार्मिक भवन का निर्माण 1784 ईस्वीं में प्रारंभ किया गया जिसे पूर्ण होने में 14 वर्ष का समय लगा। पूरी इमारत लखनवी र्इंटों और चूने के प्लास्तर से बनी हुई है। इसके निर्माण में किसी भी प्रकार की लकड़ी या धातु का उपयोग नहीं किया गया है। इस इमारत का सबसे मुख्य केन्द्र केन्द्रीय हॉल है जो धनुषाकार छत लिये हुए है। यह एक भूलभुलैया के रूप में मनोरंजन भी करती है, जिसमें एक हजार के करीब मार्ग तथा 487 समान दरवाजे बने हैं। स्तम्भहीन मेहराबदार हॉल विश्व का पहला हॉल है और विश्व स्तर पर अपनी पहचान कायम रखे हुए है। भूलभुलैया में जाने के लिए मार्ग दर्शक की सहायता लेना उचित रहेगा।

सुनहरे और बड़े गुम्बद वाला छोटा इमामबाड़ा का निर्माण 1937 ई. में मोहम्मद अली शाह ने करवाया था। इसमें मोहम्मद अली शाह तथा उसकी बेटी और दामाद का मकबरा भी बना है। इसका प्रकाश कक्ष खूबसूरत इमारतों में आता है। गुम्बद, मीनार एवं उद्यान वाला यह एक खूबसूरत रचना है। इसमें इतावली शैली में निर्मित मशहूर इमारत छतर मंजिल बेजोड़ है। यहां सजे हुए बेल्जियम काँच की संरचनाएं, कीमती झाड़फानूस, कंदीलें एवं शमादान को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाता है। भवन में शानदार दीवान खाना, कमरे, तहखाने और सुरंगें बनी हैं। गोमती नदी की तरफ गुम्बदों एवं मेहराबों से सजी इमारत की सुन्दरता देखते ही बनती है। यहां अब केन्द्रीय औषधीय अनुसंधान केन्द्र स्थापित किया गया है। मकबरे के विपरित दिशा में सतखण्ड नाम का एक अधूरा घण्टाघर है। मोहम्मद अली शाह की मृत्यु के बाद इसका निर्माण रोक दिया गया तथा उस समय तक 67 मीटर ऊँचे इस घण्टाघर की चार मंजिल ही बन पाई थी।

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वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का गवाह है जहां अंग्रेज अफसर रहते थे। वर्तमान में इसे राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है जिसकी दीवारों पर गोलों के निशान आज भी संघर्ष की कहानी कह रहे हैं। खण्डर में तब्दील हुई इमारत आज भी दर्शनीय है। इसका निर्माण लखनऊ के नवाब आसफउद्दौला ने 1780 ई. मे शुरू करवाया था जिसे बाद में नवाब सआदत अली ने 1800 ई. में पूरा करवाया। यह संग्रहालय 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं को संजोने एवं प्रदर्शित करने की दृष्टि से बनवाया गया। यहां रेजीडेन्सी का मॉडल, पुराने फोटो, शिलालेख, चित्र, दस्तावेज, तत्कालीन समय के अस्त−शस्त्र आदि वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। यह संग्रहालय दो भागों भूतल एवं बेसमेन्ट में विभाजित है। यहां भूतल पर चार दीर्घाएं एवं बेसमेन्ट में आठ दीर्घाएं बनाई गई हैं। इसके खुलने का समय प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक है। प्रति सोमवार यह संग्रहालय बंद रहता है। रेजीडेन्सी के सामने गोमती की किनारे पर सफेद संगमरमर से बना स्मारक 1857 ई. के शहीदों की स्मृति में बनाया गया है।

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रूमी दरवाजे का निर्माण नवाब आसफउद्दौला ने 1783 ई. में उस समय करवाया था जब यहां अकाल की स्थिति थी और मजदूरों को इसके निर्माण पर रोजगार मिला। इसके निर्माण में 3 वर्ष का समय लगा। अवध वास्तुकला के प्रतीक इस दरवाजों को तुर्किश गेटवे भी कहा जाता है। इसकी ऊँचाई 60 मीटर है। माना जाता है कि इस दरवाजे का नाम 13वीं शताब्दी के महान सूफी फकीर जलाल−अद−दीन मुहम्मद रूमी के नाम पर रखा गया। लखनऊ शहर के लिए इसे प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह दरवाजा लखनऊ की एक विशेष महत्वपूर्ण संरचना है। उस समय इस दरवाजे सहित इमामबाड़ा के निर्माण पर एक करोड़ रूपये व्यय किये गये। यहां कार्य पर 22 हजार लोगों को रोजगार मिला। रूमी दरवाजा लखोड़ी र्इंट और बादामी चूने से बना है। सबसे ऊपरी हिस्से पर 8 पहलू छतरी बनाई गई है। दरवाजे की रूप रेखा त्रिपोलिया दरवाजे जैसी है। गेट के दोनों तरफ तिमंजिला हवादार परकोटा बना है। निराली सजावट वाले इस दरवाजे में हिन्दू−मुस्लिम कला का सम्मिश्रण देखने को मिलता है।

लखनऊ के मुख्य बाजार हजरतगंज में बनारसी बाग को प्रिन्स ऑफ जूलोजिकल गार्डन के नाम से भी जाना जाता है। यहां के हरे−भरे वातावरण में विभिन्न प्रकार के जीवजन्तु एवं पक्षी देखने को मिलते हैं। बच्चों की टॉय ट्रेन भी संचालित है। परिसर में एक सरकारी संग्रहालय भी बनाया गया है। जहां मथुरा से लाई गई पत्थरों की मूर्तियों का संग्रह, रानी विक्टोरियां की मूर्ति एवं मिश्र की एक मम्मी पर्यटकों के मध्य आकर्षण का केन्द्र रहती हैं।

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शहर के मध्य 221 फीट ऊँचे क्लॉक टॉवर का निर्माण 1887 ई. में 1.20 लाख की लागत से करवाया गया था। यह क्लॉक टॉवर अपनी निर्माण शैली के लिए विश्व स्तर पर विख्यात है। इसके ऊपर चारों दिशाओं में घडि़यां लगी हैं। क्लॉक टॉवर से कुछ दूरी पर पिक्चर गैलेरी स्थापित है जहां लखनऊ के सभी नवाबों की तस्वीरें देखी जा सकती हैं।

लखनऊ के अन्य दर्शनीय स्थलों में सात अरब रूपये की लागत से राजस्थान के बलुआ पत्थर से निर्मित डॉ. भीमराव अम्बेडर स्मारक में कई स्थल व पार्क सहित जामा मस्जिद, लक्ष्मण टीला, सआदत अली का मकबरा, लॉ मार्टिनियर, गौतम बुद्ध पार्क, गोमती नदी के किनारे बना मोती महल, इन्द्ररा गांधी तारा मण्डल, नींबू पार्क, मेरिन ड्राईव, हनुमान सेतु मंदिर, मनोकामेश्वर मंदिर, अलीगंज का हनुमान मंदिर, भूतनाथ मंदिर, केथेड्रल चर्च, असेम्बली ऑफ बिलीवरी चर्च तथा लखनऊ से 90 कि.मी. दूर नेमीषारण्य मंदिर प्रमुख हैं।

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