विश्व बालश्रम उन्मूलन दिवस पर विशेष आओ मिलकर जरूरतमंद बालकों की मदद के लिये हाथ बढाएं, आज सोचता हूं की मजदूरी करना मेरा शोक नहीं मजबूरी थी

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आज पूरी दुनिया में विश्व बाल श्रम उन्मूलन दिवस मनाया गया। इस मौके पर जितनी जागरूकता केंद्र व प्रदेश की सरकारों तथा विभागों द्वारा देश के शहर कस्बांे में जागरूकता अभियान चलाने चाहिये थे वो तो नहीं चलाए गए हां बाल श्रम दण्डनीय अपराध है और उसमें क्या क्या सजाए मिल सकती है। कहीं कहीं पर यह बताने की कोशिश जरूर की गई। हर कोई चाहता है कि उसके बच्चे प्रसन्न रहे और उन्हे बचपन में खेलने कूदने सहित अन्य सभी सुविधाएं मिलें। और वो शिक्षा प्राप्त कर अपने माता पिता के बुढ़ापे का सहारा बने मगर कहते हैं कि जब भगवान ने ही सबको बराबर नहीं बनाया तो इंसान भला बराबरी की व्यवस्था कहां से कर सकता है। फिर भी बच्चों के उज्जवल भविष्य के नाम पर कुछ नियम व कानून बनाए गए जैसे बाल और किशोर श्रम अधिनियम 1986 के उल्लंघन पर 6 माह से लेकर 3 वर्ष तक की कैद या 20 हजार से 50 हजार तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हेैं, बाल और किशोर श्रम अधिनियम 1986 के तहत 4 वर्ष से कम उम्र का बच्चा किसी भी तरह का श्रम नहीं करेगा, 14 वर्ष से 18 वर्ष का किशोर किसी भी जोखिम भरे व्यवसाय में काम नहीं करेगा तथा कोई भी काम करते हुए किशोर की स्कूली शिक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।
मेरा मानना है कि अगर हम बच्चों को उनका बालकपन देना चाहते हैं तो पहले हमें गरीब व बेसहारा तथा आर्थिक व कमजोर परिवार वालों की खोज कर उनकी समस्याएं दूर करने के साथ साथ बच्चों को पढाने और उन्हे जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के अतिरिक्त उन बच्चांे का परिवार दो समय की रोटी आसानी से जुटा सकें। इसके लिये व्यवस्थाएं जुटाकर देनी होगी। और अगर हम सरकार यह नहीं कर सकती तो कितने ही बालकों को श्रम से मुक्त कराने के प्रयास कर लिये जाए कितने ही दिवस मना लिये जाए उन्हे श्रम से छुटकारा नहीं मिल सकता।
हां यह जरूर है कि काम के लिये की जाने वाली छापामारी के लिये जिम्मेदार विभागों के अफसरों व कर्मचारियों की जेब भारी जरूर होने लगती है मगर बच्च्चों को इसका कोई फायदा नहीं होता। क्योंकि जब रोटी नहीं मिलेगी ते पढाई व अन्य की बात तो सोचना तो दूर की बात हैं ।
कुछ लोग उनमे सरकारी बाबुओं के साथ ही जनप्रतिनिधि और बाल श्रम से मुक्ति के लिये काम कर रही संसथाओं के बैठ कर ऐसी कमरों में योजनाएं बनाते हैं और इनमे जो शामिल होंते है उन्हे जमीनी माहौल का ज्ञान भी नहीं होता। ऐसे माहोल में बने नियम कहां तक सफल हो सकते है। यह किसी को बताने की जरूरत नहीं।
मैं जब पैदा हुआ तो ऐसे समय प्राप्त होने वाली कोई सुविधा मेरे परिवार में नहीं थी। जब चार , पांच साल की उम्र में उस समय के निवास जिला नैनीताल टाउन एरिया कमेटी जसपुर के मैन बाजार में स्थित फूलसिंह चाय वाले की दुकान पर झूठे प्याले धोने लगा और यहीं दीना पनवाडी की दुकान पर लस्सी के झूठे गिलास धोने की नौकरी करने के साथ साथ सात आठ साल की उम्र में लाला ज्योति प्रसाद के परिवार में बर्तन मांझने व कपड़े धोने जैसी घरेलू नौकरी करने लगा। आज में सोचता हूं तो मुझे लगता है कि वो मेरा शोक नहीं मेरी मजबूरी थी। क्योंकि यहां से मिलने वाली 3 रूपये महीने की तनख्वाह और लोगों के कपड़े सीकर तथा घरों की सफाई कर उससे मिलने वाले पैसों से घर का खर्चा चलता था। ऐसे में पढ़ाई की बात सोचना और बाल श्रम न करने की बात कोई गरीब तो नहीं सोच सकता है मुझे आज भी लगता है यह संभव नही है।
मेरा मानना है कि सरकार और इस काम में लगे समाजिक संस्थाएं अगर चाहती हैं कि बच्चों का बचपन श्रम करने में न बीते तो बाकी बात तो दूर सबसे पहले ऐसे बच्चों के परिवार वालों का सर्वें किया जाए और फिर आवश्यकता अनुसार उनकी जरूरतों को पूरा करने के साथ साथ विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय संगठन उद्योगपति समाजसेवी या सरकार गरीब बच्चों की पढाई और उनके पालन पोषण का खर्च उठाए ऐसा अगर हो जाए तो कम या ज्यादा हमारे बच्चें बाल श्रम से मुक्त होकर भले ही उन्हे खिलौने न मिले शिक्षा प्राप्त कर समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान तो अपना बना सकते हैं। क्योंकि ऐसे ज्यादातर बच्चों में एक समय आने पर कुछ कर गुजरने की ताकत मन में हिलौरे मारती है बस सही मार्ग दर्शन और माहौल मिलें तो दुनिया में ऐसे अनेक उदाहरण मिल सकते हैं। जिनसे पता चलता है कि बचपन में गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करते हुए बिना किसी सहायता के अपने दम पर शिक्षा प्राप्त कर और आधे पेट मेहनत मजदूरी करके बडे मुकाम ऐसे बच्चों ने पाए हैं। मुझे लगता है कि जितना पैसा सरकार इन बच्चों के जीवन उत्थान को देती है अगर संबंधित विभागों के अधिकारी ईमानदारी से उसका उपयोग करें और कुछ ऐसी व्यवस्था हो कि रोटी खाकर बच्चे जितना संभव हो सके अपने परिवार के लिये साधन जुटाने का काम करते हुए पढाई भी कर सकें तो वो बाल श्रम दिवस की सबसे बडी उपलब्धि हो सकती हैं वरना अखबारों में विभिन्न प्रकार से विज्ञापन छपवाकर या अन्य प्रकार से कितना ही पैसा कुछ सरमाएदारों को देकर उन्हे और मालामाल करती रहें मगर बाल श्रम से मुक्ति मिलने वाली नहीं है, लेकिन निराशा मौत के समान हैं। तथा आशा ही जीवन को आगे बढाने का सही मूल्य हैं और मैं क्योंकि बचपन में हर प्रकार का श्रम करने के साथ साथ मानसिक और शारीरिक तथा आर्थिक उत्पीड़न झेल चुका हूं ऐसा भविष्य अब बच्चों के साथ न हों भले ही वो बाल श्रम करते रहें तो यहीं ही जीवन की बडी उपलब्धि मैरे जैसे बच्चों के लिये होगी। सरकार व विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय लोग कर रहे हैं उसके लिये वो बधाई के पात्र हैं और जैसा मेरा बचपन बीता ऐसा बचपन बीताने के लिये मजबूर बच्चों के भविष्य में उज्जवल और आगे बढ़ने तथा सफल होने की कामना करते हुए आशा कारता हूं कि आज 12 जून के विश्व बाल श्रम उन्मूलन दिवस के मौके पर उन लोगों को शुद्धबुद्धि आएगी और अपने बच्चों की ओर देख वो गरीबों के लिये भी कुछ करने की सोचेंगे। मेरा पूर्ण विश्वास है कि बूंद बूंद से घड़ा भर जाता है वाली कहावत पर चलते हुए अगर थोडा थोडा सब मदद करें तो मेरे इन मासूम भाईयों का जीवन भी खुशहाल व सर्विणम यादों से परिपूर्ण होते देर नहीं लगेगी। बस हम थोडा अपनी सोच में बदलाव लाने की आवश्यकता है।

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– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

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