लघु एवं भाषाई समाचार पत्र संचालकों की सरकार से सबंध समस्याओं के समाधान हेतु, आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना का सांसदों के नाम खुला पत्र

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देशभर से प्रकाशित भारतीय भाषाई समाचार पत्रों के संचालकों द्वारा पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ बिना किसी राजनैतिक विवाद में पड़ें देश व जनहित में अपनी लेखनी का उपयोग करते हुए सरकार की जनहित की योजनाओं की खबर पात्र व्यक्तियों तक
पहुंचाने एवं जनसमस्याओं से सबंधित उच्च अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को अवगत तथा उनका समाधान कराने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है।
महोद्य, देश को आजाद हुए 71 साल हो रहे है लेकिन जितनी समस्याएं भारतीय भाषाई लघु समाचार पत्रों के संचालकों के समक्ष वर्तमान समय में आ रही है। उतनी पहले कभी नही आयी। इसके पीछे कारण जो भी हो लेकिन सूचना मंत्री व वित्त मंत्री के रूप में माननीय अरूण जेटली साहब ने जो नियम और नीतियां स्वयं अथवा डीएवीपी (ब्यूरों आॅफ आउट रीच एंड कम्यूनिकेशन), आरएनआई व प्रदेशों में स्थित सूचना विभागों के अधिकारियों आदि के सुझाव पर या स्वयं बनायी उन्होने इस श्रेणी के समाचार पत्र संचालकों की आर्थिक, मानसिक और समाजिक उत्पीड़न करने के सभी पिछले रिकार्ड तोड़ दिये है।
मान्यवर, अंग्रेजी शासन काल में 30 मई 1826 को युगल किशोर शुक्ल जी द्वारा उदंत मार्तण्ड नाम से सा0 समाचार पत्र का प्रकाशन हिंदी में किया गया। जो वर्तमान में हमारे समक्ष आ रही जैसी कठिनाईयों के चलते बंद हो गया था, जिसके बाद 1911 में गणेश शंकर विद्यार्थी जी द्वारा हिंदी पत्रकारिता की कमान सा0 प्रताप शुरू करके सम्भाली गयी और उन्होने भरपूर प्रयास कर उसे चलाने की भी कोशिश की। मगर 25 मार्च 1931 को उनकी हत्या कर दी गयी।
माननीय सांसद जी अवगत कराना है कि आज 192 साल बाद भी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित लघु व भाषाई समाचार पत्रों की स्थिति आजादी के बाद भी बिल्कुल वैसी ही बनी हुई है क्योकि जिस प्रकार अंग्रेज अपनी चाटूकारिता करने वाले या अपनी उत्पीड़ात्मक नीति के समर्थन में खबरें छापने वालों को विज्ञापन सहित विभिन्न प्रकार से उपकृत करते थे उसी प्रकार वर्तमान सरकार का सूचना मंत्रालय और उससे सबंध विभाग डीएवीपी (ब्यूरों आॅफ आउट रीच एंड कम्यूनिकेशन) व आरएनआई तथा प्रदेशों के सूचना विभागों में तैनात अधिकारियों द्वारा हमारे उत्पीड़न के लिए बनायी गयी विभिन्न नीतियों के माध्यम से हमें परेशान तो किया जा रहा है। विज्ञापन जो पहले मिलते थे वो भी बंद कर दिये गये।
आपकों अवगत कराना है कि आजादी के बाद शायद देश में पहली बार वर्तमान सरकार के सूचना मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय पर्वो पर जो विज्ञापन हमेशा जारी होते चले आ रहे थे वो भी बंद कर दिये। नियमित विज्ञापन देना तो दूर की बात हो गयी है।
श्रीमान जी हमारे जैसे लघु और भाषाई समाचार पत्रों और उनके संचालकों द्वारा देश की आजादी के संग्राम में जो भूमिका निभायी गयी वो किसी से छुपी नही है केन्द्र में संचालित वर्तमान सरकार के मुखिया और बड़े नेता भी पूर्व में हमारें प्रयासों की सराहना और प्रशंसा करते हुए हमारे योगदान को याद करते रहे है लेकिन पता नही क्या कारण है की सत्ता सम्भालते ही इस सरकार के सूचना व वित मंत्री अरूण जेटली साहब द्वारा हमसे कौन सी दुश्मनी निकाली जा रही है जो हमारे प्रकाशनों को अनकहे रूप में बंद कराने के लिए ऐसे ऐसे नियम बनाये जा रहे है जिनका पालन करना ही सम्भव नही है क्योकि विज्ञापन तो कुछ नही लेकिन खर्च उन पर भारी आ रहा है। आप क्योकि उच्च सदन में बैठकर नियम कानून बनाने के साथ साथ सबके हित में नीतियां बनाने तथा जनसमस्याओं के समाधान में अपना योगदान करते है।
मंै आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में यह पत्र इसलिए भेज रहा हूं कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आप हमारी नीचे दी जा रही समस्याओं का अवलोकन कर सरकार से उनका समाधान कराकर लोकतंत्र में हमारी भूमिका बनी रहे यह सुनिश्चित करने में हमे सहयोग करेंगे ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास और आशा है।
1. माननीय अरूण जेटली जी द्वारा सूचना एवं वित मंत्री के रूप में समाचार पत्र संचालकों के लिए जो नियम बनाये गये उन्हे समाप्त किया जाये क्योकि अनकहे रूप में वो लघु व भाषाई समाचार पत्र संचालकों के लिए काला कानून तथा आर्थिक मानसिक और समाजिक उत्पीड़न का कारण बन रहे है और इन्हे आधार बनाकर डीएवीपी (ब्यूरों आॅफ आउट रीच एंड कम्यूनिकेशन) व आरएनआई के अधिकारियों द्वारा कहे अनकहे रूप में हमारे प्रकाशनों को बंद कराने का जो प्रयास किया जा रहा है वो रोका जाये।
2. 25 हजार से कम सकुर्लेशन वाले अखबारों व लघु और भाषाई समाचार पत्रों को जीएसटी से हर प्रकार से मुक्त किया जाये। इनके कागज पर लगने वाली जीएसटी भी समाप्त हो क्योकि जितना विज्ञापन सरकार दे रही है। उससे कई गुना इन अखबारों पर जीएसटी लग रही है।
3. पूर्व की भांति राष्ट्रीय पर्वो व विशेष अवसरों पर जारी होने वाले विज्ञापन लघु व भाषाई समाचार पत्रों को भी नियमित रूप से जारी हो बिना किसी भेंदभाव कें ।
4. केन्द्र की सरकार डीएवीपी (ब्यूरों आॅफ आउट रीच एंड कम्यूनिकेशन) तथा प्रदेशों की सरकारें सूचना विभागों के माध्यम से हर माह साप्ताहिक समाचार पत्रों को 2 पृष्ठ और दैनिक को 5 पृष्ठ का विज्ञापन उनके खर्च को देखते हुए नियमित प्रकाशन बनाये रखने हेतु दें।
5. समाचार पत्रों की नियमिता हेतु जब विवरण आॅनलाईन डीएवीपी (ब्यूरों आॅफ आउट रीच एंड कम्यूनिकेशन) द्वारा लिया जा रहा है तो कर माह दिल्ली स्थित डीएवीपी (ब्यूरों आॅफ आउट रीच एंड कम्यूनिकेशन) कार्यालय में काॅपियां जमा कराने का कार्य बंद हो। हां
प्रकाशन की नियमिता की जानकारी के लिए जिलों में स्थित सूचना विभागों में काॅपियां जमा कराने और वहां से रिपोर्ट लेने की व्यवस्था सरकार द्वारा करायी जाए।
6. लघु व भाषाई समाचार पत्रों से जो पाठकों का सर्वे कराया जा रहा है की किस उम्र के कितने पाठक समाचार पत्र पढ़ते है। वो आदेश निरस्त किया जाये क्योकि अखबार बांटने के बाद उसे कौन पढ़ रहा है और किसी वर्ग के पाठक देख रहे है इतनी निगरानी साधन वीहिन राष्ट्र व जनहित में अपने समाचार पत्रों का प्रकाशन कर रहे संचालकों के लिए यह सम्भव नही है। इस लिये यह आदेश वापस हो।
7. साल में कम से कम एक बार और आवश्यकता पढ़ने पर कितनी ही बार केन्दीय सूचना मंत्री कोई भी नियम समाचार पत्रों से संबंध बनाने से पूर्व आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना व हमारे जैसे अन्य संगठनों के पदाधिकिारियों को बुलाकार विचार विमर्श कर नियम और नीति तय करें। तथा आग्रह करने पर मंत्री जी अपनी सुविधा नुसार प्रतिनिधि मंडलों को मिलने का समय कम से कम 3 महीनें में एक बार जरूर निधारित करें।
8. डीएवीपी (ब्यूरों आॅफ आउट रिच एंड कम्यूनिकेशन) तथा आरएनआई के अधिकारी सप्ताह में एक दिन लघु व भाषाई समाचार पत्र संचालकों जैसे आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना के प्रतिनिधि मंडलों से मिलने हेतु तय करे और पूर्व में समय लेेने के बाद आने पर समय से प्रतिनिधि मंडलों से मुलाकात करे इंतजार कराने की बजाय तुरंत मुलाकात कर समस्या को सुनें।
9. सत्ता धारी पार्टी के नेता और सरकार के मंत्री अपनी शाखा बनाये रखने और जनसमर्थन जुटाने के लिए विभिन्न क्षेंत्रों में सक्रिय महानुभावों के तो घर घर जाकर हाजिरी लगा रहे है और हमारी समस्याओं के समाधान के लिए हमें बुलाकर बात करने को भी तैयार नही है आखिर क्यों? क्या हम मतदाता अथवा इस देश के नागरिक नही है जो हमारे साथ सरकार का सूचना मंत्रालय और उससे संबंध विभाग के अधिकारी ऐसा व्यवहार कर रहे है।
आदरणीय सांसद जी हम भी इस देश के ही नागरिक है विदेशी नही हमारे द्वारा भी राष्ट्र की अखंडता मजबूत बनायेरखने तथा देश के चैमुखी विकास में अपना पूर्ण योगदान दिया जाता है। उसके बावजूद भी हमारा हो रहा उत्पीड़न कहां तक उचित है यह अब आपकों सोचना और उसे बंद कराना है क्योकि न्यायलय भी सजा देने से पूर्व सबकों अपनी बात रखने का मौका देता है। लेकिन वर्तमान केन्द्र की सरकार का सूचना मत्रंालय ओर डीएवीपी
(ब्यूरों आॅफ आउट रीच एंड कम्यूनिकेशन) और आरएन आई के अधिकारी तो हमारी बात सुनने तक का समय भी नही देते है। जिसे किसी भी प्रकार से लोकतंत्र में उचित नही कहा जा सकता।
यह पत्र आपकों इस आशा और विश्वास के साथ भेज रहे हूं कि आप अपनी न्याय प्रिय सोच के साथ हमारी समस्याओं का अवलोकर्न कर माननीय प्रधानमंत्री जी एवं वित्त मंत्री व सूचना मंत्री जी को पत्र लिखकर या स्वयं मिलकर अथवा लोकसभा व राज्य सभा में हमारे पत्र पर सवाल उठाकर हमें इस उत्पीड़न से छुटकारा दिलाने में अपनी निभाएंगे।

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निवेदक
रवि कुमार बिश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष
आॅल इंडिया न्यूज पेपस एसोसिएशन आईना

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