हिंसक जानवरों के हमले के लिये वन विभाग, स्वास्थ्य व नगर निगम के अधिकारी हो जिम्मेदार

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आदमखोर कुत्तों के आंतक से यूपी ही नहीं देशभर के अनेकों शहरों के नागरिक बुरी तरह से दहशतजदा है ऐसा इस संदर्भ में समाचार पत्रों में आये दिन पढ़ने को मिलने वाली खबरों से प्रतीत होता है। चैकाने वाली बात तो यह है कि माननीय न्यायालय द्वारा स्पष्ट निर्देश दिये गए हैं कि जनहित के लिये जारी आदालती आदेशों को लेकर प्रशासन संजीदा नहीं रहता। कुत्तों की नसबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिये आदेश के अनुपालन में भी लापरवाही हो रही है। हालांकि प्रशासन ने कुत्तों को पकड़ने व नसबंदी कराने का काम अब शुरू कर दिया है।
इससे पहले कुत्तों की नसबंदी को लेकर किसी तरह की कवायद नहीं चल रही हैं एसडीएम सदर प्रभाकांत अवस्थी ने कहा कि पहले सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। इसलिये नसबंदी की जरूरत ही नहीं पड़ी। फिलहाल नगर निगम, पशुपालन विभाग तथा दो अन्य टीमे कुत्तों को पकड़कर नसबंदी करने का काम कर रही है। उसके बावजूद स्थिति यह है कि सीतापुर में इन खुंखार कुत्तों ने अपना 13वां शिकार 8 साल की मासूम रीना को बना लिया।
आखिर स्थिति यहां तक पहुंच गई कि माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को कुत्तों के हमले में घायल या मरे बच्चों के अभिभावकों से मुलाकात करनी हेतु गुरपलिया गांव में जाकर पीड़ित से मिलें। कुत्तों के खुंखार होने और बच्चों को मारने या घायल करने की घटनाएं कोई नहीं बात नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व मेरठ के एक क्षेत्र में भी कुत्तों ने अपना इसी तरह आतंक मचाया था। प्रदेश में आये दिन कोई न कोई घटना ऐसी हो ही रही है। सरकार और मुख्यमंत्री जी भी चिंतित है। कोर्ट भी मामले में संज्ञान ले रहा है। जिसके घर का मरता है या घायल होता है तो उसे ही कष्ट होता हैं ऐसे में जानवर को मूकजानवर बताकर इनके खिलाफ कोई कार्रवाई या न मारने की कार्रवाई की जो अपील डीएम
सीतापुर व एसएसपी द्वारा की गई है वो समझ से बाहर है।
होना तो यह चाहिये था कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिये दोनों प्रमुख अधिकारियों द्वारा इस बारे में सकारात्मक योजना तैयार कर नागरिकों के सामने रखनी चाहिये थी कि अब किसी ओर का चिंराग इनका शिकार नहीं बनेगा।
मेरा मानना है कि कुत्ता हो या बंदर, भेडिया, सीयार इनके द्वारा किये जाने वाले हमलो की घटनाएं कम होने के बजाए बढ़ती जा रही हैं। वो बात दूसरी और है कि पूरब साइड में सीयार व भेड़िये तो कुत्ते और बंदर तथा पूरे प्रदेश में जहां मौका मिला वहां हमला बोलने में पीछे नहीं रहते। आखिर कब तक इन्हे मूक जानवर बताकर इंसानी बच्चों को मरने के लिये छोड़ा जा सकता है।
मेरा भी मत है कि किसी का उत्पीड़न नहीं होना चाहिये चाहे वो जानवर हो या इंसान। लेकिन सब एक सीमा तक सब्र कर सकते हैं सिर्फ बातों और आश्वासनों से पीडितों का दुख कम होने वाला नहीं हैं। क्योंकि अगर सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो जो व्यवस्थाएं इससे संबंध स्थानीय निकायों स्वास्थ्य, वन विभाग को करनी चाहिये वो नहंी की जा रही है। स्थानीय निकायों के अधिकारी राग अलापते हैं कि इनकी नसबंदी हो तो भाई रोका किसने है आप करते क्यों नहीं?
वन विभाग इन्हे पकड़कर सही जगह भेजने की जिम्मेदारी से हमेशा बचता नजर आता हैं तो स्वास्थ्य विभाग द्वारा गांव देहातों के दवाईघरों की बात तो दूर बड़े शहरों के अस्पतालों में भी रेबिज के इंजेक्शन उपलब्ध कराने में सक्षम नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में घटना चाहे यूपी के किसी जिले में हो या देश के अन्य प्रांतों में।
सोशल मीडिया के सक्रिय होने से उसकी सूचना गांव देहातों तक देशभर में पहुंचने में देर नहीं लगती। ऐसे में जब इसकी रोकथाम पुख्ता तरीके से नहीं हो पा रही है और यही नागरिकों में रोष का कारण बन रही लगती है।
सीतापुर की 12 वर्शीय बेटी रीना के पिता का कथन पूरी तौर पर सही है कि 5 लाख ले लो मेरी पुत्री लौटा दो। क्योंकि पैसा आर्थिक समस्याएं तो दूर कर सकता है लेकिन जिगर के टुकड़े अगर दूर हो जाए तो उन्हे आसानी से मिला सकता।
मुझे लगता है कि ऐसी घटनाएं और जानवरों के हिंसक होेने के लिये कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं। क्योंकि जंगलों में वृक्षों का कटान हो रहा है और इनके रहने की जगहें घिर रहीं है। खाने की जगह जो थी वो अब खत्म हो रही हैं। केंद्र व प्रदेश की सरकारें और खासकर जानवरों को बचाने के अभियान में लगी केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को चाहिये कि इनके रहने और खाने के लिये जंगल और फलों के पेड़-पौधे विकसित कराए जिससे इस समस्या का पूर्ण रूप से समाधान हो सकें।
मुझे लगता है कि फिलहाल जहां कही भी कुत्ते बंदर व अन्य ंिहसक जानवरों का शिकार नागरिकों के होने की घटना सुनने को मिले तो वहां के डीएफओ नगर आयुक्त तथा अन्य निकायों के अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को दोषी ठहराया जाए क्योंकि जो दिख रहा है उससे यह स्पष्ट होता है कि यह विभाग अपनी जिम्मेदारियों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। वरना अगर वन विभाग स्थनीय निकाय नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग, मिलकर संयुक्त अभियान चलाते हुए इनकी नसबंदी करने के साथ साथ आबादी वाले क्षेत्रों से पकड़कर जंगलों में छोड़ने और स्वास्थ विभाग अस्पतालों में इनके कटे के इंजेक्शनों की पूर्ण व्यवस्था उपलब्ध रखे तो असंतोष व रोष नागरिक उत्पन्न न हो जितना अब हो रहा है।

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– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

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